आत्म प्रबंधन के तकनीक - self management techniques

आत्म प्रबंधन के तकनीक - self management techniques


प्रत्येक सामान्य व्यक्ति की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि वह अपने आत्म-संप्रत्यय के अनुसार आचरण करें और लोग उसकी अच्छी छवि बनायें। सामाजिक मनोवैज्ञानिकों ने उसे छवि प्रबंधन का नाम दिया। बेरी श्लेकर (1980) ने छवि प्रबंधन के बारे में कहा कि मानव जाति की प्रवृत्ति वास्तविक या काल्पनिक सामाजिक अंतरक्रियाओं में प्रक्षेपित की जाने वाली छवि को अवचेतन अथवा चेतन स्तर पर नियंत्रित करने का प्रयास है। इसका तात्पर्य है कि लोग इसके लिए सजग रहते हैं कि दूसरे लोग उस व्यक्ति में कोई बुराई, अवांछनीय शीलगुण या व्यवहार ना पाएँ और लोगों पर उसकी अच्छी छाप बने। एक प्रकार से छवि प्रबंधन वह प्रक्रम है, जिससे व्यक्ति किसी अवसर पर अपने व्यवहारों के साथ-साथ उस स्थिति को भी चयनित एवं नियंत्रित करते हैं, जिनमें उसके व्यवहार होते हैं। ऐसा व्यक्ति इसलिए करता है ताकि वह वैसी ही छवि प्रस्तुत करें, जैसी छवि प्रत्याशित है। व्यक्ति चाहता है कि दूसरे लोग उसको पसंद करें और उससे प्रभावित हो । एरविन गाफ़्फ़मैन (1959) ने सामाजिक व्यवहार को नाटक के पात्रों द्वारा किए जाने वाले निष्पादन के सदृश्य बताया है। उनका कहना है

कि व्यक्ति अपने प्रतिदिन के जीवन में अन्य व्यक्तियों से अंतरक्रिया करते समय एक निश्चित छवि प्रक्षेपित करने का प्रयत्न करता है तथा यह मानता है कि अन्य व्यक्ति भी ऐसा ही करते हैं। सामान्य रूप से कहा जाता है कि जीवन एक रंगमंच है और मनुष्य उसमें नाटक के पात्रों की भांति अनेक प्रकार की भूमिकाओं का निर्वहन करता है। आत्म प्रबंधन में व्यक्ति अनेक प्रकार के तकनीकों का प्रयोग करता है जो इस प्रकार है-


1. आत्म- प्रोन्नति


यदि किसी व्यक्ति के लिए अंतरक्रिया का यह उद्देश्य है कि वह अपने को बुद्धिमान, किसी विशिष्ट कौशल जैसे गायन, किसी प्रकार की क्रीड़ा इत्यादि अथवा व्यक्ति के शील गुण विशेष में प्रवीणता सिद्ध करें तो प्रायः आत्म प्रोन्नति तकनीक का उपयोग किया जाता है। गॉडफ्रे जोन्स एवं लॉर्ड (1980) के अनुसार ऐसे लक्ष्य वाले व्यक्ति प्रतिक्रियात्मक चारण कला के विपरीत रूप में अग्रलक्षी के क्रियाएं करते हैं।

यदि आत्म-प्रोन्नतिकर्ता किसी ऐसे व्यक्ति से अंतरक्रिया कर रहा होता है, जिसको उसके बारे में अंतरंग जानकारी है, तो वह अपनी कमियों का उल्लेख पहले करता है, और उसके बाद अपने उन धनात्मक शीलगुणों का चित्रण करता है। जिसकी जानकारी किसी को नहीं है। 


2. चाटुकारिता


सभी व्यक्तियों ने अनुभव किया होगा कि अनेक लोग किसी की प्रशंसा उसी के सामने करते हैं तथा उसके विचारों से तत्काल सहमत होते हैं। उसके व्यवहारों एवं निर्देशों के अनुसार उसकी उपस्थिति में आचरण करते हैं तथा उसमें अपने आस्था भी व्यक्त करते हैं। ऐसा करने के पीछे लक्षित व्यक्ति की दृष्टि में अच्छी छवि सुधारने की अभिप्रेरणा काम करते हैं. चाटुकारिता उन व्यवहारों में प्रतिबिंबित होती है।

जिनको व्यक्ति अपने गुणों को आकर्षक बनाने के उद्देश्य से करता है। लोग समझते हैं कि यदि दूसरे व्यक्ति उन्हें पसंद करते हैं, तो वे उन लोगों की आवश्यकता अनुसार सहायता भी करते हैं। जोंस (1964) के अनुसार दूसरों को प्रभावित करने की एक सामान्य तकनीक चाटुकारिता है। जिसके अंतर्गत चापलूसी, लक्षित व्यक्ति में प्रकट रूप से प्रदर्शन, सहर्ष सहमति तथा उसको देखकर प्रसन्न मुद्रा में उसकी आवभगत इत्यादि सम्मिलित है। डोनरस्टाइन एवं डोनरस्टाइन (1984) के अनुसार चाटुकारिता का उपयोग करने वाला लक्षित व्यक्ति पर जितना अधिक आश्रित होता है, उसको उतनी ही अधिक आवश्यकता होती है कि वह लक्षित व्यक्ति के लिए आकर्षक बना रहे और वह उतना ही अधिक चाटुकारिता का उपयोग करता है। ऐसी स्थिति में इसकी संभावना बढ़ जाती है कि लक्षित व्यक्ति उसके स्वार्थ को पहचान ले। 


3. भयोत्पादन


व्यक्ति की आवश्यकता होती है कि वह दूसरों की दृष्टि में समर्थवान व्यक्ति के रूप में प्रत्यक्षीकृत किया जाए। इसके लिए लोग कभी-कभी भयोत्पादन की तकनीक का उपयोग करते हैं। इस तकनीक का उपयोग व्यापक स्तर पर किया जाता है। पुलिस का भय उत्पन्न करके विधि सम्मत व्यवस्था बनाए रखना इत्यादि। इसके लिए व्यक्ति अपने शारीरिक बल, राजनीतिक पहुंच, भौतिक संसाधन इत्यादि का भी उपयोग करता है। उदाहरण डाकू जब डकैती करने के लिए जाते हैं, तो उनका सबसे पहला काम यह होता है कि बम फोड़कर या कर्णभेदी ध्वनि उत्पन्न कर, निर्दयता पूर्वक व्यवहार के माध्यम से लोगों को पहले ही भयभीत कर लूटपाट करते हैं। प्राय: माता-पिता अध्यापक या अधिकारी भय उत्पन्न कर बच्चों को, छात्र-छात्राओं को एवं कर्मचारियों को अनुशासन में रखते हैं। इस तकनीक के माध्यम से दूसरों के व्यवहार को नियंत्रित किया जा सकता है। किंतु इसमें भयभीत करने वाले व्यक्ति की आकर्षक छवि नहीं बनती है।


4. उदाहरणीकरण


व्यक्ति, नैतिक श्रेष्ठता, परोपकार जैसे शीलगुणों की छवि प्रक्षेपित करने के उद्देश्य से इस तकनीक का उपयोग करता है।

उदाहरण मान लीजिए कि कुछ लोग बस पकड़ने की जल्दी में हैं और तेजी से बस अड्डे की ओर जा रहे हैं। अचानक कोई दुर्बल एवं अंधा व्यक्ति सामने दिखाई पड़ता है, जो बार-बार सहायता की पुकार लगा रहा है कि उसे कोई सहारा देकर सड़क पार करा दे। ऐसे में यदि उनमें से कोई व्यक्ति दूसरों से कहता है कि आप लोग चलें, मैं दूसरी बस से आ जाऊंगा। मुझे इस असहाय व्यक्ति को पहले सड़क पार पहुंचाना है। ऐसा कहते हुए वह उस व्यक्ति को सहारा देकर सड़क पार कराने लगता है। वह व्यक्ति अपना उदाहरण प्रस्तुत कर तकनीक लगाता है कि दूसरे व्यक्तियों की नजर में वह एक नैतिक मूल्य एवं आदर्शवादीता की छवि प्रस्तुत करता है। ऐसा करने के उपरांत प्राय: ऐसा देखा गया है कि दूसरे अन्य लोग भी इस कार्य से अभिप्रेरित होकर भविष्य में ऐसा करने के लिए अभिप्रेरित हो सकते हैं। 


5. आत्मा विकलांगता


आत्म-सम्मान को बनाए रखने के लिए कभी-कभी व्यक्ति इस तकनीक का भी उपयोग कर लेते हैं। जब किसी कार्य में बाधा उत्पन्न हो जाए साथ ही उस कार्य में सफलता पाने की संभावना कम हो और व्यक्ति असफल हो जाए, तो ऐसी परिस्थिति में वह व्यक्ति अनेक प्रकार की व्याख्या अपने पक्ष में प्रस्तुत करता है

कि क्यों हम असफल हो गए। व्यक्ति इसका कारण परिस्थितिजन्य बाधाओं के असफलता को बताता है। इस तकनीक का एक रुचिकर अध्ययन बरग्लास एवं जोन्स (1978) ने किया। जिसमें इन लोगों ने छात्रों के अलग-अलग समूह समाधान योग्य अथवा समाधान रहित 20-20 समस्याएँ हल करने को दीं। उसके बाद दोनों समूहों के आधे प्रयोज्यों को गलत फीडबैक देते हुए बताया कि उन्होंने 80% समस्याओं का सही हल किया है। आधे प्रयोज्यों को किसी प्रकार की फीडबैक नहीं दी गयी। ऐसा देखा गया कि जिन प्रयोगों को समाधान रहित समस्याएं दी गई थी. फीडबैक के बाद भी उन समस्याओं का अंत कठिन बताया। इन प्रयोज्यों ने उन समस्याओं को हल करने की अपनी क्षमता एवं योग्यता में कम आत्मविश्वास व्यक्त किया। परिकल्पना की गई थी कि समाधान रहित समस्याओं और सफलता के फीडबैक पाने वाले प्रयोज्य भविष्य में ऐसी समस्याओं के मिलने पर आत्मा-विकलांगता तकनीक का उपयोग करेंगे, क्योंकि वह सफलता के प्रत्याशा नहीं करते हैं। अतः अध्ययनकर्ताओं ने छात्रों को 2 औषधियों में से एक का सेवन करने का विकल्प दिया। एक औषधि के बारे में बताया गया कि उसको लेने पर समस्या समाधान की क्षमता में वृद्धि हो जाती है और दूसरी औषधि से क्षमता नष्ट हो जाती है। इसके उपरांत ज्ञात होता है कि जिन प्रयोगों को पहले समाधान रहित समस्याओं का हल पाने की सफलता मिली थी, किंतु अपनी योग्यता पर उनको आत्मविश्वास नहीं था। उन्होंने क्षमता नष्ट करने वाली औषधि का चयन अधिक संख्या में किया। क्योंकि नई समाधान रहित समस्याओं को हल न कर पाने पर वह आत्म-विकलांगता तकनीक का सहारा ले सकें। 


6. विनम्रता भाव


इस तकनीक का उपयोग छवि प्रबंधन में काफी व्यापक स्तर पर किया जाता है। इसका उपयोग प्रक्षेपित करने के लिए नहीं, बल्कि लोगों की सहानुभूति पाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग दूसरों पर आश्रित होने की अपनी विवशता को प्रचारित करते हैं। प्राय: इस उपयोग लोग उन स्थितियों में करते हैं, जिनमें वे छवि प्रबंधन की अन्य तकनीकों का उपयोग करने में अपने को सक्षम अनुभव नहीं करते। इसमें व्यक्ति पहले किसी टास्क को न कर पाने में अपनी विवशता का उल्लेख करता है और निकट के व्यक्तियों से उस काम को करा लेता है। मूलतः इस तकनीक में लोग किसी विशेष स्थिति में अपनी विवशता बताकर अन्य लोगों की सहायता प्राप्त कर लेते हैं। 


7. आत्म-परिवीक्षण


स्नाइडर एवं आइकेस (1985) ने इसको स्वयं या आत्म से संबंधी व्यवहारों का एक प्रमुख कारक बताया है।

अनेक व्यक्ति बहुत कम मात्रा में अपनी वाचिक तथा अवाचिक आत्म प्रस्तुति में आत्म नियंत्रण रखते हैं। एक शीलगुण के रूप में इस तकनीक की विशेषता कुछ लोगों में अत्यंत अधिक तथा कुछ लोगों में कम मात्रा में होती है। उच्च स्तर के आत्म-परिवीक्षण वाले व्यक्ति सामाजिक अंतरक्रियाओं में दूसरे व्यक्तियों की आत्म प्रस्तुति एवं अभिव्यक्ति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और वे इन संकेतों का उपयोग छवि प्रबंधन के उद्देश्य से अपनी स्थिति को नियंत्रित एवं नियमित करते हैं। उच्च स्तर के आत्म- परिवीक्षण वाले व्यक्ति अपने व्यवहार और कथनों की उपयुक्तता पर ध्यान देते हैं। समूह में या किसी सामाजिक अवसरों पर भी वैसा ही आचरण करने का प्रयत्न करते हैं, जिसे अन्य लोग पसंद करते हैं। वहीं निम्न स्तर के आत्म परिवीक्षण वाले व्यक्ति सामाजिक अंतर क्रियाओं में बातचीत करते समय मेरा /मेरी, मुझको, मैंने जैसे प्रथम पुरुष के शब्दों का अधिक उपयोग करते हैं। जबकि उच्च स्तर के आत्म-परिवीक्षण वाले व्यक्ति वह, वे, उन्होंने उसका, उनका जैसे शब्दों का चयन करते हैं। क्योंकि ऐसे लोग दूसरे की अनुक्रियाओं में अधिक रुचि लेते हैं।