वैयक्तिक अध्ययन में सूचनाओं के स्रोत - Sources of Information in Individual Studies
वैयक्तिक अध्ययन में सूचनाओं के स्रोत - Sources of Information in Individual Studies
वैयक्तिक अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा विविध प्रकार के स्रोतों एवं प्रविधियों का उपयोग किया गया है। इस दृष्टिकोण से, इसे बहमुखी प्रकृति वाली विधि की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। नेल्स एण्डरसन (1923) ने 'होब' लोगों के जीवन पद्धति की आन्तरिक संरचना का अध्ययन हेतु सर्वप्रथम उनके समूह में गाये जाने वाले लोक गीतों, गाथाओं तथा उनकी कविताओं का उपयोग किया। तत्पश्चात् विभिन्न संस्थाओं द्वारा होबो लोगों' के जीवन के बारे में ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रकाशित सांख्यकीय तथ्य एकत्र किये गये। इसी क्रम में, उनकी वंशावलियाँ, फोटो तथा निकटवर्ती व्यक्तियों से भी विविध प्रकार की सूचनाओं का संग्रह किया गया। इन्हीं स्रोतों के माध्यम से एण्डरसन 'होबों लोगों' के जीवन की आन्तरिक विशेषताओं तथा उनके सामाजिक संगठन के बारे में व्यावहारिक नियमों के स्थापना में सफल हो पाया। यदि हम वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयोग में लाये जाने वाले स्रोतों की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें दो भागों में विभाजित कर उनका अध्ययन किया जा सकता है : वैयक्तिक अध्ययन के प्राथमिक स्रोत एवं वैयक्तिक अध्ययन के द्वैतियक स्रोत ।
1. प्राथमिक स्रोत: वैयक्तिक अध्ययन में अनुसंधानकर्ता चयनित इकाई से संबंधित विविध तथ्यों का संग्रह प्राथमिक सूचनाओं के माध्यम से करता है। इस दृष्टिकोण से वह व्यक्तिगत स्तर पर अवलोकन एवं साक्षात्कार प्रणालियों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से आवश्यक सूचनाओं को एकत्र करता है। तत्पश्चात अन्य प्रकार के तथ्य प्राप्त करने तथा संकलित सूचनाओं का सत्यापन करने के उद्देश्य से उसके द्वारा अध्ययन की इकाई से संबंधित व्यक्ति के मित्रों, पड़ोसियों, पारिवारिक सदस्यों तथा अन्य सम्बन्धियों से सम्पर्क स्थापित किया जाता है। प्राथमिक स्रोतों के माध्यम से न केवल विविध प्रकार की आवश्यक सूचनाओं को संग्रह किया जाता है बल्कि उनकी विश्वसनीयता भी स्थापित की जाती है। प्राथमिक स्रोतों द्वारा प्राप्य तथ्य अनोपचारिक तथा आन्तरिक प्रकृति दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
2. द्वैतियक स्रोत : प्राथमिक स्रोतों के अतिरिक्त वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत सूचनाओं के संकलन के लिए द्वैतियक स्रोत भी महत्वपूर्ण होते हैं। सामान्य तौर पर ये द्वितीयक स्रोत अनेक प्रकार के वैयक्तिक प्रलेखों जैसे डायरी, वैयक्तिक पत्र एवं लेख इत्यादि के रूप में होते हैं जो व्यक्तियों, समूहों, समुदायों से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनायें प्रदान करते हैं।
ये वैयक्तिक प्रलेख इच्छित अथवा अनिच्छित रूप से रचनाकार की मानसिक विशेषताओं तथा वाप्य परिवेश से संबंधित विविध प्रकार के तथ्य प्रस्तुत करते हैं, जो वैयक्तिक अध्ययन के विभिन्न सोपानों के दौरान उपयोगी सूचनायें प्रदान करते हैं। इस विधि के अन्तर्गत जिन द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है, उनमें डायरियाँ, पत्र, जीवन इतिहास, लेख, वंशावली प्रलेख, जीवन गाथा तथा विभिन्न संगठनों द्वारा सुरक्षित रिकार्ड इत्यादि हैं। कुछ प्रमुख द्वैतियक स्रोत का विवरण निम्नवत् है-
1. दैनन्दिनियाँ (डायरियाँ) : दैनन्दिनियाँ (डायरियाँ) अत्यन्त महत्वपूर्ण द्वैतियक स्रोत हैं जो अन्य स्रोत से प्राप्त वैयक्तिक आंकड़ों को अधिक पूर्ण बनाती हैं। दैनन्दिनियाँ व्यक्ति द्वारा स्वयं लिखी जाती हैं तथा इसमें व्यक्ति अत्यधिक स्वाभाविक रूप से अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं एवं संस्मरणों को लेखबद्ध करता रहता है।
ये व्यक्ति के नये सम्पर्कों तथा उसके द्वारा आवश्यक समझे गये अनुभवों पर प्रकाश डालती हैं, तथा उसके व्यक्तिगत अनुभवों को स्पष्ट करने वाली टीकाएँ प्रदान करती हैं। इनकी प्रकृति गोपनीय होती है अतः इसमें व्यक्ति के जीवन सम्बन्धी अनेक महत्वपूर्ण सूचनाओं और रहस्यों का उल्लेख होता है। चूँकि यह प्रतिदिन लिखी जाती है, अतः इसमें व्यक्ति के जीवन से संबंधित छोटी सी छोटी बातों का समावेश होता रहता है। इसके माध्यम से व्यक्ति की भावनाओं, मनोवृत्तियों, गोपनीय क्रियाओं, सफलताओं तथा असफलताओं को बहुत स्वाभाविक रूप से समझा जा सकता है। दैनन्दिनियाँ द्वितीयक स्रोत में महत्वपूर्ण इसलिए भी हैं, क्योंकि इसके माध्यम से उन अनेक तथ्यों से अवगत हुआ जा सकता है जिन्हें साक्षात्कार अथवा अवलोकन के द्वारा नहीं समझा जा सकता।
2. वैयक्तिक पत्र वैयक्तिक पत्रों के अन्तर्गत अन्तरंग सामग्री उपलब्ध होती है। ये व्यक्तिगत मनोवृत्तियों, संदेशों, संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं तथा निजी अभिरूचियों को स्पष्ट करते हैं,
जिन्हें अन्य दस्तावेज स्पष्ट करने में असमर्थ होते हैं। थामस और नैनकी ने अपने शोध अध्ययनों में विस्तृत स्तर पर पत्रों का प्रयोग किया। उनकी आधारभूत मान्यता यह थी कि व्यक्ति का विश्व के प्रति अभिमुखीकरण जानने के लिए भावनात्मक कारकों का अध्ययन करना आवश्यक है। उनके अनुसार इस मानवीय दस्तावेज के माध्यम से ही उन वास्तविक मानवीय अनुभवों एवं मनोवृत्तियों जो पूर्ण जीवित एवं वास्तविक सामाजिक वास्तविकता का निर्माण करते हैं, तक पहुँचा जा सकता है।
3. जीवन- इतिहास किसी व्यक्ति के जीवन इतिहास से वैयक्तिक अध्ययन में विस्तृत एवं स्पष्ट जानकारी प्राप्त होती है। वैयक्तिक जीवन इतिहास को सामान्यतया इसमें लेखक स्वयं अपने जीवन की भावनाओं एवं अनुभवों के बारे में अपनी ही भाषा में लिखता है। थामस और नैनकी ने जीवन इतिहास दस्तावेजों का व्यापक प्रयोग किया है। इनका उद्देश्य सम्पूर्ण जीवन चक्र अथवा उसकी किसी एक विशिष्ट प्रक्रिया का अध्ययन करना होता है।
यह जीवन चक्र किसी एक व्यक्ति, परिवार, संस्था, संगठन, सामाजिक समूह अथवा समुदाय के रूप में किसी एक वैयक्तिक इकाई से संबंधित हो सकता है।
4. अन्य वैयक्तिक दस्तावेज: उपरोक्त द्वितीयक सामग्रियों जैसे दैनन्दिनियाँ, वैयक्तिक पत्र, जीवन-इतिहास के अतिरिक्त अन्य वैयक्तिक दस्तावेज जैसे आत्मकथायें, स्वीकारोक्तियां भी वैयक्तिक अध्ययन में सहायक हो सकते हैं। आल्पोर्ट (1942 रू 12) ने इन्हें आत्म-प्रकटन करने वाले अभिलेख कहा है. जो इरादे के बिना अथवा इरादे के साथ लेखक के मानसिक जीवन की संरचना गतिकी तथा क्रिया से संबंधित सूचना प्रदान करते हैं।" वैयक्तिक दस्तावेज जीवन की उन परिस्थितियों में अनुभव की निरन्तरता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उसके व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार तथा जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हैं और जो सामाजिक वास्तविकता से सम्बन्ध बनाते हुए सम्पूर्ण जीवन परिस्थिति तथा वैयक्तिक संगठन के सम्बन्ध में अन्तदर्ष्टि प्रदान करते हैं।
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