विशिष्ट (अवशिष्ट) चालकः अर्थ एवं विशेषताएँ - Specific (residual) drivers: Meaning and characteristics
विशिष्ट (अवशिष्ट) चालकः अर्थ एवं विशेषताएँ - Specific (residual) drivers: Meaning and characteristics
मानव की अतार्किक क्रियाओं का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य द्वारा अपने व्यवहार को तर्कसंगत प्रमाणित करने की प्रक्रिया को कुछ तत्व अधिक स्थिर प्रकृति के होते हैं। यही तत्व व्यक्ति को कुछ विशेष वस्तुओं, व्यवहार के तरीकों अथवा व्यक्तियों के साथ एक विशेष ढंग से कोई संबंध जोड़ने की प्रेरणा देते हैं। पैरेटो ने इन्हीं चालकों को अवशिष्ट चालक कहा है। शब्दिक रूप से अवशिष्ट का अर्थ है (बचा हुआ । इस प्रकार किसी वस्तु अथवा विशेषता के उपयोग में आने के बाद जितना हिस्सा शेष रह जाता है उसी को हम (अवशिष्ट) कहते हैं। मानव व्यवहारों को प्रभावित करने वाली प्रेरणाओं में से जो प्रेरणाएं तार्किक और समाज द्वारा स्वीकृत नहीं होती, उन्हीं बची हुयी प्रेरणाओं से प्रभावित चालकों को ही हम (विशिष्ट चालक) कहेंगे। इनकी प्रकृति को स्पष्ट करते पैरेटो ने बतलाया कि अवशिष्ट चालक न तो मूल प्रवृत्तियाँ (Instincts) है और न ही संवेग (Sentiments) है लेकिन तो भी इनकी प्रकृति बहुत कुछ संवेगों से मिलती जुलती है। वास्तव में विशिष्ट चालक कुछ ऐसी प्रेरणाएं हैं जो मानव मस्तिष्क में बहुत गहराई तक बैठी हुयी नहीं होती है
बल्कि सतही तौर पर व्यक्ति को अपने कथन और व्यवहार में एक संबंध जोड़ने का आधार प्रदान करती है। इसी कारण विशिष्ट चालकों को संवेगों की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है यद्यपि इन्हें पूर्णतया संवेगों के समान नहीं कहा जा सकता। पैरेटो ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, (विशिष्ट चालक मूल प्रवृत्तियों तथा संवेगों का घोषित स्वरूप है।) इसी आधार पर एक अन्य परिभाषा है जिसमें मार्टिण्डेल लिखते हैं कि (विशिष्ट चालक तर्कहीन स्थिर तत्व है जो संवेग न होने पर भी संवेगों को अभिव्यक्ति करते हैं।)
पैरेटो की उक्त संदर्भ में परिभाष व व्याख्या के आधार पर एक तथ्य और भी उभर कर आता है कि मानव व्यवहार के उन स्थिर तत्वों का जिन्हें की उन्होंने (विशिष्ट चालक कहा है, पैरेटो ने अधिक स्पष्टीकरण नहीं किया है और यह सुझाव दिया है कि इसके विशय में मनोवैज्ञानिकों को और अधिक अध्ययन करना चाहिए।
कुछ भी हो, समाजशास्त्रियों के लिए यह ज्ञान व व्याख्या बहुत ही मुल्यवान व महत्वपूर्ण है। इनके अनुसार मानव व्यवहार के निर्धारण में प्रेरणाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है। पैरेटो का विशिष्ट चालक विशेष प्रकार की प्रेरणाये हैं। ये विशिष्ट चालक प्रेरणाओं की उपेक्षा अधिक स्थिर होती है और इसी कारण मानव व्यवहार को संचालित और नियंत्रित करने में इनका पर्याप्त योग होता है। पैरेटो की व्याख्या से यह स्पष्ट होता है कि ये भावनाएं न तो मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं और न ही प्रेरणात्मक या संवेगात्मक भावनाएं। इनके संबंध में पैरेटो ने जो कुछ बताया उससे इनका अधिक से अधिक स्पष्टीकरण या परिभाषा यह हो सकती है कि (विशिष्ट चालक मूल प्रवृत्तियों और भावनाओं की अभिव्यक्ति है।) पैरेटो के शब्दों में (जिस प्रकार थर्मामीटर में पारे का चढ़ना ताप के बढ़ने की अभिव्यक्ति है, उसी प्रकार विशिष्ट चालक मूल प्रवृत्तियों ओर भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं।) ये विशिष्ट चालक जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, अपेक्षाकृत अधिक स्थिर होते हैं। इनकी स्थिरता चाहे मूल प्रवृत्तियों के कारण हो या भावनाओं के कारण या अन्य किसी कारण से परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये अधिक स्थिर तत्व नहीं होते।
पैरेटो ने संवेगों की अभिव्यक्ति के रूप में विशिष्ट चालकों की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए मनुष्य की व्यावहारिक क्रियाओं और एक विवेकशील व्याख्या के अंतर की चर्चा की।
मानव क्रियाओं की विवेकशील व्याख्या यह मानकर चलती है कि मनुष्य पहले सोचता है. फिर विचार विकसित होते है और इन्हीं विचारों के आधार पर अन्त में सिद्धान्तों का निर्माण होता है। यही सिद्धान्त मानवीय क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। पैरेटो का कथन है कि व्यवहारिक स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है अर्थात व्यक्ति कोई व्यवहार पहले कर लेता है। फिर सोचता है और फिर किसी सिद्धान्त के संदर्भ में अपने व्यवहार को उचित मान लेता है। इससे स्पष्ट होता है कि (सिद्धान्त और वास्तविक क्रिया के बीच कार्य-कारण का कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। सिद्धान्त और क्रिया दोनों ही कुछ संवेगात्मक व्यवहारों के परिणाम है जो समाज में सदैव से कुछ स्थिरत ढंग से होते रहे है।) अतः कहा जा सकता है कि समाज में व्यक्ति जिन चालकों अथवा प्रेरणाओं के आधार पर विभिन्न क्रियाएं करता है वे चालक कही अधिक स्थिर प्रवृत्ति के होते हैं। पैरेटो के शब्दों में (विशिष्ट चालक समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए विश्लेषण की एक आधारभूत अवधारणा है। जबकि संवेगों का विश्लेषण विशुद्ध मनोविज्ञान है।)
उदाहरण के तौर पर जब हम अपने अध्यापक को प्रणाम करते हैं तो हमारी यह क्रिया इस विश्वास से बंधी है कि यदि हम अपने अध्यापक का आर्शीवाद पा लें तो हमें सुगम मार्ग मिलेगा। यह क्रिया विशिष्ट क्रिया है। एम. एन. निवास के जातियों के परिवर्तन में जब संस्कृतिकरण की बात करते हैं तो संस्कृतिकरण के ये तत्व (मानक, मूल्य, विश्वास, प्रथा, परम्परा) ही अवशिष्ट क्रिया है।
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