सरल देव निदर्शन - simple god illustration
सरल देव निदर्शन - simple god illustration
प्रतिदर्श (इकाई) चयन की एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें समग्र की प्रत्येक इकाई को प्रतिदर्श में सम्मिलित किए जाने का समान अवसर प्राप्त होता है, सरल दैव निदर्शन विधि कहलाती है। इस विधि में इकाइयों का चयन पूर्णतः संयोग पर निर्भर करता है। वास्तव में, रेंडम प्रतिचयन या निदर्शन संभाव्य चयन की एक प्रक्रिया है। पाटेन के अनुसार, "दैव प्रतिचयन यह ऐसी विधि है जिसका प्रयोग तब किया जा है जब समग्र में से प्रत्येक व्यक्ति या इकाई को चुने जाने के समान अवसर प्राप्त होते हैं।" संभावनामूलक विधियों में 'दैवयोग' या संयोग का विचार विशेष महत्व रखता है। इसे हम एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं। यदि हम सिक्के को केवल एक बार उछलते हैं तब हम यह नहीं कह सकते कि सिक्का उल्टा या सीधा गिरेगा, किंतु यदि हम उसी सिक्के को कई बार उछाले तो हम निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि वह कितनी बार उल्टा और कितनी बार सीधा गिरेगा, उसके उल्टे और सीधे गिरने की बराबर-बराबर की संभावना रहती हैं।
(1) लॉटरी पद्धति : दैव निदर्शन की सर्वाधिक प्रचलित विधि लाटरी पद्धति है जिसका प्रयोग हम रोजमर्रा में भी किसी न किसी रूप में करते हैं। दैनिक जीवन में लॉटरी विधि के प्रयोग किए जाने वाले इसके अपरिष्कृत रूप में आवश्यक सुधार कर इसे वैज्ञानिक क्षेत्र में अपनाया गया है। एक वैज्ञानिक प्रणाली के रूप में लाटरी पद्धति के अंतर्गत समग्र की समस्त इकाइयों अथवा व्यक्तियों की क्रम संख्या अथवा नाम, कागज की बहुत सी पर्चियों पर लिखकर उन्हें किसी बड़े बर्तन अथवा बॉक्स में डाल कर अच्छी तरह हिला लिया जाता है। इसके पश्चात निदर्शन के अंतर्गत जितनी इकाइयों का चयन करना होता है, उतने ही कागज के टुकड़े बिना देखे निकाल लिए जाते हैं। इन पर्चियों पर जिन इकाइयों की संख्या अथवा नाम लिखा होता है, उन्हीं को अध्ययन के लिए चुन लिया जाता है। दैव निदर्शन के लिए यद्यपि इस प्रणाली का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है लेकिन यदि समग्र की इकाइयों की संख्या बहुत बड़ी हो तो प्रणाली का उपयोग करना अधिक उपयुक्त नहीं होता।
(2) कार्ड या टिकट पद्धति: यह पद्धति लॉटरी पद्धति का ही संशोधित रूप है जिसे ड्रम पद्धति अथवा टिकट पद्धति भी कहा जाता है। किसके अंतर्गत समान आकार और रंग के बहुत से कार्डों पर समग्र की सभी इकाइयों के नाम लिखकर एक बड़े ड्रम में डालकर उन्हें जोर से हिलाया जाता है। इसके पश्चात ड्रम में से किसी एक कार्ड को उठा लिया जाता है। निदर्शन के अंतर्गत जितनी इकाईयों का समावेश करना होता है, उतनी ही बार ड्रम को हिलाकर प्रत्येक बार एक-एक कार्ड निकाला जाता है। कार्ड उठाने का कार्य भी अध्ययनकर्ता द्वारा न करके किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है।
(3) ग्रिड पद्धति : निदर्शन के लिए केवल अधिक इकाइयों में से कुछ सीमित इकाइयों का चयन करना ही आवश्यक नहीं होता बल्कि अनेक अध्ययन इस प्रकार के होते हैं
जिनके लिए एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र में से एक छोटे क्षेत्र का भी चुनाव करना आवश्यक होता है। ग्रिड प्रणाली वह तरीका है जिसके द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि कोई विशेष अध्ययन किस क्षेत्र अथवा किन क्षेत्रों के अंतर्गत किया जाएगा। इस प्रणाली के उपयोग के लिए सर्वप्रथम यह तय कर लिया जाता है कि समग्र के संपूर्ण क्षेत्र में से अध्ययन कार्य कितने उप क्षेत्रों में करना है। उदाहरण के लिए, यदि संपूर्ण उत्तर प्रदेश में केवल 50 गाँवों का अध्ययन करना हो तो उत्तर प्रदेश के मानचित्र के आकार का एक ग्रिड अथवा किसी पारदर्शी धातु जैसे कांच आदि का सांचा तैयार कर लिया जाता है। इसमें समान दूरी का ध्यान रखते हुए 1 से 50 तक संख्याएं अंकित कर दी जाती हैं। इसके पश्चात यह सांचा पुनः मानचित्र पर रखा जाता है। साँचे पर अंकित संख्याएं मानचित्र में जिस स्थान पर आती हैं, उन्हीं स्थानों को अध्ययन के लिए चुन लिया जाता है।
(4) टिपेट सारणी पद्धति: यह विधि प्रो. टिपेट द्वारा प्रस्तुत चार-चार अंको वाली 10.400 संख्याओं की एक लंबी और अव्यवस्थित सूची से संबंधित है।
इस प्रणाली का उपयोग करने के लिए तीन प्रमुख सावधानियों को ध्यान में रखना आवश्यक है पहला, यदि कोई संख्या पुनः आ जाती है तो उसे छोड़ दिया जाता है. जैसे उपयुक्त उदाहरण में 13 संख्या की पुनरावृति होने के कारण उसे पुन: सम्मिलित नहीं किया गया। दूसरा, निदर्शन में 99 तक इकाइयों का चयन करने के लिए सूची में दी गई संख्याओं के प्रथम 2 अंकों को आधार माना जाता है, जबकि 3 अंकों वाली संख्या (जैसे, 100 से 999 तक) में इकाइयों का चयन करने के लिए प्रथम तीन अंको को आधार माना जाता है। तीसरा, निदर्शन के लिए इकाइयों का चयन किसी भी एक क्रम से संबंधित संख्याओं के आधार पर ही किया जाना चाहिए। दैव निदर्शन के लिए टिपेट पद्धति को आज इसलिए अधिक वैज्ञानिक माना जाता है क्योंकि इसके द्वारा इकाइयों के चुनाव में अध्ययनकर्ता के पक्षपात की कोई संभावना नहीं रह जाती। इसके अतिरिक्त सामग्र का आकार बहुत बड़ा होने पर भी टिपेट पद्धति के द्वारा एक सीमित निदर्शन प्राप्त किया जा सकता है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि देव निदर्शन को प्राप्त करने की अनेक पद्धतियां हैं तथा इन सभी का उद्देश्य अध्ययन के लिए इकाइयों के चुनाव में वैयक्तिक पक्षपात की संभावना को कम से कम करना होता है। इन सभी पद्धतियों के प्रयोग के लिए कुछ विशेष सावधानियां रखना आवश्यक है। सर्वप्रथम, जिस समग्र में से निदर्शन का चुनाव करना हो तो अध्ययनकर्ता को उसका समुचित ज्ञान करके इकाइयों की एक सूची का निर्माण करना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त समग्र की प्रत्येक इकाई को निदर्शन के लिए चुने जाने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। अंत में, एक विशेष प्रणाली से जिन इकाइयों का चयन हो जाए, अध्ययनकर्ता को उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहिए, अन्यथा इन प्रविधियां का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। देव निदर्शन पद्धति के प्रमुख गुण या लाभ निम्नांकित है :
• इस विधि में प्रत्येक इकाई के चुने जाने के समान अवसर होते हैं। अतः यह विधि प्रतिनिधित्वपूर्ण है तथा इसमें समग्र की अधिकाधिक विशेषताएं विद्यमान होती हैं।
• यह विधि एक वैज्ञानिक विधि है जैसा कि एकॉफ कहते हैं. "दैव निदर्शन एक प्रकार से समस्त वैज्ञानिक निदर्शन का आधार है।"
• यह निदर्शन की सबसे सरल विधि है. इसमें जटिल अथवा गूढ़ सिद्धांतों का पालन नहीं करना पड़ता है।
• इस विधि में निष्पक्षता का गुण मौजूद है और निदर्शन के चुनाव में किसी को भी प्राथमिकता नहीं दी जाती है। अतः इसमें पक्षपात आने की संभावना नहीं रहती है।
• इस विधि में समय, धन और श्रम की भी पर्याप्त बचत होती है। अतः यह विधि मितव्ययितापूर्ण है।
• इस विधि में इकाइयों के चयन में यदि किसी प्रकार की कोई त्रुटि या अशुद्धता रहा गई हो तो उसका पता लगाना सरल है।
दैव निदर्शन पद्धति के निम्नांकित दोष या सीमाएं हैं:
• इस विधि में समग्र की सूची होना आवश्यक है, किंतु कई बार यह सूची उपलब्ध नहीं हो पाती तब इस विधि द्वारा निदर्शन ग्रहण करना संभव नहीं होता है।
• यदि समग्र बहुत छोटा हो अथवा कुछ इकाइयां इतनी महत्वपूर्ण हो कि उनका निदर्शन में समावेश अनिवार्य हो तो ऐसी स्थिति में दैव निदर्शन उपयुक्त नहीं होता।
• जब समग्र में बहुत अधिक विविधताएं हों और सजातीयता का अभाव हो तब भी यह विधि उपयुक्त नहीं होती।
• जब समग्र का विस्तार बहुत अधिक हो और इकाइयां दूर-दूर तक फैली हो तब भी उनसे संपर्क करना कठिन होता है।
• दैव निदर्शन में विकल्प की संभावना नहीं होती, विकल्प के लिए इकाइयों में परिवर्तन करना होता है। ऐसी स्थिति में दैव निदर्शन अवैज्ञानिक और पक्षपातपूर्ण हो जाता है।
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