समाजीकरण शिक्षा , शिक्षा समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण - Socialization Education, Education Sociological Approach

समाजीकरण शिक्षा , शिक्षा समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण - Socialization Education, Education Sociological Approach


शिक्षा के संबंध में एक रोचक विरोधाभास यह देखने में आता है कि यद्यपि प्रायः सभी प्रकार के व्यक्ति इसके विषय में कुछ सम्मति दे सकते हैं और देते है. तथापि इसके सही अर्थ में कोई एकमत या सहमति देखने में नहीं आता है। शिक्षा शास्त्र संबंधी पुस्तकों व लेखों में हम शिक्षा की कई परिभाषाएं पाते हैं। उनका विश्लेषण करने पर हमने यह पाया है कि मोटे रूप में तीन प्रकार की परिभाषाएँ हैं-प्रथम, वे परिभाषाएँ जो दार्शनिक ने दी है तथा जो आदर्शों अथवा शाश्वत सत्य व मूल्यों पर बल देती है द्वितीय वे परिभाषाएँ जो भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण मानती है, स्पष्ट है कि ऐसी धारणा चिंतित माता-पिता व व्यावहारिक सामाजिक चिंतकों की ही हो सकती है:तृतीय ऐसी परिभाषाएँ जो बालक के व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया के रूप में शिक्षा को महत्वपूर्ण मानती है।


सुकरात ने शिक्षा को त्रुटि को दूर करने तथा सत्य की खोज करने का कार्य बताकर, ऋग्वेद ने इसे मुक्ति दिलाने का साधन बताकर जगदगुरु शंकराचार्य ने इसे आत्मानुभूति अथवा ‘आत्मसाक्षात्कार कहकर, अरविंद घोष ने इसे आत्म की अपने भीतर की सर्वोत्कृष्ट शक्तियों को बाहर निकालकर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया बता कर प्रथम प्रकार की शिक्षा संबंधी परिभाषाएं दी थी।


• शिक्षा जीवन के लिए तैयारी या नौसिखियापन की अवस्था है' बिलमोट की यह परिभाषा जनता में आज भी सामान्य रूप से प्रचलित धारणा से भिन्न नहीं है। यज्ञवल्क्य, प्लेटो अरस्तू पेस्टालाजी, फ्लोबेल, रूसो, नन आदि विचारकों के मतानुसार शिक्षा एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने की प्रक्रिया है।


इन परिभाषों में हम कुछ न्यूनता स्पष्टतया देख सकते हैं। बिन किसी समाज की संस्कृति विशेष के संदर्भ को ध्यान में रखकर दी गयी ये परिभाषा हमें कोई भी स्पष्ट दिशा नहीं देती।

सत्य, सुंदरता, भलाई, सर्वागीण विकास आदि पद अथवा तत्व ऐसे हैं जिन्हें यदि किसी विशेष सामाजिक संदर्भ में रखकर चर्चा का विषय बनाया जाता है तो वे अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ ही प्रस्तुत करते हैं। भविष्य के महत्व पर सर्वाधिक बल देने वाले विचारक वर्तमान व भविष्य को भली-भांति व्यक्त नहीं करते। एक व्यक्ति का व्यक्तित्व बहुत कुछ उसके समाज की संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, परम्पराओं आदि से प्रभावित होता है, लेकिन लगता है कि तृतीय प्रकार की परिभाषा देने वालों ने मनोवैज्ञानिक कारकों को ही अधिकतम महत्वपूर्ण माना है।


शिक्षा संबंधी परिभाषाओं या विचारों की उपर्युक्त न्युनताओं अथवा सीमाओं के फलस्वरूप शिक्षा एक अत्यंत अस्पष्ट प्रक्रिया के रूप में उपस्थित होती है।

इसको सही रूप में समझने के कुछ प्रयास समाजशास्त्र व मानवशास्त्र के कुछ विद्वानों ने पिछले 120-125 वर्षों में किए हैं। उनकी इस संबंध में प्रमुख देने इस प्रकार हैं – प्रथम, वे मूलस्वरूप में इस पक्ष पर सर्वाधिक बल देते हैं कि हमें उस समाज या समुदाय विशेष की व्यवस्था व विशेषताओं को समझना होगा जिनमें शिक्षा दी जा रही है। द्वीतीय हम मानव की इन तीन प्रमुख सामाजिक विशेषताओं को अवश्य ध्यान में रखें -


(1) एक समाज या समूह के जीवन की विधि का प्रत्येक पक्ष व्यक्ति को सीखना पड़ता है, उसे वह जन्मजात रूप से ही नहीं पा लेता। 


(2) मानव शिशु अनुभवों को ग्रहण करता है तथा उनका विकास करते हुए स्वयं अपना असीमित विकास करने की महत्वपूर्ण क्षमता रखता है। 


(3) प्राणी जगत के अधिकांश प्राणियों की तुलना में वह अपने माता-पिता व अन्य प्रोदों की सहायता, आश्रय व प्रशिक्षण पर बहुत अधिक सीमा तथा पर्याप्त लंबे समय तक निर्भर रहता है। 

इन मूलाधारों पर ही शिक्षा में रुचि रखने वाले समाजशास्त्रियों, सामाजिक दार्शनिकों तथा सामाजिक व सांस्कृतिक मानवशास्त्रियों ने शिक्षा की सार्थक परिभाषा व व्याख्याएँ देने का प्रयास किया है।


कुछ प्राचीन मध्य तथा वर्तमान युग के विचारकों ने भी ऐसे कुछ विचार व्यक्त किए हैं, जो इन आधुनिक समाज वैज्ञानिकों के विचारों से मेल खाते हैं। उदाहरणार्थ, प्लेटो का मत था कि शिक्षा उ सिद्धान्त की ओर बालकों को खींचने या मार्गदर्शित करने की प्रक्रिया है

जिसे एक देश के कानून तथा वृद्ध लोगों व न्यायपरायण व्यक्तियों के अनुभवों के अनुसार उचित माना जाता है। "हरबर्ट स्पेंसर के अनुसार शिक्षा वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के लिए बालक को तैयार करने की प्रक्रिया के रूप में ही हमारे सामने उपस्थित होती है। हमारे देश में शिक्षा का अर्थ है देश के लिए प्रशिक्षण तथा राष्ट्र के लिए प्रेम।


लेकिन व्यवस्थित रूप से अथवा कुछ सामाजिक सिद्धांतों के आधार पर शिक्षा की व्याख्या करने का श्रेय तो वास्तव में आधुनिक समाजशास्त्रियों व सामाजिक मानव शास्त्रियों को ही दिया जा सकता है। फ्रांस के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम (1858-1917) उनमें अग्रणी रहें हैं।

वे फ्रांस के बोडीयू तथा सोहबो विश्वविद्यालय में क्रमशः 1887 से 1902 तथा 1902 से 1917 तक समाजशास्त्र के प्राध्यापक भी रहे थे। संक्षेप में उनके शिक्षा संबंधी समाजशास्त्री विचारों को उनकी पुस्तक एजुकेशन एंड सोशियोलोजी' में देखा जा सकता है। अपने जीवन के आरंभ में आस्ट्रेलिया की अरुंटा जनजाति की सांस्कृतिक विशेषताओं से प्रभावित होकर उन्होंने समाजशास्त्र के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रस्तुत किये थे। उन्हीं सिद्धांतों की सहायता से उन्होने परंपरागत समाज में शिक्षा के कार्य को समझने का यत्न किया था। उनकी विचारधारा को अत्यत्न संक्षेप व सरल रूप में हम निम्न लिखित रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं


प्रथम, प्रत्येक समाज के सम्मुख सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होता है कि वह अपने अस्तित्व को बनाए रखे। इसीलिए तो वह परम्पराओं, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, शिक्षा, कानून आदि अनेकानेक साधनों व उपायों के द्वारा यह प्रयत्न करता रहता है कि उनकी निरंतरता बनीं रहे। कोई भी समाज स्वयं को नष्ट करने की बात नहीं सोच सकता।


द्वितीय, प्रत्येक समुदाय या समाज की अपनी समूहिक भावना होती है। रिश्तेदारी, निकट संपर्क तथा दूर-दूर के लेकिन घनिष्ठ सामाजिक सम्बन्धों तथा श्रम विभाजन के संबंध द्वारा समूह की यह सामाजिक भावना विकसित होती है। प्रायः इस चेतना की अभिव्यक्ति सामूहिक प्रतिनिधित्व' के द्वारा की जाती है। उदाहरणार्थ देश या समूह का झण्डा, नारा, मूर्ति, धार्मिक पुस्तकें, पुरस्कार कोई विशेष उच्च पद आदि प्रतीक सामुदायिक प्रतिनिधित्व ही कर्टेन हैं, क्योंकि समुदाय की चेतना व एकता इन्हीं के द्वारा प्रकट होती है।


तृतीय, मनुष्य इसीलिए मनुष्य है क्योंकि वह समाज में रहता है। इस कथन के द्वारा लेखक समाज की सर्वाधिक शक्ति, महत्व व निर्णायक शक्तियों को अभिव्यक्त करता है।


चतुर्थ, सामाजिक तथ्य व्यवहार, विचार, अनुभव या क्रिया का वह पक्ष होता है जिसका कर्म विषयक अर्थात निष्पक्ष रूप से अध्ययन या निरीक्षण किया जा सकता है तथा जो कि किसी विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करता है। प्रत्येक सामाजिक तथ्य में बाह्यता तथा बाध्यता अवश्य होती है। सामाजिक तथ्य सामाजिक चेतना से संबन्धित होते हैं।