हिंदू और मुस्लिम विवाह समानताएँ एवं अंतर - Similarities & Differences between Hindu and Muslim Marriage

हिंदू और मुस्लिम विवाह समानताएँ एवं अंतर - Similarities & Differences between Hindu and Muslim Marriage


हिंदू विवाह और मुस्लिम विवाह दो भिन्न संस्कृतियों की देन है और इसी कारण इन दोनों प्रकार की विवाह पद्धतियों में अनेक अंतर पाए जाते हैं। साथ ही इन विवाह पद्धतियों में कुछ समानताएँ भी पाई

 जाती है, जो इस प्रकार है हिंदू और मुस्लिम विवाह में समानताएँ (Similarities between Hindu and Muslims Marriage)-


1. बहुपत्नी विवाह प्रथा ) Polygyny: (हिंदू और मुस्लिम विवाहों में पहली समानता यह है कि इन दोनों में बहुपत्नी विवाह प्रथा का प्रचलन रहा है। दोनें में एक पुरुष को एक से अधिक स्त्रियों के साथ विवाह करने की आज्ञा रही है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हजरत मुहम्मद ने कुरानक मुसलमान को चाशरीफ में ए. र स्त्रियों तक ही विवाह करने की आज्ञा दी है। हिंदुओं में इस प्रकार स्त्रियों की संख्या निश्चित नहीं की गई। उनमें मुख्य रुप से पुत्रप्राप्ति उद्देश्य से - में 1955 बहुपत्नी विवाह प्रथा का प्रचलन हुआ। हिंदू विवाह अधिनियम द्वारा हिंदुओं में बहुपत्नी विवाह पूर्णतः समाप्त कर दिए गए। अब कोई भी हिंदू एक पत्नी के जीवति रहते हुए दूसरा विवाह नहीं कर सकता है।

मुसलमानों में अभी भी एक पुरुष को चार स्त्रियों तक से विवाह करने की अनुमति है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संविधान के नीतिनिर्देशक ध्यान में रखत सिद्धान्तों को हुए प्रत्येक नागरिक के लिए सामान्य संहिता हो।


2. बाल विवाह (Child Marriage):- हिंदू तथा मुसलमान दोनों में ही बाल विवाह प्रचलित हैं। आरम्भ में मुस्लिम कानून के अनुसार बाल-विवाह अवैध थे, परंतु जब मुसलमान भारत में आये और अनेक हिंदू भी मुसलमान बन गये, तो यहाँ मुसलमानों में बाल-विवाहों का प्रचलन हुआ। मुस्लिम विवाह कानून के अन्तर्गत, उन लोगों को जिनका विवाह 15 वर्ष की आयु के पूर्व उनके संरक्षकों द्वारा कर दिया जाता है, इस विवाह को अस्वीकार करने का अधिकार दिया गया है, जिसे ख्याल उल-बुलूग' कहते हैं। 1939 के मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम के अनुसार, जिनका विवाह 15 वर्ष की आयु के पूर्व हो चुका है, उन्हें 18 वर्ष की आयु के पहले. ऐसे विवाह को मानने से इन्कार कर देने का अधिकार दिया गया है।


हिंदू और मुस्लिम विवाह में अंतर (Difference between Hindu and Muslim Marriage) 


हिंदू तथा मुस्लिम विवाह पद्धति में अनेक अंतर पाए जाते हैं, जो इस प्रकार हैं-


1. हिंदू विवाह एक पवित्र धार्मिक संस्कर है और मुस्लिम विवाह एक समझौता है ) Hindu Marriage is a religious sacrament and Muslim Marriage is a contract ( -:हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसका मुख्य उद्देश्य पुत्रप्राप्ति है। पुत्रों का कार्य अपने दान देकर- पितरों को पिण्ड, उनका तर्पण आदि करके उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना है। दूसरी ओर मुसलमानों में विवाह एक संविदा या समझौता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य यौन संबंध तथा सन्तानोत्पादन है। हिंदू में यौनसंबंध या रति को विवाह का अन्तिम उद्देश्य - माना गया है. जबकि मुसलमानों में यौन-संबंधों को प्रधानता दी गई है।


2. हिंदुओं में दहेज तथा मुसलमानों में मेहर की प्रथा ) Dowry among Hindus and Dower among Muslims (हिंदुओं में पत्नी अपने पिता के घर से दहेज के रूप में धन लाती है.

जबकि मुसलमानों में पति पत्नी को कुछ धन राशि जिसे ‘मेहर' कहते हैं, देता है या देने का वादा करता है। हिंदुओं में लड़के को दहेज दिया जाता है और मुसलमानों में पति, पत्नी को मेहर देता है। मुस्लिम समाज में विवाह एक समझौता माना जाता है और इसी कारण समझौते की आवश्यक शर्त के रूप में पति, पत्नी की मेहर देता है। हिन्छू जिस प्रकार दहेज की कुप्रथा से परेशान है, उसी प्रकार मुसलमान मेहर की प्रथा से। हिंदुओं में दहेज तथा मुसलमानों में मेहर को नियंत्रित करने के लिए आन्दोलन चल रहे हैं।


3. विवाह में निषिद्ध संबंध ) Prohibitions in Marriage -: (हिंदुओं में सपिण्ड और सगोत्र विवाह वर्जित हैं। सपिण्ड में आजकल पिता की ओर पाँच तथा माता की ओर से तीन पीढ़ियों तक के लोगों में परस्पर विवाह वर्जित हैं। मुसलमानों में केवल कुछ निकट रक्त सम्बन्धियों को छोड़कर सबके साथ विवाह किया जा सकता है। निषिद्ध संबंधों के कारण हिंदुओं में विवाह का क्षेत्र बहुत सीमित हैं। मुसलमानों में यह क्षेत्र इतना सीमित नहीं है. क्योंकि उनमें कुछ अति निकट के रिश्तेदारों को छोड़कर शेष सब में विवाह हो सकते हैं।


4. विवाह विच्छेद का अधिकार (Right to Divorce):- प्रचलित व्यवस्था के अनुसार, हिंदू विवाह एक अटूट बन्धन है जिसे केवल मृत्यु के बाद ही तोड़ा जा सकता है। यहाँ पति-पत्नी का संबंध जन्म-जन्मान्तर का माना जाता है, इसलिए हिंदुओं में तलाक के द्वारा इस संबंध को समाप्त करने का प्रश्न ही उपस्थिति नहीं होता। दूसरी ओर, मुस्लिम विवाह पति-पत्नी के बीच एक समझौता है, जिसे कुछ विशेष अवस्थाओं में तोड़ा जा सकता है। इस्लाम के पुराने कानून के अनुसार, पति का तलाक संबंधी विशेष अधिकार प्रदान किए गए थे। वह केवल तीन तीन बार 'तलाक' शब्दा का उच्चारण करके ही अपनी पत्नी को छोड़ सकता था। सन् 1939 के 'मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम के अनुसार अब पत्नी भी कुछ विशेष अवस्थाओं में न्यायालय द्वारा पति को तलाक दे सकती है। हिंदू स्त्री-पुरुषों को भी 1955 में पारित हुए हिंदू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत कुछ विशेष परिस्थितियों में विवाह-विच्छेद का अधिकार दिया गया है।


5. विधवा विवाह (Widow Marriage) : हिंदुओं में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 के पारित होने के उपरान्त भी विधवा पुनर्विवाह का प्रचलन नहीं हो सकता है। उनमें यह धारणा प्रचलित है कि जिस लड़की को कन्यादान के रूप में एक पुरुष को दिया जा चुका है, उसे पति की मृत्यु के पश्चात् अन्य पुरुष को दुबारा दान में कैसे दिया जा सकता है?

साथ ही, यहाँ विवाह को जन्म-जन्मान्तर का अटूट संबंध माना गया है। फिर ऐसी दशा में पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा स्त्री पुनर्विवाह कैसे कर सकती है? मुस्लिम समाज में विवाह के एक समझौता होने के कारण पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा को दूसरा विवाह करने का अधिकार है। वहाँ विधवा विवाह को अपवित्र या बुरा नहीं माना जाता। उनमें पति की मृत्यु के बाद कुछ निश्चित समय के पश्चात् ही एक विधवा पुनर्विवाह कर सकती है। इस प्रतीक्षा काल को इद्दत' कहते हैं। इद्दत का उद्देश्य यह पता लगाना है कि स्त्री अपने पहले पति से गर्भवती है या नहीं ताकि यह निश्चित करने में झगड़ा न हो कि संतान का पिता कौन है। इस इद्दत के प्रतीक्षा-काल के पश्चात् विधवा स्त्री विवाह कर सकती है। आजकल हिंदू समाज में अनेक कारणों से विधवा पुनर्विवाह को घृणा की दृष्टि से नहीं देखा जाय यद्यपि इसका प्रचलन बहुत सीमित मात्रा में है।


6. शिया मुसलमानों में मुताह विवाह (Mutah Marriage among Sia Muslims) : शिया सम्प्रदाय के लोगों में मुताह नामक अस्थायी विवाह की प्रथा है। इस विवाह में निश्चित की हुई अवधि तक पति-पत्नी एक साथ रहते हैं। इस अवधि के पश्चात् विवाह अपने आप समाप्त हो जाता है।

ऐसे मुताह-विवाह स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं। हिंदुओं में इस प्रकार का कोई अस्थायी विवाह प्रचलित नहीं है।


7. विवाह के स्वरूपों के आधार पर अंतर :- हिंदुओं में विवाह के आठ स्वरुप प्रचलित हैं जबकि मुसलमानों में तीन प्रकार के विवाह (निकहा, मुताह एवं फासिद) ही पाये जाते हैं। 


8. इद्दत का अंतर :- मुसलमानों में तलाक के लिए स्त्री को इद्दत की अवधि का पालन करना होता है अर्थात् तालक के बाद तीन मासिक धर्म की अवधि तक वह किसी से पुनर्विवाह नहीं कर सकती। किंतु हिंदुओं में इद्दत की अवधि जैसे कोई चीज प्रचलित नहीं है।


9. वैवाहिक प्रक्रियाओं के आधार पर अंतर:- मुसलमानों में विवाह का प्रस्ताव वर पक्ष द्वारा वधू-पक्ष की तरफ रखा जाता है। जिसकी स्वीकृति एक ही बैठक में गवाहों के समक्ष होना जरूरी है। हिन्छुओं में विवाह का प्रस्ताव लड़की वालों की ओर से रखा जाता है, उसमे गवाह एक आवश्यक पक्ष नहीं है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदू और मुस्लिम विवाह पद्धतियों में समानताएँ कम और असमानताएँ अधिक हैं।