समाजवादी स्त्रीवाद - Socialist feminism

समाजवादी स्त्रीवाद - Socialist feminism


समाजवादी स्त्रीवाद का यह मानना है कि पूंजीवादी समाज में स्त्रियों का वेतन के साथ दोहरा संबंध है, एक वैतनिक मजदूर के रूप में और दूसरा अवैतनिक मजदूर के रूप में। एक अवैतनिक घरेलू मजदूर तथा एक उपभोक्ता के रूप में इस समाज में स्त्रियों की जो भूमिका होती है, वही उनकी चेतना को भी निर्धारित करती है।


समाजवादी स्त्रीवाद की धारा यौन उत्पीड़न के साथ वर्ग-उत्पीड़न को जोड़कर देखती है। इस धारा ने परिवार, परिवार के अंदर से मिलने वाले संस्कार इत्यादी प्रश्नों को काफी महत्व देकर उठाया और समाज में स्त्री की स्थिति के बारे में आर्थिक नियतिवादी दृष्टिकोण का जमकर विरोध किया।


मार्क्सवाद एवं समाजवाद के दृष्टिकोण में थोड़ा अंतर है, परंतु स्त्री के संदर्भ में दोनों का मूल ग्रंथ फ्रेडरिक एंगेल्स की प्रसिद्ध पुस्तक परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति (The origin of the family, private property and the state) है। अगस्त बेबेल की पुस्तक नारी और समाजवाद में स्त्री मुक्ति के प्रश्न पर व्यक्त किए गए विचारों को अधिक ठोस रूप दिया।

बेबेल की पुस्तक का काफी प्रभाव जर्मनी और यूरोप में हो रहे स्त्री-आंदोलनों पर पड़ा। जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी में एंगेल्स के समय में ही फर्दीनांद लॉसाल तथा उसके समर्थकों का एक समूह ऐसा भी था, जो स्त्रियों को प्राकृतिक दृष्टि से ही पुरूषों से हीन समझते थे और स्त्रियों के समान अधिकार के विरूद्ध थे। अगस्त बेबेल तथा विल्हेम लिब्नेख्त आदि मार्क्सवादियों ने पार्टी के अंदर संघर्ष कर लॉसालपंथियों को पराजित किया और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए एक मार्क्सवादी कार्यक्रम बनाया। इसी पार्टी में क्लारा जेटकिन, रोजा लुक्समवर्ग, आदि विश्व प्रसिद्ध स्त्री आंदोलनकर्ताओं ने स्त्री-मुक्ति के लिए संघर्ष का एक क्रांतिकारी परिप्रेक्ष्य विकसित किया। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी 1890 के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक मुख्य रूप से ट्रेड यूनियन संगठनों पर केंद्रित थी। क्लारा जेटकिन के प्रभाव से उसने स्त्रियों के बीच व्यापक राजनीतिक गतिविधियों के विशेष संगठनों का विकास प्रारंभ किया गया।

इन संगठनों ने राजनीतिक समानता, जच्चा-बच्चा के लिए बीमा, कामगार स्त्रियों को संरक्षण देने के लिए कानून, बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा एवं स्त्रियों की राजनीतिक शिक्षा पर बल दिया। जहाँ जर्मनी में राजनीति के क्षेत्र में स्त्रियों की भागीदारी पर कानूनी प्रतिबंध था, वहाँ समाजवादी स्त्रियाँ प्रत्येक दो वर्ष में अपना सम्मेलन आयोजित करने लगीं। क्लारा जेटकिन के संपादन में स्त्रियों पर केंद्रित पत्रिका का प्रकाशन हुआ, जिसका नाम- Gleichheit (इक्वेलिटी) था।


समाजवादी विचारों से प्रभावित स्त्री आंदोलन का यह दौर मात्र जर्मनी तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे यूरोप और अमेरिका में फैला। अमेरिका में अगस्त बेबेल की पुस्तक 'नारी' और 'समाजवाद' 1904 में प्रकाशित हुई। अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी में प्रारंभ में कुछ उसी प्रकार के पुरातनपंथियों का वर्चस्व था, जैसा कि जर्मनी में लॉसालपंथियों का था। लेकिन अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी में हजारों की तादाद में स्त्रियाँ शामिल थीं

और मतदान के अधिकार को लेकर लंबे समय तक संघर्ष करती रहीं। पार्टी के सदस्यों द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका 'द न्यू रिव्यू' में स्त्रीवाद और समाजवाद के संदर्भ में हुई बहस पर अनेक लेख प्रकाशित हुए। स्त्रियों की समस्या के प्रति सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियों का आंदोलनात्मक दृष्टिकोण उस समय ठोस रूप में सामने आया, जब रूस में समाजवादी क्रांति हुई और लेनिन ने तीसरे कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय महिला आयोग के कामों के बारे में अपनी राय प्रकट की। लेनिन ने "महिलाओं की मानवीय और सामाजिक परिस्थितियों तथा उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व के बीच अविभाज्य संबंध पर बल देने के लिए कहा। लेनिन और क्लारा जैटकिन के बीच किस प्रकार विश्व में समाजवादी स्त्री आंदोलन को विकसित किया जाए? विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। जैटकिन ने स्त्रियों की एक अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस बुलाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें विभिन्न पेशों में लगी स्त्रियों के अधिकारों, बेरोज़गारी, समान वेतन, कामगार स्त्रियों को संरक्षण, माताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा, घरेलू स्त्रियों को राहत देने के सामाजिक कार्य, विवाह में स्त्रियों की स्थिति, पारिवारिक कानून तथा अन्य कानूनी अधिकारों, जैसे विषयों पर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा गया।


केट मिलेट की किताबें 1970 में प्रकाशित हुई। समाजवादी स्त्रीवादी आंदोलन में इसका काफी प्रभाव पड़ा। लिसे वोगेल ने लिखा है

कि इन पुस्तकों में स्त्रियों से संबंधित मनोविज्ञान तथा विचारधाराओं के संदर्भ में यौन प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया तथा स्त्रियों के प्रति उत्पीड़क सामाजिक आचार-आचरण को स्पष्ट किया गया है। समाजवादी स्त्रीवादी विमर्श में पितृसत्तात्मकता की अवधारणा बिना किसी आपत्ति के प्रविष्ट हो गई। 


अमेरिका में कुछ समाजवादी स्त्रीवादियों ने यह मांग उठाई कि समाजवादी स्त्रीवादी राजनीतिक सैद्धांतिकी को तैयार करने की दिशा में सबसे पहला जरूरी कदम यह है कि विद्रोही स्त्रीवाद और स्त्रियों की समस्या के मार्क्सवादी विश्लेषण का संश्लेषण किया जाए इस प्रकार वहाँ समाजवादी स्त्रीवाद के खेमे में पितृसत्तात्मकता तथा प्रजनन जैसे विषयों पर शोध कार्य प्रारंभ हो गया।


समाजवादी स्त्री आंदोलन ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि स्त्री मुक्ति के प्रश्न को समाज के व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रश्नों से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता। स्त्री-मुक्ति की कोई भी परिकल्पना अंततोगत्वा समाज की मुक्ति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी होती है। इसके साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो गई थी कि स्त्री की स्वतंत्रता उसकी आर्थिक स्वतंत्रता में निहित है। जब तक उन्हें घर की चहारदीवारी से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक स्त्रियाँ समाज में एक मनुष्य के रूप में सभी सामाजिक विषयों पर अपनी भूमिका अदा नहीं पाएंगी और स्त्री-पुरुष में समानता नहीं आ सकेंगी।