अनुसूचित जाति: परिचय तथा परिभाषाएं - SC: Introduction and Definitions

अनुसूचित जाति: परिचय तथा परिभाषाएं - SC: Introduction and Definitions


प्रत्येक समाजों में समान्यतः दो प्रकार के वर्ग पाए जाते हैं, जिसमें एक सम्पन्न/शक्तिशाली वर्ग होता है, जिसे पूंजीपति, अभिजात अथवा उच्च वर्ग कहा जा सकता है तथा दूसरा संपत्तिहीन / गरीब वर्ग होता है, जिसे श्रमिक, कमजोर, पिछड़ा अथवा दलित वर्ग की संज्ञा दी जा सकती है। दलित वर्ग एक ऐसा वर्ग है जो सदैव से ही उपेक्षित रहा है तथा सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से कमजोर तथा शोषित रहा है। हालांकि वर्तमान समय में इस दशा में कुछ सुधार हुआ है। मोटे रूप में इस वर्ग के लक्षणों से मिलता जुलता जातीय समूह भातीय समाज में पाया जाता है तथा इसे हम अनुसूचित जातियों के रूप में समझ सकते हैं। अर्थात् ए शोषण तथा उपेक्षित की धारणा व दंश जन्म आधारित व्यवस्था में होना और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ियों तक हस्तांतरित होना. साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से कमजोर होना, जो जातियां पिछड़ी हुई थी उन्हें भारत सरकार ने चिन्हित करके एक अनुसूची में शामिल कर दिया है तथा यही कारण है कि इन जातीय समूहों को अनुसूचित जाति के नाम से जाना जाने लगा।


1935 में साइमन कमीशन द्वारा सर्वप्रथम अनुसूचित जाति' शब्द का प्रयोग किया गया था। इस शब्द को अस्पृश्य लोगों के लिए प्रयुक्त किया गया था। डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि प्राचीन भारत में इन्हें 'भग्न पुरुष' अथवा बाह्य जाति' कहा जाता था। इसके पश्चात अंग्रेजी औपनिवेशिक काल में दलित वर्ग के रूप में संज्ञा प्रदान की गई। ऐसा इसलिए था क्योंकि इनकी सामाजिक आर्थिक अत्यंत निम्न थी तथा यही कारण है कि इसके पूर्व में प्रयोग किए गए वाले शब्द 'अछूत' के स्थान पर 'दलित' शब्द के प्रयोग को अधिक उपयुक्त माना गया। इस संबंध मैनार्य समाज की मान्यता अंग्रेजों से काफी मिलती जुलल्टी थी। उनका मानना था कि ए लोग अछूत न होकर दलित हैं क्योंकि समाज द्वारा इनके अधिकारों का हनन किया गया है तथा इन्हें दबाने तथा शोषित बनाने में समाज की पूरी भूमिका है। वे स्वयं अपनी निम्न दशा हेतु जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि समाज द्वारा उन्हें ए यातनाएं दी गई हैं। इसके बाद 1931 की जनगणना में उन्हें बाहरी जाति के नाम से जाना गया। इस शब्द के पराग किए जाने के पीछे यह धारणा थी कि ए इन जातियों का भारतीय सामाजिक संरचना मेंकोई स्थान नहीं है, इन्हें बहिष्कृत समूह के रूप में अलग रखा गया है। महात्मा गांधी द्वारा 'हरिजन' शब्द के प्रयोग का सुझाव दिया गया।


1935 में इन जातीय समूहों को विशिष्ट सुविधाएं तथा अधिकार प्रदान करने की दृष्टि से सूचीबद्ध किया गया तथा इस सूचीबद्ध विधान में उन सभी अस्पृश्य जातियों को शामिल किया गया जो सामाजिक-आर्थिक हाशिए पर थी। इस सूची के ही कारण इन जातियों को वैधानिक आधार पर अनुसूचित जाति की संज्ञा दी जाती है। साथ ही इन्हीं अनुसूचित जातियों को दलित भी कहा जाता है। इन अनुसूचित जातियों में शामिल कुछ प्रमुख जातियां हैं चमार, डोम, पासी, भंगी, चुहड़, कोरी, मोची, राजबंसी, पेरेया, धियान, दोसड, शानन आदि।


अनुसूचित जातियां वे जातियां होती हैं जिनको सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक सुविधाएं तथा अधिकार दिलाने की दृष्टि से संविधान की अनुसूची में शामिल किया गया है। इन्हें अनुसूचित जातियों के अलावा, दलित, अछूत, अस्पृश्य, हरिजन तथा बाहरी जातियां भी कहा जाता है। सामान्यतः अनुसूचित जातियों को अस्पृश्य जातियां भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है -


क्योंकि इनकी परिभाषा अस्पृश्यता के आधार पर की गई है। अस्पृश्यता का सीधा संबंध पवित्रता तथा अपवित्रता की धारणा से है। हिंदू समाज में कुछ व्यवसायों तथा कार्यों को पवित्र की श्रेणी में रखा जाता है तथा कुछ ऐसे भी व्यवसाय और कार्य हैं जिन्हें अपवित्र माना जाता है। व्यवसाय तथा कार्यों के इतर मनुष्य व पशु-पक्षियों के शरीर से निकले हुए पदार्थों के लिए भी अपवित्रता की धारणा है। ऐसी दशा में जो जातियां इन पदार्थों से संबंधित कार्यों में संलग्न हैं, उन्हें भी अपवित्र की श्रेणी में रखा जाता है। इन अपवित्र जातियों को अस्पृश्य जातियों की संज्ञा प्रदान की गई है।


अस्पृश्यता समाज की एक ऐसी कुव्यवस्था है जिसमें अस्पृश्य जाति से संबंधित व्यक्ति किसी अन्य सवर्ण हिंदू जाति से संबंधित व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकता। उन अस्पृश्य जातियों का स्पर्श तत्कालीन समय में पाप समझा जाता था। अस्पृश्य जाति के व्यक्ति का स्पर्श तथा छाया आदि से व्यक्ति के अपवित्र होने की बात की गई है।

सवर्ण हिंदू जातियों को उन अस्पृश्य जातियों के स्पर्श अथवा छाया से बचाने के लिए अस्पृष्यों के रहने के लिए अलग से व्यवस्था की गई थी, उनपर अनेक प्रकार की निर्योग्यताएं थोप दी गईं तथा सह ही उनके स्पर्श से बचने हेतु भी अनेक उपाय तलाश लिए गए। अस्पृश्य जातियों के स्पर्श से अपवित्र होने के बाद सवर्ण हिंदुओं को शुद्ध होने के लिए कुछ संस्कार/अनुष्ठान करने पड़ते थे।


• डॉ. डी. एन. मजूमदार के अनुसार,


"अस्पृश्य जातियां वे जातियां हैं जो विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक निर्योग्यताओं से पीड़ित हैं, इनमें से बहुत सी निर्योग्यताएं उच्च जातियों द्वारा परंपरागत रूप से निर्धारित तथा सामाजिक रूप से लागू की गई हैं। "


• डॉ. के. एन. शर्मा के शब्दों में,


“अस्पृश्य जातियां वे जातियां हैं जिनके स्पर्श से एक व्यक्ति अपवित्र हो जाए तथा पुनः पवित्र होने के लिए उसे कुछ कृत्य करने पड़े।


• हट्टन ने अस्पृश्य जातियों के निर्धारण हेतु कुछ निर्योग्यताओं के बारे में विवरण प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार वे लोग अस्पृश्य हैं जो उच्च स्थिति के ब्राह्मणों की सेवाएं प्राप्त करने की दृष्टि से अयोग्य हों।


• सवर्ण हिंदुओं की सेवा करने वाले नाइयों, कहारों तथा दर्जियों की सेवाएं प्राप्त करने की दृष्टि से अयोग्य हों।


• हिंदू मंदिरों में प्रवेश प्राप्त करने के अयोग्य हो ।


• सार्वजनिक सुविधाओं (पाठशाला, सड़क तथा कुआं) का उपयोग कर पाने में अयोग्य हों।


• घृणित व्यवसाय से अलग होने के अयोग्य हों।