समाजवादी समाज - Socialist Society

समाजवादी समाज - Socialist Society


मार्क्स ने कहा पूँजीवाद के बाद स्वाभाविक रूप से एक साम्यवादी समाज का उदय होना चाहिए, परंतु समाज के लिए इतनी लंबी छलाँग लगाना संभव नहीं है। इसलिए यह अंतरवर्ती युग का उदय होगा जो समाजवाद होगा। समाजवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले रॉबर्ट ओवेन (Robert Owen ) ने किया। स्वयं मार्क्स ने यह शब्द हेनरी दी सेंत साइमन से अपनाया। समाजवाद की चर्चा मार्क्स ने बहुत पहले से पूँजीवाद समाज की समस्याओं के हल के रूप में की जा रही थी। मार्क्स की धारणा में उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण होगा. राज्य मजदूर वर्ग का होगा, मजदूर वर्ग की तानाशाही होगी, मजदूर वर्ग राज्य के माध्यम से अपने नेतृत्व में समाज की उत्पादक शक्तियों को बढ़ाएगा। इसके चलते साम्यवादी समाज का निर्माण होगा। समाज में निजी संपत्ति होगी, वर्ग होंगे, वर्गीय संस्थाएं होंगी, यानी राज्य सरकार और कानून होगा। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता और उपलब्धि के आधार पर सुविधाएँ दी जाएँगी। विश्व के एक या दो देशों में समाजवाद का उदय हो सकता है. साम्यवाद एक ही साथ पूरी दुनिया में उद्विकास होगा।


मार्क्स ने कहा अपने आप कुछ भी नहीं होता है। वस्तुनिष्ठ परिस्थितियों में विषयनिष्ठ प्रयासों का योग जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर एक समाज लंबे समय तक एक ही स्थिति में बना रह सकता है।

मजदूर वर्ग को अथवा सर्वहारा वर्ग को इसके लिए संगठित एवं गंभीर प्रयास करना होगा। समाजवाद के अनेक प्रकार हैं जैसे लोकतांत्रिक समाजवाद, फैबियन समाजवाद संघ समाजवाद इत्यादि। मार्क्स ने समाजवाद की जो धारणा दी है उसे उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद कहा है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि ऐसा समाजवाद मेहनतकशों द्वारा संगठित सामाजिक क्रांति से उत्पन्न होगा। मार्क्स ने कहा समाजवाद एक संक्रमणशील व्यवस्था है। इसमें उठा-पटक होती रहेगी। वर्ग रहेंगे, परंतु मजदूर वर्ग के अतिरिक्त दूसरे वर्गों के पास आर्थिक संसाधन नहीं होंगे, इसलिए वर्ग संघर्ष हिंसात्मक नहीं होगा। उत्पादन की शक्तियों पर निजी संपत्ति और मुनाफे का अंकुश नहीं होगा। ये तेजी से विकसित होंगी, जिससे अंततः साम्यवाद का मार्ग प्रशस्त होगा। वास्तविक इतिहास में सोवियत यूनियन और पूर्व यूरोपीय देशों में समाजवाद के हाथों पराजित हो गया है। फ्राँसीसी फूकोयामा जैसे विद्वान यह कहते हैं कि पूँजीवादी समाज-व्यवस्था ही शास्वत समाज है। अमेरिका और पश्चिमी देशों में नवसंरक्षणवादी (neo conservative) विद्वान पहले से ही ऐसा कहते रहे हैं। ब्रिटिश विद्वान हैप्सबर्ग ने कहा कि कार्ल मार्क्स की द्वंद्वात्मकता और समाजवाद की जो धारणाएँ है, उनके अनुसार समाजवाद का पतन एक स्वाभाविक घटना है। फ्रांस में 1789 की क्रांति के बाद पूँजीवाद का उदय हुआ। उसे नेपोलियन ने पराजित किया। उसे एक बार नहीं अनेकों बार पराजित किया गया और सामंतवाद की पुर्नवापसी होती रही। इसका यह अर्थ नहीं कि सामंतवाद बराबर बना रहा।