जैन धर्म का प्रसार तथा योगदान - Spread and Contribution of Jainism

जैन धर्म का प्रसार तथा योगदान - Spread and Contribution of Jainism


जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के प्रयोजन से महावीर ने अनुयायियों का एक संघ बनाया। इस संघ में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार और स्थान प्रदान किया गया। कुछ विद्वानों के अनुसार इन अनुयायियों की संख्या 14,000 अनुमानित की गई है। ब्राह्मणों से स्पष्ट पृथकना न होने के कारण जैन धर्म को फैलने में परेशानियाँ हुई. परंतु इसका प्रसार दक्षिण और पश्चिम भारत के क्षेत्रों में हुआ। क्योंकि इन क्षेत्रों में ब्राह्मणीय धारणाएं अपेक्षाकृत कमजोर थीं। दक्षिण भारत में जैन धर्म के फैलने का एक और कारण अकाल रहा है। महावीर के निर्वाण के लगभग 200 वर्षों के पश्चात मगध में अकाल पड़ा। यह अकाल लगभग 12 वर्षों तक रहा। इस कारण बहुत से जैन प्रवास कर दक्षिण भारत की ओर चल दिए। प्रवासी जैनों ने दक्षिण क्षेत्रों में उपदेश दिए और जैन धर्म को प्रसारित किया।


अकाल के पश्चात जब प्रवासी जैन मगध वापस लौटे, तो स्थानीय जैनों से उनका मतभेद हुआ तथा उन्हें पृथक रखने का प्रयास किया गया। प्रवासी जैनों का मत था

कि वे अकाल के दौरान भी जैन धर्म के मूल्यों और मान्यताओं का पालन करते रहे, जबकि मगध के स्थानीय जैनों ने इसकी अवहेलना की। इस मतभेद को दूर करने तथा जैन धर्म के मूल उपदेशों को अंकलित करने के प्रयोजन से पाटलीपुत्र, जो कि वर्तमान समय में पटना के नाम से जाना जाता है, में एक परिषद का नियोजन किया। प्रवासी जैनों द्वारा इस परिषद का भी बहिष्कार किया गया और इसके द्वारा निर्धारित किए गए निर्णयों को अस्वीकार कर दिया गया। यह भी एक कारण है कि जैन धर्म दो संप्रदायों में विभाजित हो गया। प्रवासी जैन, जो दक्षिण से आए थे, दिगंबर संप्रदाय से संबंधित हुए तथा मगध में रह गए जैन अनुयाई श्वेतांबर कहलाए।


कर्नाटक में ईसा कि तीसरी सदी के पूर्व जैन धर्म के होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं, हालांकि पाँचवीं सदी में कर्नाटक में अनेक जैन मठों की स्थापना हुई, इन्हें बसदि के नाम से जाना जाता था। इन मठों के भरण-पोषण आदि के लिए राजा ने भूमि दान में दी थी।

कलिंग, जो वर्तमान में उड़ीसा के नाम से जाना जाता है, में जैन धर्म का प्रचार-प्रसार ईसा पूर्व में चौथी सदी में माना जाता है। ईसा पूर्व दूसरी तथा पहली सदी में जैन धर्म का प्रसार तमिलनाडु के दक्षिणी भागों तक हो चुका था। बाद की सदियों में जैन धर्म का विकास गुजरात तथा राजस्थान के क्षेत्रों में हुआ।


यदि जैन धर्म के योगदान की बात करें तो इस धर्म ने ही सर्वप्रथम वर्ण व्यवस्था तथा वैदिक कर्मकांडों को रोकने हेतु गंभीर कदम उठाए। शुरुआत में जैन धर्म के अनुयायियों ने संस्कृत भाषा का त्याग किया और धर्म के उपदेश हेतु स्थानीय भाषा को अंगीकृत किया। यही कारण है कि जैन धर्म में स्थानीय लोगों की पहुँच अधिक बन सकी। आम बोलचाल की भाषा को ही जैनों ने प्राकृत भाषा के रूप में स्थापित किया। उनकी धार्मिक पुस्तकें अधिकांशतः अर्धमागधी भाषा में लिखित हैं। जैनों ने मध्य काल के प्रारम्भ में संस्कृत भाषा का भी प्रयोग किया और अनेक जैन ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे। इसके अलावा जैनों ने कन्नड भाषा के विकास में भी योगदान दिया तथा कन्नड में जैन धर्म के अनेक ग्रंथ लिखे गए। बौद्ध अनुयायियों की तरह जैन भी पूर्व में मूर्तिपूजक नहीं थे, परंतु बाद में वे महावीर और अन्य तीर्थंकरों को पूजने लगे। इसी कारण उनकी विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जाने लगीं। मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।