द्वितीयक समूह - secondary group

 द्वितीयक समूह - secondary group


द्वितीयक समूह प्राथमिक समूह के ठीक विपरीत होता है। इसके सदस्य में प्राथमिक समूह के विपरीत गुण पाए जाते हैं। द्वितीयक समूह के सदस्यों में आमने सामने का संबंध नहीं होता है तथा इनमें पर्सनल इंवॉल्वमेंट भी कम होता है इसके संबंध भी नहीं होता है और ना तो कोई प्रभाव कारी सामान्य उद्देश्य होता है।


हालैंडर (1947) ने द्वितीयक समूह को इस प्रकार को परिभाषित किया है" द्वितीयक समूह अवैयक्तिक होते हैं और इनके सदस्यों के बीच संविदात्मक संबंध पाया जाते हैं। ऐसे समूहों के साथ तादात्म्य स्थापित करना अपने आप में एक लक्ष्य नहीं होता है बल्कि किसी लक्ष्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन होता है।" लिंडग्रेन 1969 के अनुसार " द्वितीयक समूह अधिक अवैयक्तिक होते हैं तथा इसके सदस्यों के बीच औपचारिक अथवा संविदात्मक संबंध होते हैं।"