मानवाधिकार की व्यापकता - scope of human rights

मानवाधिकार की व्यापकता - scope of human rights


आज चारों ओर मानवाधिकारों पर चर्चा हो रही है. इस विषय पर सेमिनार और सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। दरअसल जैसे-जैसे कोई समाज सभ्य और विकसित होता जाता है, अधिकार, कुछ करने या रखने की आजादी है और यह आजादी विधि द्वारा मान्यता प्राप्त व संरक्षित है। इसी प्रकार मानवाधिकार ऐसे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को मानव मात्र होने के नाते प्राप्त होते हैं, भले ही उसका लिंग, राष्ट्रीयता, वर्ग धर्म आदि कुछ भी हो। आज हमें जो मानवाधिकार प्राप्त हैं, वे हमें एकदम से प्राप्त नहीं हो गए हैं वरन इनकी प्रगति धीरे-धीरे कदम-दर-कदम हुयी है। कहा जा सकता है कि मानवाधिकारों का इतिहास काफी पुराना है, बेहद लंबा है। प्रस्तुत अध्याय में हम मानवाधिकार के इतिहास की ही चर्चा करेंगे। यह सत्य है कि मानवाधिकार की अवधारणा बीसवीं सदी में अधिक लोकप्रिय हुयी लेकिन मानवाधिकारों का अस्तित्व तभी से है जब से मानव ने सभ्य होना सीखा।

कुछ विद्वानों के मुताबिक मानवाधिकारों की जड़े प्राचीन यूनान एवं रोम तक जाती हैं जहां स्टाईल विद्वानों ने सबसे पहले मानवाधिकारों की व्याख्या करते हुए इसकी परिभाषा प्रतिपादित की स्टाईल दार्शनिकों ने मानवाधिकारों को प्राकृतिक कानून के रूप में मान्यता दी थी। सुकरात और प्लेटो जैसे विद्वानों ने भी मानवाधिकारों पर अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए थे जिस कारण उस समय मानवाधिकार से राजनैतिक आदर्शवाद भी जुड़ गया। धीरे-धीरे मान लिया गया कि प्रत्येक व्यक्ति के कुछ प्राकृतिक अधिकार होते हैं। चूंकि ये अधिकार प्राकृतिक होते हैं इसलिए माना जाता है कि ये राज्य (State) की स्थापना से पहले से ही अस्तित्व में हैं और इसलिए इन्हें राज्य ऊपर माना जाता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद एक ऐसे संगठन की जरूरत महसूस की गयी जो दुनिया के विभिन्न देशों के बीच समन्वय का काम करे ताकि दुनिया को एक और विश्व युद्ध को सामना न करना पड़े। और इसी आवश्यकता के लिए राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी। राष्ट्र संघ की स्थापना से ही मानवाधिकार की अवधारणा काफी लोकप्रिय हो गयी और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल गयी। यह सत्य है कि राष्ट्र संघ की प्रस्तावना में मानवाधिकारों या प्राकृतिक अधिकारों का कहीं कोई जिक्र नहीं था

लेकिन बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकार के क्षेत्र में काफी काम किया। युद्ध के दौरान बंदी बनाये गए सैनिकों के मामलों में तो राष्ट्र संघ ने रेखांकित करने योग्य कदम उठाए। उसने एक आचार संहिता तैयार की ताकि युद्ध बंदियों के साथ कोई बुरा बर्ताव न कर सके। इसके अलावा राष्ट्र संघ की पहल पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना हुयी और इसी के साथ श्रमिकों व बच्चों के अधिकारों को संरक्षित करने के प्रयास भी शुरू हो गए। हालांकि राष्ट्र संघ ने अपने छोटे से कार्यकाल में काफी उल्लेखनीय कार्य किए थे लेकिन फिर भी यह संघ अपने उद्देश्यों में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया। इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) आरंभ हुआ। इस विश्वयुद्ध की सामाप्ति के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की स्थापना की गयी। इसके कुछ समय बाद ही 10 दिसंबर, 1948 को वैश्विक मानव अधिकार की घोषणा की गयी थी इसलिए इसी दिन को बाद में मानव अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। धीरे-धीरे मानवाधिकारों की अवधारणा विस्तार पाती गयी और इसकी धारणा विकसित होती गयी। फिर राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व सामाजिक स्तरों पर एक मानवीय जीवन दर्शन का विकास होता गया। बाद के समय में विश्व की सरकारों से निम्नलिखित मानवाधिकारों की मांग की गयी


1. संविधानवाद की मांग


2. प्रतिनिधि सरकार मांग


3. सार्विक मताधिकार


4. जन शिक्षा


5. जनस्वास्थ्य


6. लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग