सामाजिक परिवर्तन - social change
सामाजिक परिवर्तन - social change
समाज में परिवर्तन के मूल कारण अंतर्विरोध हैं। यह द्वंद्वात्मकता का मूल तत्व है। मानव जीवन के आरंभ में यह अंतर्विरोध मानव और प्रकृति के बीच था। प्रकृति से संघर्ष और सहयोग परिवर्तन के मूल स्रोत थे। यह एक कारण अभी भी है। आदिम समाज में सामूहिक जीवन था। भौतिक हितों एवं साधनों का असमान वितरण उस समय नहीं था। मानव ने प्रकृति से संघर्ष और सहयोग करके अधिक संसाधन उत्पादित करना आरंभ किया, जिससे तत्काल उपभोग के बाद कुछ अधिशेष बचने लगा। इस अधिशेष पर नियंत्रण के लिए मानव समाज में ही गंभीर अंतर्विरोध उत्पन्न हो गए। इस संघर्ष से निजी संपत्ति, वर्ग एवं वर्ग से जुड़ी अन्य संस्थाओं का उदय हो गया। लंबे समय तक मानव अपने समाज के अंतर्विरोधों से अनभिज्ञ होता है। मानव की समझदारी या ज्ञान उसके सामाजिक अस्तित्व से बनती है। मानव का सामाजिक अस्तित्व भौतिक जीवन के उत्पादन में जो संबंध हैं, वह बनाता है, उनसे ही तय होता है। मार्क्स ने कहा समाज व्यक्तियों से नहीं अंतरसंबंधों से बना है।
इन अंतरसंबंधों में व्यक्ति कहीं न कहीं अवस्थित होता है। ये अंतरसंबंध विचारों, धारणाओं और कानून में अभिव्यक्त होते हैं। ये सामान्य और स्वभाविक समझे जाते हैं। इसीलिए जब कानून निजी संपत्ति को वैध बनाता है, जब धर्म आर्थिक मामलों को तय करता है, तब लोगों को यह अस्वाभाविक नहीं लगता है। वे उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। मानव की जो चेतना है और जो उसकी वास्तविक स्थिति है उसमें एक अंतर्विरोध होता है।
समाज में परिवर्तन अंतर्विरोध से होता है एवं इसका एक निश्चित क्रम भी है, परंतु मार्क्स ने द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत के आधार पर कहा कि मानवीय प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वास्तविक प्रयास और संघर्ष के अभाव में परिवर्तन नहीं होता है। जर्मन विद्वान कार्ल काउतोस्की और एडवर्ड बर्नस्टीन ने कहा कि एक क्रम में मानव समाज बदलेगा ही। मार्क्सवादी साहित्य में इन्हें संशोधनवाद का कुतुबमीनार कहा जाता है। इसी प्रकार जो यह समझते हैं कि पश्चिम के लोकतांत्रिक माडल से ही शांतिपूर्ण तरीके से समाजवाद आ जाएगा. उन्हें भी संशोधनवादी कहा जाता है।
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