परिकल्पना के स्रोत - Source of Hypothesis

 परिकल्पना के स्रोत - Source of Hypothesis


परिकल्पना संबंधी विचार का जन्म जागते सोते कभी भी, कहीं भी और किसी भी क्षण हो सकता है। जब कभी हम अकेले बैठे हों, किसी भी समारोह. मेले या संस्कारों के रीति-रिवाजों में भाग ले रहे हों. कुछ विचार हमारे मस्तिष्क में किन्ही घटनाओं को देखकर या उनके बारे में सुनकर उत्पन्न हो सकते हैं। बाद में ये विचार ही किसी उपयोगी परिकल्पना का आधार बन सकते हैं। न्यूटन का बहुप्रसिद्ध उदाहरण उपरोक्त विचारों की पुष्टि करता है कि जब सेब के वृक्ष के नीचे सो रहा था. तब अचानक एक सेव पेड़ से टूट कर नीचे गिरा। इस घटना ने उसके मस्तिष्क में यह प्रश्न उत्पन्न किया कि सेव नीचे क्यों गिरा, ऊपर क्यों नहीं गया। बस, यही विचार बाद में उसके 'गुरुत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धांत' का आधार बन गया।


परिकल्पनाओं के अनेक स्त्रोत हैं, जो प्रमुख रूप से हैं: 


(1) अंतर्ज्ञान :


जिसे हम साधारण भाषा में अंतर्मन की आवाज कहते हैं. वह अंतर्ज्ञान ही है। यह एक प्रकार की अंतर्दृष्टि है, जो घटनाओं तथा वस्तुओं के प्रति मानव को एक प्रकार का ज्ञान प्रदान करती हैं। यह ज्ञान सही या गलत दोनों प्रकार का हो सकता है। प्राचीन ऋषि-मुनियों का बहुत सा ज्ञान इसी अंतर्ज्ञान पर आधारित था। हम अपने जीवन में बहुत से निर्णय भी अंतर्ज्ञान के आधार पर ही करते हैं। किंतु वैज्ञानिक ज्ञान पथ निष्कर्षों के स्रोत के रूप में अंतर्ज्ञान को एक संतोषप्रद साधन नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस प्रकार के ज्ञान पर आधारित परिकल्पनाओं का बहुधा अनुभविक परीक्षण संभव नहीं होता। 


(2) सामान्य संस्कृति :


विज्ञान के विकास में हमारी रोजमर्रा की सामान्य संस्कृति (जीवन-शैली, आचार-विचार और विश्वास आदि) का भी योगदान है। यह परिकल्पनाओं के विकास को तीन रूप में प्रभावित करती है : 


(अ) सांस्कृतिक मूल्य : प्रत्येक संस्कृति के अपने कुछ विशिष्ट मूल्य होते हैं, जो उस संस्कृति में ज्ञान विज्ञान के प्रसार और शोध की दिशा का निर्धारण करते हैं। प्रत्येक जनसमूह की अपनी विशिष्ट संस्कृति, अपने विशिष्ट सांस्कृतिक मूल्य होते हैं, जो उस जनसमूह के ज्ञान विज्ञान को प्रभावित करते हैं। आधुनिक विज्ञान का विकास पश्चिमी संस्कृति में ही होने का प्रमुख कारण वहां की विशिष्ट संस्कृति है, जो कई अर्थों में भारतीय संस्कृति से भिन्न रही है। जहां पश्चिमी, विशेष रूप में अमेरिकी संस्कृति व्यक्तिगत प्रसन्नता, गतिशीलता और प्रतिस्पर्धा पर जोर देती है, वहां भारतीय संस्कृति का आधार प्रमुखतः समूहवाद, स्थायित्व तथा सहयोग रहा है। यही कारण है कि जहां यौन सुख, वैवाहिक सामंजस्य और पारिवारिक विघटन जैसे विषयों पर अमेरिका और पश्चिमी देशों में ढेर सारे अध्ययन हुए हैं, वहां ये अध्ययन भारत में गौण महत्व के रहने के कारण समाज वैज्ञानिकों ने इन विषयों पर कोई ध्यान नहीं दिया। जाति व्यवस्था और संयुक्त परिवार, ये दो संस्थाएं भारतीय समाज और संस्कृति के आधार स्तंभ रहने के कारण यहाँ इन पर काफी शोध कार्य हुए है और अब भी हो रहा है।


(ब) लोक विश्वास : प्रत्येक संस्कृति में कुछ ऐसे लोगों में विश्वास प्रचलित होते हैं, जिनके आधार पर कई शोध परिकल्पनाएं जन्म ले सकती हैं। इन लोक विश्वासओं की अभिव्यक्ति लोक कहावतों, सूक्तियों और धार्मिक आख्यानों द्वारा होती हैं।


(स) सामाजिक परिवर्तन: समयांतर के साथ प्रत्येक समाज और संस्कृति में परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन सामाजिक संबंधों को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। भारतीय समाज का आधार व्यक्तिगतता के स्थान पर सामूहिकता रहा है. अतः यहां पश्चिमी समाजों की भांति परिवारों के टूटने की समस्या नगण्य रही है। किंतु औद्योगिकरण, शिक्षा तथा विज्ञान और तकनीकी के विकास ने सामूहिकता की भावना पर प्रहार किया है, उनका आकार छोटा अर्थात एकाकी परिवार होता जा रहा है। इस परिवर्तन ने ना केवल परिवार के आकार को अपितु सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया है, जिसके कारण पति-पत्नी, माता-पिता और संतानों के संबंधों में दरारें उत्पन्न हो गई हैं।

जहां भारत में तलाक जैसी घटना को आश्चर्य से देखा जाता था, वहां अब यह धीरे-धीरे एक सामान्य घटना बनती जा रही है। न्यायालयों में तलाक के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। यह सब कुछ सामाजिक परिवर्तन का ही प्रभाव है। इस परिवर्तन ने परिवार, जाति और संपूर्ण समाज संबंधी कई शोध परिकल्पनाओं को जन्म दिया है। 


(3) वैज्ञानिक सिद्धांत:


शोध की शुरुआत परिकल्पना से होती है और इसका अंतिम लक्ष्य सिद्धांत का निर्माण है। किंतु कभी-कभी पुराने सिद्धांतों का नए परिवर्तनों के संदर्भ में पुनः परीक्षण करना जरूरी हो जाता है और इस प्रकार एक शोधकर्ता तार्किक निर्गमन की प्रक्रिया का प्रयोग कर पुराने सिद्धांतों के आधार पर परिकल्पनाओं की रचना कर उनका परीक्षण करता है। पुरानी मान्यता के आधार पर यह माना जाता था कि द्रव का ना निर्माण किया जा सकता है और ना ही उसको मिटाया जा सकता है।

किंतु इस मान्यता अथवा सिद्धांत को सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गलत सिद्ध कर यह स्थापित किया कि किसी द्रव को शक्ति में और शक्ति को द्रव में परिवर्तित किया जा सकता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खीम के आत्महत्या संबंधी एकीकरण के सिद्धांत ने कई विभिन्न प्रकार के विपथगमन और असमायोजनात्मक व्यवहार संबंधी परिकल्पना को जन्म दिया है। किंतु विज्ञान में किसी भी सिद्धांत को अंतिम सत्य नहीं माना जाता। ज्ञान-विज्ञान की प्रसार की प्रक्रिया में निरंतर अस्वीकरण, संशोधन, नवीनीकरण और परिवर्तन चलता रहता है। डाल्टन और आइंस्टीन जैसे विद्वानों के सिद्धातों का भी पुनरीक्षण किया जा रहा है। विज्ञान स्वयं नई परिकल्पनाओं को जन्म देता है। प्रयोगशाला में प्रयोग करते समय कई बार नए अनुभव प्राप्त होते हैं और यह अनुभव अग्रिम शोध में परिकल्पना क्या कार्य करते हैं। यह कहा जा सकता है कि पुराने शोध के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष या सिद्धांत वैज्ञानिक उन्नति के संदर्भ में नई शोध हेतु परिकल्पना का कार्य कर सकते हैं। 


(4) सादृश्यताएं :


समान पंखों वाले पक्षी एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। पक्षियों के व्यवहार के बारे में यह एक बहुत पुरानी कहावत है,

किंतु यह कहावत बहुत कुछ रूप में मानवीय व्यवहार पर भी लागू होती है। सादृश्यताओं के आधार पर ही मानवीय पारिस्थितिक विज्ञान का जन्म हुआ, जिसका जन्म स्रोत मूलतः वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान की पारिस्थितिक विज्ञान की अवधारणा है। समाजशास्त्र के क्षेत्र में विपथगामी व्यवहार के अध्ययन में शिकागो संप्रदाय के समाजशास्त्रियों ने इस इकोलॉजी की धारणा का प्रयोग किया है। इसी प्रकार कर्ट लेविन का क्षेत्र सिद्धांत भौतिक जगत की कुछ सादृश्यताओं पर ही आधारित है। 


(5) व्यक्तिगत अनुभव :


शोध संबंधी प्रारंभिक विचार अथवा परिकल्पना कभी भी किसी के मस्तिष्क में जन्म ले सकते हैं। ये विचार एक साधारण व्यक्ति को बाद में वैज्ञानिक का चोला पहना देते हैं।

विज्ञान का इतिहास देर सारे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जो यह बताते हैं कि किस प्रकार एक साधारण व्यक्ति का आनुभविक प्रेक्षण शोध की एक परिकल्पना बन गया और उसके आधार पर सिद्धांतों का निर्माण हुआ। न्यूटन और वाटसन के उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उनके व्यक्तिगत अनुभवों ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति और भाप की शक्ति के सिद्धांतों की रचना की है। इस प्रकार के विचार प्रत्येक मस्तिष्क में उत्पन्न नहीं होते. यद्यपि उन्हें घटनाओं को सभी लोग देखते हैं और देखते रहे हैं। जूलियन हक्सले ने डार्विन के विकासवादी सिद्धांत की उत्पत्ति के संदर्भ में कहा है कि किसी भी सिद्धांत के जन्म के लिए सही समय पर सही व्यक्ति की जरूरत होती है। 


( 6 ) साहित्य :


शोध की परिकल्पनाओं का जन्म साहित्य के साथ-साथ पुराने शोध अध्ययनों के निष्कर्षों से भी हो सकता है।

जो बातें कुछ उपन्यासों में एक शताब्दी पूर्व मात्र कल्पना के रूप में लिखी गई थीं, आज साकार होती जा रही हैं। उपन्यासकार हक्सले ने 19वीं शताब्दी में लिखे एक उपन्यास नवीन साहसिक जगत अपने भविष्य के बारे में उड़ान भरते हुए लिखा था कि भविष्य में विज्ञान इतना उन्नत हो जाएगा कि प्रयोगशालाओं में वीर्य और रज को मिलाकर कृत्रिम रूप से बच्चों उत्पन्न किए जा सकेंगे, स्त्री प्रसूति व्यथा से मुक्ति पा सकेंगी। इस प्रकार, बहुत पहले संस्कृत लेखक कामंदकी ने परिवार और विवाह व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि परिवार एकांकी होंगे, उनमें में बच्चों की संख्या कम होगी, मातृत्व ऐच्छिक तथा नियोजित होगा, पति-पत्नी की और पत्नी पति की प्रियतम वस्तु होगी, वे एक दूसरे के मित्र, बंधु और जीवन होंगे। कुछेक वैज्ञानिकों ने काल्पनिक कही जाने वाली इन बातों को अपने शोध का आधार बनाया|