सिमित देव निदर्शन - Simit Dev Nidarshan
सिमित देव निदर्शन - Simit Dev Nidarshan
सीमित दैव निदर्शन में इकाइयों का चुनाव स्वतंत्र या अनियमित रूप से नहीं होता है जैसा सरल दैव निदर्शन में होता है। इस विधि द्वारा निदर्शन लेने से पूर्व समग्र कि सभी इकाइयों को पहले क्रमबद्ध किया जाता है. फिर उन्हें कुछ वर्गों या श्रेणियों में बांट दिया जाता है। उसके बाद उसमें से निदर्शन का चुनाव किया जाता है। सीमित दैव निदर्शन को निम्न तीन भागों में बांटा गया है :
(1) नियमित अंकन पद्धति : इस विधि में पहले समग्र की सभी इकाइयों को किसी विशेष ढंग, काल अथवा स्थान, आदि के अनुसार व्यवस्थित कर लिया जाता है। इसके बाद यह निश्चित कर लिया जाता है के कि समग्र में से हमें कितनी इकाइयों का चयन निदर्शन हेतु करना है।
साथ ही एक इकाई से दूसरी इकाई के बीच की संख्यात्मक दूरी को भी तय कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए, अपने कैरियर के प्रति कॉलेज के अंतिम वर्ष के छात्र कितने सजग है। यह जानना है तो इस अध्ययन के लिए हमें 100 छात्रों में से 10 छात्रों का चयन करना होगा पहला, दसवां, बीसवां, तीसवां और इसी क्रम में 10 छात्रों का चयन किया जाएगा। इसी प्रकार से काल, स्थान एवं परिस्थिति के अनुसार भी समग्र की इकाइयों को व्यवस्थित करके उनमें से निदर्शन का चुनाव कर लिया जाता है। इस प्रणाली में पक्षपात की कोई संभावना नहीं होती।
(2) अनियमित अंकन पद्धति : इस विधि से निदर्शन का चुनाव करने के लिए भी पहले समग्र की समस्त इकाइयों की सूची बना ली जाती है तथा प्रथम और अंतिम अंको को छोड़कर शेष इकाइयों की सूची में से निर्धारित मात्रा में अनियमित ढंग से इकाइयों पर निशान लगा दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, 100 छात्रों में से 10 छात्रों का निदर्शन लेने के लिए पहले हम इन सभी के नामों की एक सूची तैयार करेंगे। तत्पश्चात 1 से 10, 10 से 20 20 से 30 और इसी प्रकार से अन्य वर्गों में से भी प्रत्येक वर्ग में से किसी भी एक इकाई पर सही का निशान लगा देंगे और इस प्रकार कुल 10 इकाइयों का चयन कर लिया जाएगा। इस विधि में पक्षपात आने की संभावना रहती है।
(3) स्तरीकृत या वर्गीकृत पद्धति: यह विधि दैव निदर्शन और सभी सविचार निदर्शन का मिश्रित रूप है। अतः इसे मिश्रित निदर्शन भी कहते हैं। इसमें पहले समग्र को विचारपूर्वक कई सजातीय वर्गों में विभाजित कर दिया जाता है और उसके बाद प्रत्येक वर्ग में से निश्चित संख्या में दैव निदर्शन विधि से इकाइयों का चुनाव किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि हमें लखनऊ या मुरादाबाद में जाति व्यवस्था का अध्ययन करना है तो पहले हम संपूर्ण नगर को विभिन्न जातियों में बांट देंगे और उसके पश्चात प्रत्येक जाति या समूह में से दैव निदर्शन विधि से निश्चित मात्रा में इकाइयों का चयन करेंगे।
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