धर्मनिरपेक्षता - Secularism

धर्मनिरपेक्षता - Secularism


जार्ज जैकब होलियॉक (1817-1906) को धर्म निरपेक्षतावाद का जनक कहा जाता है। जार्ज जैकब होलियॉक के अनुसार, सभी मानवों की हितरक्षा एवं स्थति में सुधार धर्म निरपेक्षताबाद से ही हो सकती है। धर्मनिरपेक्षता ईश्वर के अस्तित्व को मानता नहीं बल्कि ईश्वर का विरोध नहीं करता है। धर्मनिरपेक्षता में कट्टरता, हट्टवादिता को महत्त्व नहीं है। सभी धर्मों के प्रति तटस्थता रखने का समर्थन धर्म निरपेक्षतावाद करता है। यह एक मानवतावादी विचारधारा है। दैनदिन जीवन, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं कानून धर्म से पूरी तरह से स्वतंत्र मानता है। यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाकर सामाजिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।


स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रुप स्वीकृत किया गया। राष्ट्र की आवश्यकता के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का स्वीकार किया गया। धर्मनिरपेक्षता तत्व को सामाजिक एवं दार्शनिक आधार है। धर्मनिरपेक्षता वैज्ञानिक मूल्यों पर अधिष्टित है।

भारतीय शिक्षा का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष बनाने पर बल दिया जाएगा। मानव कल्याण के लिए धर्मनिरपेक्ष शिक्षा सर्वाधिक फलदायी है। अंधविश्वास, अनिष्ट प्रथा-परंपरा, कुरीतियाँ आदि का उन्मूलन कर सभी धर्मों के मानवों का कल्याण करना धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का उद्देश्य है। सामाजिक शिक्षा धर्मनिरपेक्षता पर आधारित होनी चाहिए भारतीय समाज ने धर्मनिरपेक्षता का स्वीकार करते समय किसी एक विशेष धर्म को विशेष स्थान नहीं दिया है. नहीं किसी धर्म का अनादर किया है। सभी धर्मो का समान आदर धर्मनिरपेक्षता का मूलाधार है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मूलाधार निधर्मिकरण नहीं बल्कि सभी धर्मों का समान आदर करना है। भारतीय संविधान सभी धर्मो को समान स्वतंत्रता प्रदान करता है। सर्वधर्म समभाव, मैत्रीभाव, सभी धर्मो का सहअस्तित्व.सहिष्णुता, निष्पक्षता आदि तत्व भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मूलाधार है। महात्मा गांधीजी को सर्वधर्म समभाव आधारित धर्मनिरपेक्षता अपेक्षित थी एवं पंडित नेहरू को तर्कबुद्धि आधारित निरपेक्ष चिंतन तथा लौकिकता पर आधारित धर्मनिरपेक्षता आपेक्षित थी। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के कारण धर्मनिरपेक्ष शिक्षा देना आवश्यक है।