संथाल जनजाति - Santhal Tribe
संथाल जनजाति - Santhal Tribe
भारत की तीसरी बड़ी जनजाति संथाल है, यह बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं त्रिपुरा में निवासरत हैं। असम, में भी यह जनजाति निवास करती है, परंतु असम के संथाल अनुसूचित जनजाति नहीं हैं। संथाल स्वयं को होर कहते हैं, जिसका मतलब होता है मनुष्य। संथाल के अन्य नाम भी प्रचलित हैं- जैसे साओन्वार, खैरवार, साफाहोर, बुना, मंडल, मॉझी, परधान एवं सरदार इत्यादि इनके उपनाम है।
बिहार एवं झारखण्ड में संथाल, जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी जनजाति है। यहां संथाल मोटे तोर पर दो समूहों में विभक्त हैं, प्रथम देसावली संथाल एवं दूसरा खरवार देसावली संथाल अपने संथाली विचारधारा को मूलरूप से स्वीकार करता है जबकि खरवार सुधारवादी पंथ के समर्थक हैं।
ज्ञात इतिहास के अनुसार संथाल का मूल निवास छोटा नागपुर के पठार एवं दामोदर नदी के आस पास का क्षेत्र था। सन् 1770 के अकाल के बाद ये समुदाय अपने वर्तमान निवास वीरभूमि में आए, जो आगे चलकर कुछ जिलों को मिलाकर संथाल परगना के रूप में स्थापित हुआ।
वर्तमान में इनकी ज्यादातर संख्या संथाल परगना, धनबाद, बोकारो, कोडरमा पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, हजारी बाग, चतरा, धनबाद भागलपुर एवं पूर्णिया जिलों में निवासरत है।
प्रजातीय दृष्टि से 'संथाल' प्रोटोऑस्ट्रोलॉयड प्रजाति के सदस्य हैं। संथाल 12 पितृवंशीय गोत्रों में विभक्त हैं। ये गोत्र इस प्रकार हैं मुरमू, हंसदा, सोरेम, किसकू, बासरे, हेमरम, पासके, मेडुआ, मरांडी, चौड़े, पोरिया एवं टुडू। प्रत्येक गोत्र का अपना प्रतीक या टोटेम है, जिसको हानि पहुंचना वर्जित है। ये सभी गोत्र बहिर्विवाही गोत्र हैं अर्थात ये एक ही गोत्र में विवाह नहीं करते, गोत्र से बाहर विवाह करते हैं।
झारखंड एवं बिहार के संथाल सुव्यवस्थित गांवों में रहते हैं। अर्थात इनके गांवों की संरचना एवं विन्यास सुस्पष्ट एवं सुंदर होता है। सामूहिक पूजा स्थल मांझीथाना गांव के बीच में स्थित होता है। जहां पर इनके देवता वोंगा की पूजा होती है। मांझीथान में ही गांव के मुखिया मांझी का घर होता है। गांव के बाहर की तरफ जोहर थान नामक स्थान होता है जिसमें इनके सर्वोच्च देवता मरांगवरू की पूजा होती है।
संथाल भी अन्य जनजातीय समुदायों की भांति प्रकृति के पूजक हैं एवं प्रकृति से गहरा लगाव रखते हैं। इनकी संस्कृति पर्यावरण का संरक्षण एवं समवर्धन करने वाली संस्कृति है। संथाल जनजाति के प्रमुख त्यौहारों में बहा, सुहराई, कर्मा, वंधना, सहरूल, एंरोक, मागसिम, हरीधर सिम इत्यादि हैं। संथाली दंत कथाओं के अनुसार समस्त संथाल दो श्रेणी में बंटा है- प्रथम होर अथवा संथाल और दूसरा दीकू । होर संथाल समुदाय है और दीकू का तात्पर्य है जो संथाल नहीं है। इस प्रकार संथाल समुदाय के लिए वे सभी व्यक्ति जो संथाल समुदाय के नहीं हैं दीकू कहलाते हैं।
पारंपरिक रूप से संथाल जनजाति की अपनी एक सुदृढ राजनैतिक, प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था होती है। गांव के स्तर पर ग्राम पंचायत होती है। जिसका प्रमुख मांझी होता है। गांव के स्तर पर प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था की देख-रेख मांझी करता है।
गांव में किसी भी प्रकार की समस्या अपराध इत्यादि के मामले में मांझी संबंधित व्यक्ति या परिवार को दण्ड देता है। यह दण्ड सामाजिक, आर्थिक अथवा दोनों प्रकार का हो सकता है। "परानिक” मांझी को सहायता करता है। यह गांव के स्तर पर दूसरा महत्वपूर्ण पद है। इसी प्रकार गांव के स्तर पर एक तीसरा पद भी है जिसको जोग मांझी कहते हैं।
जोग मांझी का प्रमुख कार्य युवक-युवतियों के विवाह संबंध तय करवाना एवं विवाह संपन्न कराना होता है। गांव के स्तर पर ही एक अन्य पद गोढ़ेत होता है। गोढ़ेत का प्रमुख कार्य सूचनाओं को एकत्र कर मांझी तक पहुँचना होता है। गांव के स्तर से ऊपर का संगठन, 5-8 गांव का संगठन होता है। जिसका प्रमुख देश मांझी कहलाता है। जब कभी दो या दो से अधिक गांवों के बीच विवाद की स्थिति होती है। तब देश मांझी मामले की सुनवाई करता एवं निर्णय देता है।
15 से 20 गांव का संगठन परगना कहलाता है और इसके मुखिया को परगनेत कहा जाता है। परगना संथाल समुदाय की सर्वोच्च इकाई होती है।
इसके द्वारा व्यक्तियों को अपराधी मानने पर शारीरिक, आर्थिक एवं सामाजिक दण्ड दिया जाता है।
संथाल जनजाति में परिवार, पितृसत्तात्मक एवं पितृवंशीय परिवार होते हैं। इन परिवारों का स्वरूप एकल परिवार का होता है। इनके बीच विवाह की बहुत सी पद्धतियां प्रचलित हैं। जिनमें ज्यादातर गोलट विवाह, सेवा विवाह, राजी-खुशी विवाह एवं अपहरण विवाह का अनुसरण किया जाता है। संथाल जनजति के लोग आपसी वार्तालाप संथाली भाषा में करते हैं। जिसकी अपनी एक लिपि ओलचिकीलिपि भी है। गैर-संथाली समुदायों के साथ वार्तालाप में यह हिंदी एवं बंगाली भाषा का प्रयोग करते हैं तथा देवनागिरी एवं बंगाली लिपि का प्रयोग करते हैं।
बंगाल में संथाल जनजाति का सकेन्द्रण ज्यादातर मिदनापुर जिले में है। यहां के संथाल भी आपस में संथाली भाषा का प्रयोग करते हैं तथा दूसरे समुदायों के साथ बंगाली भाषा का प्रयोग करते हैं। लिपि के रूप में देवनागिरी, बांग्ला एवं ओलचिकी लिपि का प्रयोग करते हैं।
यहां के संथाल अपने शरीर में (हाथ, गर्दन व पैर) गोदना व टैटू का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं।
उड़ीसा में संथाल मांझी नाम से जाने जाते हैं एवं इनकी अधिकांश जनसंख्या बालासोर, क्योंझर एवं मयूरगंज जिलों में निवास करती है। यहाँ संथाली के साथ-साथ उड़िया भी बोलते हैं जो इंडो-आर्यन भाषा है। ये लोग ज्यादातर उड़िया-लिपि का प्रयोग करते हैं। यहाँ पर संथाल मुख्यतः कृषि कार्य एवं श्रमिक तथा उद्योगों में काम करते हैं।
त्रिपुरा में संथाल जनजाति ने अप्रवासी बागान श्रमिकों के रूप मे 1916 से रहना आरंभ किया, जब वहाँ पर चाय उद्योग की स्थापना हुई। यहां के संथाल, संथाली एवं बंगाली भाषा का प्रयोग करते हैं तथा लिपि के रूप में बांग्ला लिपि का प्रयोग करते हैं। यहाँ के संथाल समुदाय के ज्यादातर व्यक्ति चाय बागानों में श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं, इसके अतिरिक्त ईट-भट्टों एवं आवास निर्माण कार्यों में भी ये श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं।
जनजातीय भारत में संथाल ऐसी प्रथम जनजाति है, जिसने व्यापक पैमाने पर सुधार आंदोलन, कृषक आंदोलन एवं ब्रिटिश प्रशासन के विरूद्ध आंदोलन में हिस्सा लिया। खरवार आंदोलन संथाल समुदाय के द्वारा किया जाने वाला एक बड़ा आंदोलन था जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बना।
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