परिणामों की गंभीरता - severity of consequences

परिणामों की गंभीरता - severity of consequences


किसी घटना के प्रभाव का अधिक गंभीर होने की दशा में प्रेक्षक उस घटना का कारण किसी व्यक्ति पर आरोपित करते हैं। जबकि परिणामों के गंभीर ना होने की दशा में उसका कारण संयोग तथा परिस्थिति पर निर्धारित करते हैं। उदाहरण यदि बच्चों के स्कूल के सामने एक ट्रक गुजरता है और तभी उस ट्रक के नीचे एक बच्चा आ गया। बच्चा सड़क के बीचो बीच था तथा अगले दोनों तथा पिछले दोनों पहियों के बीच में आने के कारण ट्रक से बच्चे को कोई क्षति नहीं हुई। केवल मामूली सी चोट जमीन पर गिरने से आयी। वहीं एक दूसरी स्थिति में मान लीजिए कि बच्चा ट्रक से कुचल कर मर गया। तो उपरोक्त दोनों परिस्थितियों में घटनाओं को देखने वाले प्रेक्षक क्या समझेंगे? ज्यादातर संभावना यह है कि पहली स्थिति में प्रेक्षक घटना का कारण ट्रक के ड्राइवर की लापरवाही को कम समझेंगे। जबकि दूसरी स्थिति में पूरा उत्तरदायित्व ट्रक ड्राइवर का ही समझा जाएगा। जबकि देखा जाए तो दोनों ही स्थितियों में ड्राइवर ने ना तो ट्रक की गति ही कम की है और ना ही कोई भी प्रयास बच्चे को बचाने का किया।

अतः चोट की मात्रा चाहे जितनी भी हो ड्राइवर का दोष दोनों ही स्थितियों में समान समझा जाना चाहिए। परंतु दैनिक जीवन में ऐसा नहीं होता है। हम उत्तरदायित्व का गुणारोपण परिणामों की गंभीरता के आधार पर करते हैं। कर्ता की उपस्थिति का भ्रम


हम प्रायः इस भ्रम में रहते हैं कि किसी भी घटना का घटित होना अथवा घटित ना होना दोनों ही किसी न किसी व्यक्ति के प्रयास से ही होता है। जबकि वास्तविकता यह होती है कि उनमें से अधिकांश घटनाएं किसी व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होती, उनका घटित होना अथवा ना होना मात्र संयोग अथवा अनिवार्य कारकों पर निर्भर करता है। उदाहरण लाटरी का टिकट खरीदने वाले अनेक लोगों में भ्रम हो रहा है कि यदि हम अपने लकी नंबर का टिकट खरीद ले तो परिणामों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा सकता है। अनेक व्यक्ति विभिन्न अच्छी अथवा बुरी घटनाओं का कारण स्वयं को अथवा किसी अन्य व्यक्ति को मानकर उसकी प्रशंसा अथवा निंदा करते रहते हैं। जबकि घटनाएं मात्र संयोग से घटित हुई रहती है। संयोगवश हुई दुर्घटना का कारण किसी व्यक्ति को समझने में रोष उत्पन्न होता है। जबकि यह समझना की दुर्घटना को कोई रोक नहीं सकता था, निराशा एवं दुख प्रदान करता है।