सेक्स/जेंडर विभेद - sex/gender discrimination
सेक्स/जेंडर विभेद - sex/gender discrimination
यदि हम अपने चारों ओर निगाह डालें तो हमें अपने समाज में कई तरह के भेदभाव और असमानताएँ देखने को मिलेंगी। वहीं, इन्हें औचित्य प्रदान करतीं और स्वाभाविक करार देती धारणाओं का चलन भी दिखलाई देगा। इनमें जिस भेद या असमानता की व्याप्ति सर्वाधिक और उतना ही स्वाभाविक है वह है स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता। इसके पक्ष में आम तौर पर जो तर्क प्रस्तुत किया जाता रहा है वह यह कि चूँकि वे भिन्न शारीरिक संरचना लिए जन्म लेते हैं, इसलिए उनके बीच विद्यमान तमाम सामाजिक भिन्नताएँ और असमानताएँ उचित हैं। समाज विज्ञान में इस मत को जैविक निर्धारणवाद कहा जाता है। जैविक निर्धारणवाद यानि यह विश्वास कि सामाजिक परिक्षेत्र की घटनाओं का निर्धारण जैविक/शारीरिक बनावट से होता है।
स्त्री और पुरुष की शारीरिक संरचनाओं के भिन्न होने पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।
यह प्राकृतिक है और इसलिए अपरिवर्तनीय भी। अब यदि यही उनकी सामाजिक स्थिति का भी निर्धारक है तो उसे भी नहीं बदला जा सकता। इसलिए यह लोकप्रिय जुमला गढ़ा गया कि स्त्री की देह उसकी नियति है। यह और बात है कि जैविक निर्धारणवाद के आधार पर पुरुष के लिए भी यही बात सिद्ध होती है कि उसका शरीर उसकी नियति है। लेकिन पुरुष के संदर्भ में यह चिंताजनक नहीं है। कारण उसकी स्थिति दोयम नहीं हैं। दोयम दर्जा तो स्त्री को प्राप्त है। वह पराधीन है। इसलिए इस तर्क पर सवाल भी स्त्रियों और उनकी मुक्ति के पक्षधरों ने ही उठाया।
कोई भी तर्क तभी अपने पाँव मजबूती से जमा सकता है जब उसके पक्ष में साक्ष्य हो। जैविक निर्धारणवाद को द को सही साबित करने के लिए साक्ष्य जुटाने की जरूरत नहीं थी। उसके लिए देश-काल 'खुद' के व्यापक फलक पर प्रमाण पहले से ही मौजूद थे।
जिन समाजों और अवधियों का इतिहास आम है या जिन्हें हम मुख्यधारा का समाज मानते हैं उनमें कमोबेश स्त्रियों की स्थिति दोयम ही पाई गई। जैविक निर्धारणवाद के लंबी अवधि तक कारगर रहने का यही कारण भी रहा। इसी आधार पर स्टीवन गोल्डबर्ग ने 'पितृसत्ता की अपरिहार्यता' (The Inevitability of Patriarchy) का सिद्धांत पेश किया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न समाजों/संस्कृतियों से प्रमाण जुटाए थे।
स्त्रीवादियों और स्त्री की चिंता करने वालों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इस तर्क की काट प्रस्तुत करना था। इसके लिए प्रमाण चाहिए थे। प्रमाण ऐसे समाजों के जिनमें स्त्रियों का दर्जा दोयम न हो। यह मार्गरेट मीड जैसी स्त्री मानवविज्ञानियों और अन्य स्त्रीवादियों द्वारा हाल-फिलहाल तक आजीविका की आदिम प्रणाली को अपनाए समाजों का अध्ययन किए जाने से संभव हो सका। इन समाजों में विकसित या मुख्यधारा के समाजों की तुलना में कम या न के बराबर असमानता पाई गई। इस आधार पर एलीनोर लीकोक ने 'समतामूलक समाज' का सिद्धांत विकसित किया। यह उनकी ओर से गोल्डबर्ग को जवाब था। इसके साथ ही, यह भी पाया गया कि सभी समाज पितृवंशीय और पितृकेंद्रित ही नहीं हैं। कई समाजों में मातृवंशीयता भी रही है और कुछ में तो आज भी यह विद्यमान है।
ऐसे समाजों में स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर पाई गई। इससे जैविक निर्धारणवाद पर प्रहार करने और इस समझ के निर्मित होने का मार्ग प्रशस्त हुआ कि स्त्री या पुरुष होने का यानि स्त्रीत्व और पुरुषत्व का शारीरिक संरचना के साथ अनिवार्य जुड़ाव नहीं है। विभिन्न संस्कृतियों में स्त्री और पुरुष होने के मायने भिन्न-भिन्न होते हैं। भारतीय समाज में ही देखें तो हमें स्त्री और पुरुष की स्थितियों में विविधता दिखलाई देगी। सबसे बड़ा भेद तो जनजाति समाज और जाति समाज के बीच है। ऐसा पाया गया है कि जनजातियों में स्त्रियाँ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। सभी जनजातियाँ भी एक ही अवस्था में जीवन बसर नहीं कर रही हैं। कुछ पर जाति-समाज का असर भी पड़ा है। इसलिए सभी जनजातियों में स्त्रियों की स्थिति एक समान नहीं है। इसी तर्ज पर, जाति समाज के भीतर निम्न जातियों की स्त्रियों और ऊँची जातियों की स्त्रियों की स्थितियों में भारी विविधता है। यह भेद पुरुषों की स्थितियों के स्तर पर भी विद्यमान है। जाति और जेंडर के बीच की अंतस्संबंधता पर आगे विस्तार से विचार किया है। दूसरे शब्दों में, स्त्री हो या पुरुष, उसके वजूद के सामाजिक पहलू यानि स्त्रीत्व अथवा पुरुषत्व का जैविक पहलू यानि शारीरिक बुनावट से अनिवार्य जुड़ाव नहीं है और इसलिए स्त्री की दोयम स्थिति दूर की जा सकती है। ऐसे समाज के निर्माण के बारे में सोचा जा सकता है, जिसमें स्त्री और पुरुष के बीच किसी भी प्रकार की असमानता न हो।
वार्तालाप में शामिल हों