सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन - Social Movements and Social Change
सामाजिक आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन - Social Movements and Social Change
पारसन्स ने सामाजिक प्रणाली के भीतर सामाजिक परिवर्तन का विवेचन दो स्तरों पर किया है:
● पहला स्तर है भूमिका के विभेदीकरण, समाजीकरण तथा संस्थागत होने की प्रक्रियाओं तथा उनके दबाओं के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन (परिवार प्रणाली के उदाहरण को देखिए। इस प्रकार का परिवर्तन धीमा, सतत और स्वरूप में अनुकूलनपरक होता है। इस तरह के परिवर्तन में की प्रक्रियाओं की शृंखला है: नवीनताएँ अथवा तर्कसंगतिकरण, नवीनता का संस्थागत होना, नए संस्थागत अनुकूलन के आसपास निहित स्वार्थों का किससित होना और अंततः नवीनता फिर से परंपरा बन जाती है यह अनुकूलनपरक सामाजिक परिवर्तन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
● दूसरा है क्रांतिकारी आंदोलन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, इस प्रकार का सामाजिक परिवर्तन क्रांतिकारी आंदोलन के फलस्वरूप होता है, जिसके कारण सामाजिक प्रणाली के संतुलन में अचानक अंतर आ जाता है।
पारसन्स ने इसके लिए साम्यवादी तथा नाजी आंदोलनों के उदाहरण दिए है। पारसन्स के अनुसार इन आंदोलनों के जोर पकड़ने तथा सामाजिक प्रणाली में महत्ता पाने से पहले समाज में चार प्रकार की स्थितियाँ अवश्य होनी चाहिए। ये स्थितियाँ इन प्रकार हैं।
● लोगों में व्यापक रूप से फैली विलगता अथवा अलगाव की भावना। दूसरे शब्दों में, जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग मौजूदा प्रणाली से असंतुष्ट होना चाहिए।
● विद्रोही (अथवा वैकल्पिक विपरीत पक्ष) उपसंस्कृतिक के संगठन की विद्यमानता। अन्य शब्दों में ऐसी विपरीत विचारधारा की विद्यमानता जो मौजूदा विचारधारा से एकदम पृथक हो। इससे सामाजिक प्रणाली के सदस्यों में से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को मौजूदा सामाजिक प्रणाली के प्रतिबंधों पर आचरण न करने और यहाँ तक कि खुली चुनौती देने में मदद मिलती हैं।
● उपरोक्त स्थिति के परिणामस्वरूप क्रांतिकारी आंदोलन की सफलता के लिए आवश्यक तीसरी स्थिति होती है। वह एक विचारधारा है। विश्वासों के एक समुच्चय का विकास जिसे सफलतापूर्वक लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके और उसके मूल्यों, प्रतीकों तथा संस्थागत स्वरूप के औचित्य का दावा किया जा सके।
● इस प्रकार के सामाजिक आंदोलन के लिए चौथी तथा अंतिम स्थिति है नए आंदोलन की विचारधारा को उचित सिद्ध करने तथा उसके समर्थन के लिए शासन की दृष्टि से सत्ता प्रणाली का संगठन करना तथा उसे क्रियात्मक रूप प्रदान करना। सोवियत संघ और चीन में साम्यवादी आंदोलन की सफलता ऐतिहासिक रूप में ऊपर बताई गई चारों स्थितियों की विद्यमानता और वैधता को दर्शाती है।
सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन का मुख्य परिणाम यह होता है कि इससे सामाजिक प्रणाली में ऐसी रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है जोकि अनुकूलन लाती है, पारसन्स के अनुसार, इसका कारण यह है कि अधिकतर क्रांतिकारी विचारधाराओं में आदर्शलोक का पुट रहता हैं। जब इन मूल्यों को लागू किया जाता है। विचारधारा जितनी क्रांतिकारी होगी, उस प्रकार की अनुकूलन संरचनाओं के विकास के लिए (रियासत की प्रक्रिया) अस्तित्व में आती है। विचारधारा जितनी क्रांतिकारी होगी. उस प्रकार की अनुकूलन संरचना तैयार करना उतना ही कठिन होगा। रूढ़िवादिता के प्रति विवशतापूर्ण रूझान होने लगता है। उदाहरण के लिए साम्यवादी आंदोलन में परिवार की संस्था को (बुर्जुआ पूर्वग्रह) अथवा संपत्ति के निजी स्वामित्व को एक बुराई की तरह माना गया, परंतु इन दोनों संस्थाओं परिवार और संपत्ति के निजी स्वामित्व को समाप्त करना व्यावहारिक धरातल पर संभव नहीं हुआ। इस प्रकार क्रांतिकारी विचारधाराओं में आदर्श एवं व्यवहार के बीच अंतर बना रहता है।
एक और बात यह है कि पारसन्स के अनुसार सभी क्रांतिकारी आंदोलनों की संरचनाओं में द्वैधवृत्ति पाई जाती है। जैसे कि साम्यवादी आंदोलन में वर्ग तथा समताबाई के बीच।
इसके अलावा, इस तरह के आंदोलनों के अनुयायियों में अपनी उपेक्षित आवश्यकता-स्थितियों को संतुष्ट करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, क्योंकि वे प्रणाली को (उनका) अर्थात् किसी अन्य का नहीं बल्कि (हमारा) अर्थात् अपना मानकर चलते हैं। प्रणाली पर अधिकार की भावना के कारण नेताओं में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मतोष की प्रवृत्ति को बल मिलता है। आगे चलकर इसके कारण क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन की उग्रता कम हो जाती है। अंततः समय बीतने के साथ-साथ क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन की उग्रता कम हो जाती है अंततः समय बीतने के साथ-साथ क्रांतिकारी आधार पर चलाया गया आंदोलन धीरे-धीरे (रूढिवादिता) की ओर बढ़ने लगता है। तब यहाँ भी पूर्व प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। जिस प्रकार अन्य किसी भी सामान्य सामाजिक प्रणाली में होता है। पारसन्स का मत है कि इस प्रकार अन्य किसी भी सामान्य सामाजिक प्रणाली में होता है। पारसन्स का मत है कि इस प्रकार क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन भी, सामाजिक प्रणाली में मूल परिवर्तन लाने का दावा करते हैं। अंततः सतत् परिवर्तन की बजाए प्रणाली की स्थिरता की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन की प्रक्रिया अपनाने लगते हैं। इस प्रकार के क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रारंभ तो परंपरा के विरोध से होता है, किंतु उनका अंत रूढ़िवाद में होता है।
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