ईसाई सामाजिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं - Salient Features of the Christian Social System
ईसाई सामाजिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं - Salient Features of the Christian Social System
जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि ईसाई धर्म ईसा मसीह के द्वारा दिए गए उपदेशों पर आधारित है और ए उपदेश ही इस धर्म की नियमावली है। ईसाई सामाजिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं
1- धर्म प्रधान समाज
ईसाई समाज भी एक धर्म प्रधान समाज है तथा समाज की प्रत्येक नियमावली, परंपराओं का निर्धारण धर्म द्वारा ही होता है। इसाइयों में यह धारणा है कि ईश्वर ने पूरे संसार को प्रेम और सहयोग के मार्ग कि ओर ले जाने के लिए अपने दूत ईसा मसीह को धरती पर भेजा और इस प्रकार से ईसा मसीह को ईश्वर द्वारा भेजा गया एक दूत माना जाता है न कि स्वयं ईश्वर। इसाइयों में निराकार ईश्वर की संकल्पना पाई जाती है। ईश्वर में विश्वास के साथ साथ वे आत्मा के अस्तित्व और उसकी पवित्रता में भी विश्वास रखते हैं। इसी वजह से उनमें त्रियकवाद (ट्रिनिटी) की संकल्पना भी पाई जाती है। त्रियकवाद अर्थात् ईश्वर, पवित्र आत्मा और ईसा मसीह का संयोजन। ए तीनों परस्पर विपरीत नहीं होते हैं, अपितु ए एक ही शक्ति के विभिन्न प्रतिरूप माने जाते हैं। इसाइयों में मानवता, भातृत्व और समानता को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसाइयों में चर्च का बड़ा महत्व होता है तथा उनके सभी संस्थागत पक्षों को चर्च के माध्यम से ही वैधता प्रदान किया जाता है। इसाइयों की धार्मिक क्रियाओं के निष्पादन में चर्च की भूमिका मुख्य होती है। प्रत्येक ईसाई व्यक्ति को चर्च का सदस्य होना अनिवार्य रहता है। चर्च द्वारा व्यक्ति के लिए एक रस्म की जाती है बपतिस्मा बपतिस्मा से आशय व्यक्ति को पापों से मुक्त कर एक नया जीवन प्रदान करने से है।
2- मानवीय कल्याण को प्राथमिकता
संपूर्ण ईसाइयत मानवीय तथा सांसरिक कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। इसाइयों में यह मान्यता है कि संसार में कोई ऊंचा नीचा अथवा छोटा-बड़ा नहीं होता है और यही कारण है कि वे न केवल अपने समुदाय की बेहतरी और विकास, कल्याण आदि के लिए तत्पर रहते हैं, अपितु पूरे संसार के कल्याणार्थ कार्यों में संलिप्त रहते हैं। ईसाई सामाजिक व्यवस्था में वर्ग भेद का कोई स्थान नहीं होता है। इनमें कर्मकांड और अंधविश्वास नहीं पाए जाते हैं। भारतीय संदर्भ में दलितों, शोषितों और हाशिएकृत लोगों के उत्थान में ईसाई लोगों ने काफी कार्य किए हैं।
शैक्षिक संस्थान, अस्पताल और अन्य लोक कल्याणकारी संस्थाएं आदि को स्थापित कर ईसाई लोगों ने अनेक बीमारों, अनाथ और जरूरतमन्द लोगों की सहायता की। इस प्रकार से संपूर्ण विश्व में इसाइयत अपने समानता, भाई-चारे और सहायतापूर्ण व्यवहार के लिए जानी जाती है।
3- विवाह की पवित्रता
ईसाई सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत विवाह को एक पवित्र बंधन के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। उत्तर भारत के संयुक्त चर्च के संविधान में लिखा गया है कि विवाह एक पवित्र व्यवस्था ही जो ईश्वर द्वारा स्थापित की गई है तथा यह कारण है कि यह व्यवस्था अपने प्राकृतिक क्रम में विद्यमान है। विवाह संबंध इस प्रकार से ईसा मसीह तथा चर्च के अलौकिक संबंधों के प्रतीक स्वरूप विद्यमान है। विवाह को इसाइयत में पवित्र संबंध मानने के साथ एक विवाह को ही विवाह का मान्य स्वरूप माना जाता है। विवाह प्रक्रिया पूरी पवित्रता और सादगी से चर्च के प्रतिनिधित्व में संपन्न होती है।
4 परिवार का महत्व
परिवार का स्थान ईसाई समाजों में महत्वपूर्ण माना जाता है। एम.पी. जॉन ने अपनी पुस्तक द फैमिली: ए थियोसोफ़िकल अप्रोच' में परिवार के चार उद्देश्यों का उल्लेख किया तथा बताया कि परिवार का मूल इन्हीं चार उद्देश्यों में छिपा हुआ है-
क) पुत्र की प्राप्ति
ख) व्यभिचार से बचाव
ग) पारस्परिक सहायता
घ) पारस्परिक आराम
उक्त वर्णित चारों उद्देश्यों से यह बात स्पष्ट होती है कि अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं की ही भांति इसाइयों में भी परिवार के मूल में वही बातें हैं।
इसाइयों की धार्मिक पुस्तक में लिखा गया है कि यह ईश्वर की इच्छा है कि संतानोत्पत्ति किया जाए तथा ईश्वर के भय में रहते हुए बच्चों का पालन-पोषण किया जाए।
5- स्त्रियों की उच्च सामाजिक स्थिति
अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं की तुलना में ईसाई सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों की स्थिति उच्च तथा सम्मानजनक है। इसाइयत में पुरुषों तथा स्त्रियों को समान रूप से महत्व और अधिकार दिए जाते हैं। स्त्रियों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, धन-संपत्ति आदि में पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त हैं। इसके अलावा शैक्षणिक और धार्मिक पक्षों में भी स्त्रियों को पर्याप्त महत्व दिया जाता है।
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