वर्णाश्रम का सामाजिक महत्व - Social Importance of Varnashram

वर्णाश्रम का सामाजिक महत्व - Social Importance of Varnashram


हिंदू सामाजिक व्यवस्था त्याग तथा भोग के अद्वितीय समन्वय की वजह से अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं में अद्वितीय स्थान रखती है। यह सांसारिक अभ्युदय, समृद्धि तथा आध्यात्म की भावना से ओत-प्रोत एक ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्ति के सामाजिक व मानसिक चेतना को सामाजिक कल्याण तथा समन्वय के सूत्र में बांधती है। यहाँ वर्णाश्रम के प्रमुख सामाजिक महत्वों के बारे में विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है-


1. सामाजिक संगठन तथा सुव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता


वर्णाश्रम व्यवस्था का मूलभूत और मुख्य प्रयोजन समाज में संगठन तथा सुव्यवस्था को बनाए रखना है। सामाजिक संगठन और सुव्यवस्था को बनाए रखने के लिए सबसे अधिक आवश्यक यह था।


कि वैयक्तिक जीवन को व्यवस्थित रखा जाए। वैयक्तिक जीवन को व्यवस्थित करने हेतु ही आश्रम व्यवस्था का विकास किया गया तथा उसे चार बराबर भागों में बांटकर वैयक्तिक जीवन को व्यवस्थित किया गया। साथ ही इस वैयक्तिक जीवन की सुव्यवस्था को स्थापित तथा बनाए रखने के लिए कर्म और गुणों के आधार पर समाज को अनेक समूहों में बाँट दिया गया तथा वर्गीकरण की इस व्यवस्था को हम वर्ण व्यवस्था के नाम से जानते हैं।


2. जीवन का परम लक्ष्य: मोक्ष


हिंदू सामाजिक व्यवस्था के प्रमुख वर्णाश्रम व्यवस्था का एक प्रमुख प्रयोजन यह भी है कि यह हिंदू संस्कृति के तहत परम लक्ष्य माने जाने वाले मोक्ष को प्राप्त करने के लिए साधन के रूप में कार्य करता है। वर्ण व्यवस्था के तहत प्रत्येक वर्णों के लिए कुछ अधिकारों तथा कर्तव्यों का निर्धारण किया गया है और इस बात की ओर पूरा ध्यान दिया गया है कि इन निर्धारित किए गए कर्तव्यों का पालन पूरी तन्मयता तथा श्रद्धा से किया जाए।

क्योंकि यह कर्तव्य ही व्यक्ति का वास्तविक धर्म है तथा यही कार्य उसके अग्रिम जीवन और मोक्ष के मार्ग को निर्धारित करते हैं। वर्ण व्यवस्था के समान ही आश्रम व्यवस्था में भी मोक्ष को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है तथा आश्रम व्यवस्था के आखिरी पड़ाव के रूप में सन्यास आश्रम के तहत मोक्ष प्राप्ति को परम आवश्यक माना गया है। चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) के रूप में आश्रम व्यवस्था के सभी कर्तव्यों को विभाजित किया गया है। व्यक्ति को आश्रम व्यवस्था के दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने हेतु अत्यंत आवश्यक है कि वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को समझने में सक्षम हो।


3. सामाजिक संघर्षो का समाधान


वर्णाश्रम व्यवस्था समाज की अनावश्यक प्रतिस्पर्धा को समाप्त करता है तथा पारस्परिक सहयोग की भावना को विकसित करता है। वर्ण व्यवस्था द्वारा प्रत्येक व्यक्तियों के लिए उनके वर्णों के अनुरूप कुछ कार्यों को निर्धारित कर दिया गया तथा इस कारण व्यक्ति अपने-अपने कार्यों में ही रचनात्मकता और लगनशीलता को दिखाता है।

इस प्रकार से व्यक्तिगत हितों के साथ साथ समूहिक हितों की रक्षा भी आसानी से संभव हो पाती है। इसके अलावा आश्रम व्यवस्था ने व्यक्ति के जीवन को अनिश्चित उतार चढ़ाव और विभिन्न संघर्षों से बचाए रखने के लिहाज से निश्चित स्तरों की व्यवस्था किया है। ए चारों स्तर धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष जैसे उच्च मानवीय लक्ष्यों की प्राप्ति के रूप में वर्णित किए गए हैं।


4. सामान्य कल्याण को प्राथमिकता


सामान्य कल्याण के बिना समाज को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, इस तथ्य को अनेक भौतिकवादी समाजों द्वारा स्वीकार किया गया है। व्यक्तिवादिता के अवगुणों को कम करने तथा समाज में व्यवस्था को सुचारू रूप से गतिमान रखने की दृष्टि से विभिन्न आश्रमों द्वारा धर्म को कुछ इस प्रकार से लागू किया गया कि सामान्य कल्याण को अधिक से अधिक प्रोत्साहन प्राप्त हो सके।


5. व्यक्ति तथा समूह की पारस्परिक निर्भरता


यह व्यवस्था व्यक्ति तथा समूह की पारस्परिक निर्भरता को संवर्धित करने में सहायक की भूमिका का निर्वहन करती है। वर्ण व्यवस्था के प्रत्येक वर्ग अपने समस्त कार्यों के लिए एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हैं। उनमें अन्य वर्णों पर विभिन्न कार्यों को लेकर निर्भरता भी देखने को मिलती है। पी.एन. प्रभु ने स्पष्ट किया है कि आश्रम व्यवस्था व्यक्ति और समूह के बीच पारस्परिक निर्भरता बढ़ाने तथा उनके समन्वय को प्रोत्साहित करती है। आश्रम व्यवस्था के सभी स्तरों में व्यक्ति तथा समूह के कार्य और दायित्व एक-दूसरे से पूर्णतया पृथक होते हैं, हालांकि पृथकता होने के बाद भी दायित्वों में एक-दूसरे के प्रति निर्भरता रहती है। इस निर्भरतावादी संस्कृति के परिणाम के रूप में यहाँ एक समष्टिवादी संस्कृति विकसित हो रही है।


6. गतिशीलता


वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत हमें गतिशीलता से संचालित सामाजिक विकास के तत्व भी परिलक्षित होते हैं।

वर्ण व्यवस्था में हमें व्यक्तियों में श्रम विभाजन तो अनिवार्य रूप से देखने को मिलता है, परंतु इसके साथ साथ व्यक्तियों को अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार करने हेतु भी पर्याप्त प्रदान किए गए हैं। इस व्यवस्था के अंतर्गत कर्मों तथा गुणों को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है तथा जन्म संबंधी आधारों को गौंण माना गया है। अर्थात् निम्न स्तर के वर्ण से संबंधी व्यक्ति भी अपने गुणों तथा कर्मों के आधार पर उच्च वर्ण की सदस्यता ग्रहण कर सकता है। वर्ण व्यवस्था में व्याप्त इस गतिशील प्रवृत्ति के कारण व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति उन्मुख तथा सजग होते हैं और सामाजिक योगदान में उल्लेखनीय प्रयास करते हैं। इसी प्रकार आश्रम व्यवस्था में भी व्यक्ति निरंतर गतिशील रहते हुए अपने जीवन को आश्रमों के निर्धारित स्तरों के साथ-साथ जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हेतु -अग्रसारित होता रहता है।


7. मानवीय गुणों का विकास


वर्णाश्रम व्यवस्था के कारण व्यक्ति में सरलता, पवित्रता, निष्ठा, सहिष्णुता, उदारता, समानता, सामाजिक सेवा, बंधुत्व और आध्यात्मिकता के गुणों का समावेश होता रहता है। साथ ही साथ वर्णाश्रम व्यवस्था व्यक्ति के मानवीय गुणों को भी संवर्धित और व्यवस्थित करने का कार्य भी करती है।