सामाजिक संज्ञान : स्वरूप एवं परिभाषा - Social Cognition: Form and Definition
सामाजिक संज्ञान : स्वरूप एवं परिभाषा - Social Cognition: Form and Definition
संज्ञान उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं को इंगित करता है जो सूचना को प्राप्त करने और उसके प्रक्रमण करने से जुड़ें हैं। इस विचार को सामाजिक संसार से जोड़कर देखें तो सामाजिक संज्ञान उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं को इंगित करता है जो सामाजिक वस्तुओं से संबद्ध सूचना को प्राप्त करने और उनका प्रक्रमण करने से जुड़े हैं। इनमें वे सभी प्रक्रियाएं आती हैं जो सामाजिक व्यवहार को समझने, उनकी व्याख्या एवं विवेचना करने में सहायक होती हैं।
सामाजिक संज्ञान एक विस्तृत पद है जिससे तात्पर्य उन तरीकों से होता है जिसके सहारे व्यक्ति अपनी सामाजिक दुनिया के बारे में प्राप्त सूचनाओं की व्याख्या तथा विश्लेषण कर उन्हें याद रखता है तथा उसका उपयोग अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप करता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सामाजिक संज्ञान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति अन्य लोगों के बारे में सोचता है.
उनके साथ स्थापित सम्बन्धों के बारे में सोचता है तथा उस सामाजिक वातावरण के बारे में सोचता है जिसमें वह रहता है। वास्तव में हमारे समस्त संज्ञान मूलतः सामाजिक उत्पत्ति वाले होते हैं। संज्ञान व्यक्ति के समाजीकरण के साथ प्रत्यक्ष रीति से जुड़े होते हैं। व्यक्ति के द्वारा सूचनाओं के रूपान्तरण एवं एकीकरण प्रक्रिया पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। सामाजिक संज्ञान परिवेश से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर उनके तात्पर्य का अनुमान करना है। सही सामाजिक संज्ञान एक दुरूह मानसिक प्रक्रम है। इसको अनेक प्रकार की अभिनीतियाँ प्रभावित करती हैं।
लेयेन्स एवं कोडोल (1990) ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक संज्ञान के अध्ययन में प्रयुक्त संप्रत्ययों एवं विचारों का उपयोग अनेक सामाजिक वस्तुओं जैसे आत्म, अन्य व्यक्तियों, काल्पनिक व्यक्तियों, अंतरवैयक्तिक सम्बन्धों समूहों तथा सामाजिक सूचनाओं के स्मरण संबंधी अध्ययनों में किया जाता है।
फिस्के एवं टेलर (1984) के मतानुसार, सामाजिक संज्ञान व्यक्ति द्वारा अपने सामाजिक परिवेश से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर उनके तात्पर्य का अनुमान करना है।"
हार्वी (1981) के विचार में, सामाजिक संज्ञान का तात्पर्य यह है कि लोग अपने सामाजिक जगत के विविध पक्षों की जानकारी कैसे प्राप्त करते हैं।"
उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण के आधार परहमें सामाजिक संज्ञान के स्वरूप के बारे में निम्नलिखित तथ्य प्राप्त होते हैं:-
• सामाजिक संज्ञान में व्यक्ति अपनी सामाजिक दुनिया या वातावरण से सूचनाओं को प्राप्त कर उसकी व्याख्या एवं विश्लेषण करता है।
• सामाजिक संज्ञान में व्यक्ति इन सूचनाओं का सिर्फ व्याख्या एवं विश्लेषण ही नहीं करता है बल्कि उसका उपयोग करके सामाजिक वातावरण को समझने की कोशिश करता है।
• सामाजिक संज्ञान में व्यक्ति उपयोग किये गये सूचनाओं के आधार पर सामाजिक वातावरण के बारे में एक विशेष निर्णय पर भी पहुंचता है।
• सामाजिक संज्ञान में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति, सामाजिक समूह, सामाजिक भूमिकाओं तथा सामाजिक परिस्थिति में अपने में उत्पन्न अनुभूतियों के बारे में एक सामाजिक निर्णय करता है।
वार्तालाप में शामिल हों