भारतीय संविधान की भूमिका - Role of Indian Constitution

 भारतीय संविधान की भूमिका - Role of Indian Constitution


प्रासंगिक तौर पर आज मानवाधिकार की अवधारणा पर विचार किया जा रहा है जबकि प्राचीन काल से ही इस विषय पर आवाज उठती आ रही है। प्रत्येक मानव प्राणी होने के अधिकारों का हकदार है क्योंकि यह अधिकार उसे मानव के रूप में जन्म लेने के अधार पर मिले है। इस पर प्राचीन यूनान में अरस्तु ने अपनी पुस्तक "न्याय के सिद्धांत" में चर्चा की थी। रोम में सिसरो ने जुस नेचुरल' का सिद्धांत दिया था। भारत में भी महाभारत जैसे ग्रन्थों में इस विषय पर उल्लेख किया गाया था। मध्यकाल के कैथोलिक धर्म ने इन अधिकारों को अन्य अधिकारों से ऊपर माना। उस काल में न्यायपूर्ण रूप से इन अधिकारों की रक्षा भी की जाती थी। ठीक इसे प्रकार आधुनिक काल में पुनर्जागरण के दौर के ब प्राकृतिक न्याय और प्राकृतिक अधिकारों की स्थापना हुई। प्राकृतिक न्याय के अनुसार वे ही अधिकार माने जाने योग्य है, जो तर्क संगती रखते है। मिल्टन ने प्राकृतिक स्वतंत्रता की बात कही तो जॉन लॉक ने सभी लोगों के लिए सामान अधिकारों की बात कही।

भारतीय संविधान की भूमिका - Role of Indian Constitution

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है की मानवाधिकार से व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं गरिमा से सम्बंधित ऐसे अधिकार अभिप्रेत है, जो किसी उच्च सत्ता अथवा संविधान द्वारा प्रत्याभूत अथवा अन्तरराष्ट्रीय संविदाओ में सन्निहित है। मानवाधिकारों के सम्बन्ध में भारतीय परंपरा को देखे तो स्पष्ट होता है कि पुरातन समय से हमारे यहाँ मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन हेतु सभी प्रकार की आवश्यक व्यवस्थाएं की गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा की गई मानवाधिकार की विश्व घोषणा की प्रथम पंक्ति है- “मानव अधिकारों की मान्यता एवं सम्मान संसार में स्वतंत्रता शक्ति एवं न्याय की स्थापना करना है।" चूँकि मानव परिवार के सभी सदस्यों की जन्मजात गरिमा और सम्मान में अविच्छिन अधिकार की स्वीकृति ही विश्व में शांति, न्याय और स्वमतंत्रता की बुनियाद है।


आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्यों का प्रमुख उद्देश्य राज्य का बहुमुखी विकास करना है।

भारतीय संविधान की भूमिका - Role of Indian Constitution

यह तभी संभव है जब की उस राज्य के प्रत्येक नागरिक को ऐसे अधिकारों से संपन्न बनाया जाए ताकि वह स्वतंत्रतापूर्वक एवं निर्बाध रूप से अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सके एवं राज्य की प्रगति में सहायक बन सके। इस प्रकार अधिकार राज्य की महती आवश्यकता बन जाते है।


लोस्की का कथन है कि अधिकार किसी भी लोकतान्त्रिक राज्य की आधार शिला है। यह वे गुण है जिनके द्वारा राज्य की शक्ति के प्रयोग ने नैतिकता का समावेश होता है। यह अधिकार प्रकृति है राज्य की शक्ति के प्रयोग में नैतिकता का समावेश होता है। यह अधिकार प्राकृतिक है क्योंकि आदर्श एवं सुखमय जीवन के लिए नितांत आवश्यकता है। स्पष्ट है कि बिना अधिकारों के लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं उसके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।

भारतीय संविधान की भूमिका - Role of Indian Constitution

1. मानवाधिकारों से सम्बंधित किसी भी विषय में सरकार को सिफारिश सुझाव एवं सूचना देना।


2. राष्ट्रीय कानूनों एवं प्रथाओं को अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार प्रतिमान के अनुसार विकसित करना।


3. मानव अधिकारों के बारे में जनता को शिक्षित एवं जागरूक बनाना।


4. अंतरराष्ट्रीय उपायों को सूचनात्मक सहयोग देना।


5. संयुक्त राष्ट्र संघ, क्षेत्री संघों एवं राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोगों को उनके कार्य में सहयोग देना।


मानवाधिकार की अवधारणा को सर्वजनीनता समकालीन इतिहास, जिसे वास्तव में समकालीन इतिहास के रूप में देखा जा सकता है के स्वरूप का प्रतिबिम्ब है। इस इतिहास की विशिष्टता है इस जागरूकता का उदय कि मानव जाति के सभी सदस्य विश्व समुदाय से अनिवार्य रूप से जुड़े हुए है" और यह मान्यता कि विश्व की नियाती में विश्व के सभी मनुष्यों की बराबर की भागीदारी है। इसके लिए मुख्य कारक है: विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का ढह जाना, आधुनिक युग की शुरुआत से यूरोप द्वारा पूरे विश्व पर बनाये गए प्रभुत्व का अंत होना और तीसरी दुनिया के नाम से जाने जाने वाले देशों का एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में उदय होना।