धर्म एवं शिक्षा - religion and education

 धर्म एवं शिक्षा - religion and education


प्राचीन काल से धर्म एवं शिक्षा का सम्बंध रहा है। शिक्षा का मुख्य ध्येय आध्यात्मिक था। शिक्षा एवं धर्म व्यक्ति के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन पर प्रभाव डालती है। मानव व्यवहार, आदर्श आदि में शिक्षा द्वारा बदलाव किया जा सकता है। धर्म एवं शिक्षा में घनिष्ठ संबंध होने के कारण धर्म को शिक्षा से अलग नहीं कर सकते। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीक विकास करना है। सर्वांगिक विकास में व्यक्तिगत एवं सामाजिक आचरण सुचारु रुपसे करना भी समाहित होता है। शिक्षा का लक्ष्य मानव जीवन का निरंतर विकास करना है। मनुष्य जीवन को प्रभावित करनेवाले विभिन्न कारकों में से धर्म यह एक महत्वपूर्ण कारक है। नीतिशास्त्र एवं धर्म के मूल सिद्धांतों की शिक्षा की सहायता से यह संभव है। अभिवृत्ति, अभिरुचि, मूल्य एवं दृष्टिकोण का आदर्श परिपोष विद्यार्थियों में किये जाना चाहिए।


“यतो अभुदय- निश्श्रेयस सिद्धिः स धर्म:” 


अर्थात धर्म वहि है, जिससे व्यक्ति कि शारीरिक और अध्यात्मिक उन्नति हो। स्वातंत्र प्राप्ति के उपरांत भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। अर्थात राष्ट्र किसी एक धर्म को स्वीकार न करते हुए सभी धर्मों को समान मानेगा। भारतीय संविधान द्वारा सभी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म का अनुसरण कर सकते है। किसी भी धर्म को मानने एवं उसके नुसार आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। साथ ही यह भी प्रावधान किया की, सरकारी सहायता से चलनेवाली विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाए। शिक्षा संस्थानों द्वारा आदर्श नागरिकता की शिक्षा देना आवश्यक है।