मानव का सामाजिक विवेचन - Social Study of Man

 मानव का सामाजिक विवेचन - Social Study of Man


समाजशास्त्र काम्टे, टोनीज, दुर्खीम एवं मैक्स वेबर आदि सभी ने मनुष्य की सामाजिक विवेचना की है। इन समाजशास्त्रियों ने समाज के विज्ञान का अध्ययन इस आधार पर किया कि व्यक्ति स्वयं को सर्वप्रथम समझ सके और फिर सामाजिक समस्या की प्रकृति के विकास एवं परिवर्तन का अध्ययन कर सके। इसी क्रम में मार्क्स को हम सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रभावशाली विचारक के रूप में पाते हैं। मानव के विकास में मार्क्स की धारणा का उद्गम दार्शनिक अवश्य है, परंतु उसका मानव का विज्ञान दार्शनिक नहीं है अपितु समाजशास्त्रीय है। मानव सदैव से ही सामाजिक है क्योंकि वह अपने अस्तित्व को बनाए रखने हेतु कार्य करता है तथा अस्तित्व को बनाए रखने के साधनों का उत्पादन एक सामूहिक एवं सामाजिक क्रिया है। मानव के विषय में मार्क्स के यह विचार एडम स्मिथ, रिकार्डो, हॉब्स, रूसो, लॉक एवं बेंथम की व्यक्ति की अवधारणाओं का किसी सीमा तक खंडन करते हैं। परंतु अरस्तु, मॉन्टेस्क्यू एवं फर्ग्यूसन के विचारों का समर्थन भी करते हैं। मार्क्स के मानव के विषय में दिए गए विचार सामाजिक संबंधों के निर्माण की प्रक्रिया का विवेचन भी करते हैं। मार्क्स के अनुसार उत्पादन के लिए व्यक्ति निश्चित सामाजिक संबंधों में प्रवेश करता है। इन्हीं सामाजिक संबंधों में फिर उत्पादन होता है अर्थात् सामाजिक पर्यावरण का निम्न अंतःक्रिया में निहित व्यक्तियों द्वारा निर्मित होता है अतः समाज व्यक्तियों के अंतःक्रिया द्वारा निर्मित होता है। समाज के अस्तित्व के विषय में मार्क्स की अवधारणा जॉन स्टुअर्ट मिल एवं हरबर्ट स्पेंसर केक विचारधारा के विपरीत है।