आश्रम व्यवस्था का समाजशास्त्रीय महत्व - Sociological Importance of Ashram System
आश्रम व्यवस्था का समाजशास्त्रीय महत्व - Sociological Importance of Ashram System
भारतीय समाज में आश्रम व्यवस्था व्यक्ति के समाजीकरण का प्रमुख आधार रहा है। इस व्यवस्था का आधार यह विश्वास है कि व्यक्ति के मानसिक, नैतिक व आध्यात्मिक विकास के बिना समाज को संगठित नहीं किया जा सकता। इसका संक्षिप्त विवेचन निम्नांकित रुप से किया जा सकता है -
1- जीवन के समुचित विकास की भावना:- आयु के बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक शक्ति कार्यक्षमता अनुभव एवं मानसिक प्रवृतियों में परिवर्तन आता रहता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय विद्वानों ने जीवन को न केवल बाल्यावस्था, युवावस्था प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था में विभाजित किया, बल्कि प्रत्येक अवस्था के लिए विशेष आश्रम की व्यवस्था भी की है ताकि व्यक्ति के जीवन का समुचित विकास हो सके।
2- मानवीय गुणों के विकास एवं मानवतावादी समाज की स्थापना में योगदान:- आश्रम व्यवस्था में व्यक्ति में मानवीय गुणों के विकास में काफी योगदान दिया है। चारों आश्रमों में कर्तव्यों का निर्धारण इस प्रकार से किया गया है त्याग, परोपकार, सहनशीलता, सामाजिकता, सरलता, उदारता, अध्यात्मिकता और बंधुत्व जैसे गुणों का विकास हो सके। इन सब गुणों के विकास के परिणाम स्वरुप समाज में ऐसे व्यक्ति निर्मित हो पाए जिन्होंने एक मानवतावादी समाज की स्थापना में काफी योगदान दिया हो।
3- व्यक्ति व समाज की पारस्परिक निर्भरता पर जोर:- व्यक्ति व समाज दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों का विकास संतुलित रूप से पारस्परिक निर्भरता को बनाए रखने पर ही निर्भर करता है। व्यक्ति प्रत्येक आश्रम में अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए यह भली-भांति वह केवल स्वयं वह अपने परिवार के लिए ही नहीं जीता। यहां वह स्पष्टतः जान लेता है कि समाज ने भी पग-पग पर उसके विकास में योगदान दिया है। अतः समाज के प्रति उचित रीति से अपने दायित्वों को निभाने का भाव उसमें जागृत होता है।
4- बौद्धिक विकास, ज्ञान के संग्रह एवं प्रसार तथा समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ी दर-पीढ़ी हस्तांतरित पूर्ण योग:- इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति अपने जीवन के प्रारंभ से अंत तक किसी न किसी रूप में ज्ञान को अर्जित करता है तथा अपना बौद्धिक विकास भी करता है। गुरु के आश्रम में रहकर ब्रह्मचारी व्यक्तिगत संपर्क से बहुत कुछ सीखता रहा है। वेदों तथा अन्य धर्म ग्रंथों के अध्ययन से न केवल बालक का बौद्धिक नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास होता रहा है बल्कि ज्ञान का संग्रह और समाज के सांस्कृतिक परंपराओं का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण भी हुआ है।
5- सामाजिक नियंत्रण के रूप में:- इसके अंतर्गत व्यक्ति के कर्तव्य एवं दायित्व इस प्रकार निश्चित किया गया था कि उसके व्यवहारों की मान्यता प्राप्त तरीकों के विभिन करने की साधारणता संभावना ही नहीं रहती। आश्रम व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति का चरित्र निर्माण ही कुछ इस प्रकार का होता था कि वह समाज विरोधी या अनुचित कार्य कर ही नहीं पाता था।
6- व्यक्तिवादीता के दोषों से समाज को मुक्त रखने एवं समाज कल्याण में योग:- व्यक्तिवादीता को प्रोत्साहित और समाज कल्याण की अवहेलना करके कोई भी समाज अधिक समय तक सुसंगठित व सुरक्षित नहीं रह सकता। अतः भारतीय विचारकों में आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति के कर्तव्यों का निर्धारण इस प्रकार से किया कि समाज व्यक्ति वादिता के दोष से मुक्त रहे। यहां मानव सेवा के अलावा अन्य प्राणियों के भरण-पोषण का दायित्व भी व्यक्ति पर रहता था।
7- व्यवहारिक एव उपयोगितावादी सिद्धांत:- आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यवहारिक एवं उपयोगितावादी पक्ष पर विशेष ध्यान दिया गया है। यहां व्यक्ति के कर्तव्यों को कुछ इस प्रकार से निर्धारित किया गया है कि संपूर्ण समाज का हित हो। धर्म के अंतर्गत भी कर्तव्य पथ पर विशेष जोर दिया गया है। गृहस्थ आश्रम में संपन्न किए जाने वाले पंचमहायज्ञ की सामाजिक दृष्टि से काफी उपयोगिता थी। व्यक्ति को परिश्रमी बनाने का प्रयास किया गया है। अर्थ को पुरुषार्थ मानकर धन कमाना व्यक्ति के लिए आवश्यक बताया गया है परंतु यहां धन को केवल स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन न मानकर समाज हित का साधन मानने की बात कही गई है। आश्रम व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति को सामाजिक कार्य करने एवं अपने त्याग की भावना विकसित करने का अवसर मिला है।
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