नातेदारी: भूमिका एवं महत्व - Role and Importance of Kinship
नातेदारी: भूमिका एवं महत्व - Role and Importance of Kinship
1. परिवार एवं विवाह का निर्धारण (Determination of Marriage and Family)
नातेदारी ही तय करती है कि एक व्यक्ति के विवाह का क्षेत्र क्या होगा। कौन सा विवाह निषिद्ध होगा. किसे मान्यता और किसे अधिमान्यता दी गयी है। अर्थात् अंतः विवाह, बहिर्विवाह, समलिंग. सहोदरज एवं विषमलिंग सहोदरज विवाह आदि का निर्धारण नातेदारी के आधार पर ही होता है। विवाह के आधार पर ही परिवार का निर्माण होता है। परिवार में पाये जाने वाले रक्त एवं विवाह संबंधी सदस्य नातेदार कहे जाते हैं। रेडक्लिक ब्राउन जैसे मानवशास्त्री ने नातेदारी व्यवस्था का प्रकार्यात्मक विवेचन किया है तथा यह बताया है कि विवाह परिवार एवं नातेदारी एक दूसरे के महत्व से अन्य व्यवस्था उत्पन्न करते हैं।
2. वंश, उत्तराधिकार एवं पदाधिकार का निर्धारण (Determination of Rescent, Inheritance and Juccession)
नातेदारी ही वंशावली का निर्धारण करती है।
वंशावली की लंबाई, प्रतिष्ठा का मापदंड होती है। परिवार, वंश, गोत्र, मातृदल एवं अर्धाश नातेदारी के विस्तृत स्वरूप हैं। भूतकाल के वंश संबंधियों के बारे में ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति स्वयं को इतिहासविहीन महसूस नहीं करता है। नातेदारी का प्रारंभिक अध्ययन वकीलों एवं विधिशास्त्रियों द्वारा संभवतः इसलिए किया गया कि वे अधिकार दावे दायित्व, पितृ अधिकार, संविदा, पितृ-बंधुता आदि का ज्ञान प्राप्त कर उसे कानूनी रूप दे सके। वे साथ ही इन नियमों की भी रचना करना चाहते थे कि कौन किसका उत्तराधिकारी होगा? किसे क्या प्राप्त होगा? यदि नातेदार के बाद किसी अन्य को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त होता है तब नातेदारी की व्यवस्था की जाती है और नातेदारों में वरीयता के क्रम निश्चित किया जाता है। पितृवंशीय एवं मातृवंशीय परिवारों में वंश उत्तराधिकारी एवं वंश अधिकार के नियम भिन्न-भिन्न हैं। सभी प्रकार के समाजों में नातेदारी के संबंधों का उपयोग संपत्ति के स्वामी, उत्तराधिकारियों, पदाधिकारियों तथा उसके उत्तरावर्ती अधिकारियों, आदि के मध्य संबंधों को परिभाषित करने के लिए किया जाता है।
3. आर्थिक हितों की सुरक्षा (Safe gaurd of Economic Interests)
मुरडॉक लिखते है कि नातेदारी समूह, एक व्यक्ति नहीं वरन रक्षा पंक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जब एक व्यक्ति संकट अथवा कठिनाई में होता है या उसके किसी सांस्कृतिक दायित्वों अथवा अधिक कार्य करना होता है तो वह सहायता के लिए अपने नातेदारी समूह के पास जा सकता है। साथ ही समुदाय अथवा संपूर्ण जाति में अन्य सदस्यों की अपेक्षा नातेदारों का उसे सहायता देने का दायित्व सर्वाधिक होता है।
4. सामाजिक दायित्वों का निर्वाह (Fulfilment of Social Responsibilities)
लेबी कहते है कि एक रिश्तेदार दूसरे रिश्तेदार की स्वेच्छा से निःशुल्क सहायता देता है जब कि उन्हीं सेवाओं के लिए हमें बाह्य व्यक्तियों को कीमत चुकानी होती है। नातेदार एक नैसर्गिक परामर्शदाता होता है। वह कठिन परिस्थितियों में एक सहायक होता है। अर्थात् वह स्वयं का सामाजिक दायित्व निर्वाह करता है तथा दूसरों को करने में मदद करता है।
5. मानसिक संतोष (Mantal Satisfaction )
नातेदारी का मनोभाव एक व्यक्ति को मानसिक संतुष्टि प्रदान करता है।
मानवता का इतिहास इस बात का द्योतक है कि एक लंबी अवधि तक मानव जाति नातेदारी पर आधारित समूह में रही। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन सभी कुछ नातेदारों के हाथ में था। नातेदार विहीन व्यक्ति अपने को बिना सामाजिक प्रतिष्ठा वाला एवं निवृष्ट रूप में एक मृत व्यक्ति के समान मानता था। मनुष्य की प्रकृति यह होती है कि वो अपने करीबी लोगों पर ज्यादा विश्वास करता है। इन नातेदारों में रक्त संबंधी हमारे सबसे अधिक परिचित व्यक्ति हैं क्योंकि वे हमारे ही अंग के हिस्से समझे जाते है। नातेदारों के बीच अपने को पाकर एक व्यक्ति आनंद, संतोष व सुरक्षा का अनुभव करता है।
6. मानवशास्त्रीय ज्ञान का आधार (Basis for Anthorpological Knowledge)
मानवशास्त्रीय अध्ययन में नातेदारी का ज्ञान एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
प्रारंभिक मानवशास्त्रियों ने अधिकांश अध्ययन नातेदारी से ही प्रारंभ किए थे। मॉर्गन, मैक्लैनन, हेनरी मेन, लोवी, फ्रेंज बोआस, मैलिनोवस्की, रैडक्लिफ ब्राउन, इवांस प्रिचार्ड, रिवर्स, सैलिगमेन आदि प्रमुख मानवशास्त्रियों के अध्ययन एक या एकाधिक जनजातियों की नातेदारी व्यवस्था, परिवार एवं विवाह आदि से संबंधित थे। वे नातेदारी के अध्ययन के आधार पर सामाजिक संरचना को समझना चाहते थे। साथ ही वे समाज एवं संस्थाओं के विकास में भी रूचि रखते थे। नातेदारी का अध्ययन इस दिशा में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि प्रारंभिक समाजों में वंशानुक्रम समूह की मूलभूत राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और क्षेत्रीय इकाईयां रही है।
मैक्लेनन ने उन अवस्थाओं का उल्लेख किया है जिनसे संपूर्ण मानवता की नातेदारी एवं विवाह की संस्थाएं गुजरी हैं। उनकी मान्यता है कि प्रारंभ में नातेदारी की गणना स्त्रियों के माध्यम से होती थी. पुरुषों के माध्यम से गणना का विकास बाद के समय में हुआ। मैक्लेनन से पूर्व हेनरी मैन ने भारोपीय परिवारों का अध्ययन किया और बताया कि पितृ-तंत्रात्मक संयुक्त परिवार पिता-पुत्रों का संपत्ति पर सम्मिलित अधिकार वाला परिवार था और भारत में ऐसा परिवार नातेदारी की प्रमुख कड़ी था।
मॉर्गन ने न्यूयार्क राज्य की इराक्विस जनजाति का अध्ययन किया। उन्होंने वर्गात्मक संज्ञा व्यवस्था के आधार पर यह माना है कि परिवार एवं विवाह का विकास आदिम यौन साम्यवाद से हुआ है। मॉर्गन से प्रेरित होकर ही एक लंबे समय तक मानवशास्त्री नातेदारी शब्दावली का अध्ययन करते रहे। इसीलिए आधे से अधिक नातेदारी का साहित्य केवल नातेदारी शब्दावली से भरा है।
लोवी एवं बोआस उद्विकासीय योजनाओं के विरूद्ध थे। मैलिनोबस्की ने ट्रोब्रियांडा द्वीपवासियों का अध्ययन कर नातेदारी के अध्ययनों को नव-जीवन प्रदान किया। अपने नातेदारी के मध्य भावनाओं एवं मनोभावनाओं का अध्ययन किया। रैडक्लिफ ब्राउन ने भी नातेदारी शब्दावली में रूचि दिखायी एवं तुलनात्मक उपागम (Comparative approach) का विकास किया। अपने अधिकारों एवं दायित्वों को स्पष्ट करने के लिए नातेदारी तंत्र एवं सामाजिक संरचना के अध्ययन पर जोर दिया।
इवांस प्रिचार्ड ने 1940 में दक्षिणी सूडान के न्यूर जंजातियों पर एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें नातेदारी समूहों पर आधारित समूहों का अध्ययन सम्मिलित था। मेयर फोरटेस ने 1945 में टालेंसी लोगों के विवाह, वंशानुक्रम एवं नातेदारी का अध्ययन कर एक पुस्तक प्रकाशित की। मुरडॉक ने अपनी पुस्तक 'सोशल स्ट्रक्चर' में उद्विकास के प्रति रूचि दिखायी। लेवी स्ट्रास ने नातेदारी शब्दावली, विवाह- मैत्री (Marriage allieance), विवाह द्वारा स्त्रियों के स्थान की विधियों, आदि का उल्लेख किया है। डॉ. रिवर्स एवं अनेक भारतीय मानवशास्त्रियों ने भी नातेदारी के विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर मानवशास्त्रीय ज्ञान को समृद्ध बनाया है। नातेदारी के आधार पर मानवशास्त्र में अध्ययन के लिए माडल भी विकसित हुए जिनका उपयोग नातेदारी तंत्रों को समझने के लिए किया गया है।
वार्तालाप में शामिल हों