वर्ग एवं वर्ग संघर्ष की समीक्षा - Review of class and class struggle
वर्ग एवं वर्ग संघर्ष की समीक्षा - Review of class and class struggle
वर्ग की धारणा का विरोध अनेक विद्वानों ने वैचारिक आधार पर अधिक किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में संभवतः लायड वार्नर का उनकी स्टडीज के पहले वर्ग का कोई आनुभविक अध्ययन नहीं हुआ। सी. राइट मिल्स ने इसके बाद अमेरिकी मध्य वर्ग का अध्ययन किया। मैक्स वेबर ने मार्क्स की यह कह कर आलोचना की कि आर्थिक रूप से बंद वर्ग सभी असमानताओं की व्याख्या नहीं कर सकता है।
असमानताएँ, प्रतिष्ठा, शक्ति एवं उत्पादन की शक्तियों पर नियंत्रण की होती हैं। संघर्ष के बारे में वेबर ने कहा कि यह केवल उद्योगपतियों एवं मजदूरों में नहीं होता है, स्वयं उद्योगपति एवं मजदूर तथा मध्य वर्ग के लोग भी आपस में संघर्ष करते हैं। वेबर की लीक पर चलते हुए डहरेतडार्फ ने मार्क्स की समीक्षा करते हुए एक पुस्तक लिखी (क्लास एंड क्लास कनफ्लिक्ट इन इंडस्ट्रियल सोसाइटी ( (1958) जिसमें उन्होंने कहा मार्क्स के विचारों के विपरीत औद्योगिक समाज में संघर्ष व्यावसायिक समूहों में होता है। यह संघर्ष आर्थिक हितों के नहीं बल्कि सत्ता एवं परिस्थिति की असमानता के कारण होता है। रेमंड एरॉ के अनुसार • अनेक वर्ग विभाजित समाजों में संघर्ष नहीं होता है।
जार्ज रीजर ने कहा कि हाल के दशकों में कम-से-कम पश्चिमी देशों में वर्ग संघर्ष अगोचर है। मजदूर वर्ग संतुष्ट है। थेडा सकोपाल (Theda Skocpol) ने कहा यदि वर्ग युद्ध सामाजिक क्रांति की आवश्यक शर्त है तब जैसे सामाजिक क्रांति सभी देशों में होती हैं उसी तरह प्रत्येक देश में वर्ग-युद्ध होगा, यह जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा फ्रांस, रूस, चीन में क्रांतियाँ हुई. परंतु इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका आदि में क्रांतियाँ नहीं हैं। इसलिए वर्ग संघर्ष एवं वर्ग युद्ध की अनिवार्यता को सिद्ध नहीं किया जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से जैसा कि टी.बी. बोटोमोर ने कहा कि वर्ग संघर्ष होता हैं इंद्ववाद के सिद्धांत के अनुसार ही कहीं परिस्थितियाँ, कहीं शासक वर्ग कहीं मजदूर वर्ग की निष्क्रियता इसे अभिव्यक्त नहीं होने हैं। इंग्लैंड, अमेरिका एवं जर्मनी में तीव्र वर्ग संघर्ष हुए। पश्चिम के उद्योगपति पूरी दुनिया पर हावी हो गए। साम्राज्यवाद ने उन्हें यह अवसर दिया, जिससे वे पूरी दुनिया के संसाधनों का दोहन कर सकें। इस दोहन एवं शोषण का एक अंश विकसित देशों के उद्योगपतियों ने अपने देशों के मजदूरों को भी दिया। वर्ग संघर्ष हो रहे हैं। इनमें वह व्यापकता नहीं है। मजदूरों की छंटनी हो रही है। कार्यस्थल का चरित्र बदल गया है। प्रौद्योगिकी बदल गई है। असमानता के आर्थिक संबंध नहीं बदले हैं। इस नवीन परिप्रेक्ष्य में मजदूर संगठित नहीं हो पा रहे हैं।
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