परिवर्तन के दौर में संयुक्त परिवार का स्थायित्व - Stability of joint family in times of change

परिवर्तन के दौर में संयुक्त परिवार का स्थायित्व - Stability of joint family in times of change


शोध कार्यों से प्रकट होता है कि संयुक्त परिवार पर अनेक आधुनिक शक्तियां अपना प्रभाव डाल रही हैं, किंतु वर्तमान में नगरीय क्षेत्रों के शिक्षित परिवारों में भी संयुक्त परिवार अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। अभी तक संयुक्त परिवार के संबंध में जो कुछ तत्थ उपलब्ध हैं. वह अपर्याप्त हैं और उसके आधार पर भारत में परिवार के भविष्य के संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। विभिन्न अध्ययनों के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों की वैज्ञानिक दृष्टि से तुलना करना भी कठिन है, क्योंकि अध्ययनों में संयुक्त परिवार की समान परिभाषा नहीं अपनाई गई है। डॉ. आर. एन. सक्सेना के अनुसार, वर्तमान संयुक्त परिवार का वास्तविक रूप एक परिवार के सदस्यों के पारस्परिक संबंधों में हैं न की सम्मिलित निवास स्थान, संपत्ति और रसोई में। यह तय है कि आज संयुक्त परिवार विभाजन की संख्या बढ़ गई है पर प्रत्येक संयुक्त परिवार कालांतर में कई नए संयुक्त परिवारों को जन्म देता है। कुछ भी हो, आज भी हिंदू परिवार वृद्ध माता-पिता को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है और व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक संरक्षण भी। विधवा एवं तलाकशुदा स्त्रियों को बहुधा अपने माता-पिता के परिवार में शरण मिलती है और आज भी ऐसे कितने ही परिवार मिलेंगे जिनमे पुत्रियों या बहनों की संतानें परिवार के सदस्य होते हैं।


वर्तमान समय में संयुक्त परिवार के परंपरागत लक्षणों जैसे कई पीढ़ियों के सदस्यों का एक साथ रहना, एक ही रसोई में बना खाना, संपत्ति का सहस्वामित्व धार्मिक एवं अन्य पारिवारिक अनुष्ठानों में सम्मिलित रूप से भाग लेना आदि में परिवर्तन हो रहे हैं। कुछ समाजशास्त्रियों की यह मान्यता है कि कई भाईयों के अलग-अलग रहने के उपरांत भी यदि वे पारस्परिक पारिवारिक संबंधों, सामान्य संपत्ति एवं पारस्परिक कर्तव्य परायणता के आधार पर एक सूत्र में बंधे हुए हैं तो भी उन्हें संयुक्त परिवार का सदस्य माना जाएगा। डॉ. इंद्रदेव ने संयुक्त परिवार के भविष्य के संबंध में लिखा है कि परिवार के ढांचे में विघटन अवश्य हो रहा है पर उसके कार्यात्मक पक्ष में नहीं। वास्तविकता यह प्रतीत होती है कि संयुक्त परिवार टूट कर सीधे शुद्ध व्यक्तिगत परिवार नहीं बन रहे हैं बल्कि परिवार के बहुत से ऐसे प्रकार बन रहे हैं जो न पूरी तरीके से एक में रखे जा सकते हैं और न दूसरे में।


इन्हें मध्यवर्ती प्रकार (Intermediary Types) कहा जा सकता है। भारत में जो नवीन प्रकार के परिवार बन रहे हैं उन्हें चाहे किसी भी नाम से क्यों ना पुकारा जाए इतना निश्चित है कि उन्हें संयुक्त परिवार की एकाकी इकाइयों को अधिक स्वतंत्रता देनी होगी।

परिवारिक मामलों में खी की राय को महत्व देना होगा और संबंधों की जटिल व्यवस्था में युवा सदस्यों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना होग। डॉ. कपाड़िया ने शोध कार्यों के आधार पर लिखा है कि हिंदू मनोवृत्तियां आज भी संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं फिर भी आज की बदली हुई परिस्थितियों में नगरीय क्षेत्रों में संयुक्त परिवार को अपने परंपरागत रूप में बनाए रखना संभव नहीं है। इतना अवश्य है कि ग्रामीण समाज की संरचना और कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था आज भी संयुक्त परिवार को बनाए रखने में समर्थ हैं। डॉ. योगेंद्र सिंह ने परिवर्तित परिवारिक संरचना के संबंध में बतलाया है कि भारत में संयुक्त परिवारों की संरचना एवं प्रकार्यों में परिवर्तन एक समन्वयात्मक प्रतिमान का अनुसरण कर रहे हैं, एक ऐसा प्रतिमान जो कि भारतीय समाज में संरचनात्मक परिवर्तन में सर्वमान्य है। जीवनसाथी के चुनाव में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत का विशेषतः नगरीय परिवार में, आज बढती हुई मात्रा में माता-पिता की स्वीकृति द्वारा समाधान किया जा रहा है। मध्यमवर्गीय घरों में पत्नी को बाहर दफ्तरों एवं स्कूलों में काम करने की स्वतंत्रता पति की स्वीकृति और कभी-कभी पति के या पत्नी के माता-पिता की स्वीकृति हैं। इन परिवर्तनों के बावजूद भी संयुक्त परिवार की परंपरागत विश्व दृष्टि अब भी पाई जाती है।


आंद्रे बिताई ने बताया है कि हिंदू समाज में अलग-अलग क्षेत्रों में परिवार संरचना भिन्न-भिन्न रही है। यह मान्यता है

कि संपूर्ण हिंदू समाज में संयुक्त परिवार प्रतिमान ही पाया जाता है, वास्तविकता की दृष्टि से सही नहीं है। बड़े संयुक्त परिवार जिनको हम परंपरागत रूप से हिंदू समाज के विशिष्ट लक्षण के रूप में मानते हैं. वास्तव में उसके किसी भी भाग में संबंधित रहे हैं। आपने बतलाया है कि उत्तरी भारत के गांव में बड़े संयुक्त परिवार राजपूत, जाट, भूमिहार तथा अन्य भूस्वामी जातियों से परंपरागत रूप से संबंधित रहे हैं। कुछ व्यापारिक समुदाय भी बड़े परिवारों से संबद्ध दिखाई पड़ते हैं। इन वर्षों में किए गए ग्राम अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भूस्वामी जातियों में बड़े परिवार अधिक सामान्य हैं, जबकि निम्न जातियों में नाभिकीय परिवार तुलनात्मक दृष्टि से अधिक है। विलियम जे गुडे ने भारतीय परिवार के संबंध में निष्कर्ष के रूप में बतलाया है कि एक निश्चित दिए हुए समय पर, अधिकांश भारतीय परिवारों के संयुक्त बनावट नहीं है। यह तथ्य फिर भी यह प्रमाणित नहीं करता की संयुक्त परिवार में काफी परिवर्तन आया है. क्योंकि अधिकांश परिवार भूतकाल में भी संयुक्त नहीं थे। फिर भी भारतीय मूल्य और प्रवृतियां अभी सामान्यतः संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं

और संयुक्त परिवार में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। विभिन्न अध्ययनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि संयुक्त परिवार परिवर्तन के मध्य में है। इसके विभिन्न संरचनात्मक पक्षों में परिवर्तन दिखलाई पड़ रहा है। इसके कई कार्य परिवर्तित परिस्थितियों में बदल गए हैं फिर भी संयुक्त परिवार टूटा नहीं है बल्कि चक्रीय प्रक्रिया के माध्यम से अपनी निरंतरता को बनाए रख सका है। आर. पी. देसाई तथा अन्य समाजशास्त्रियों का कथन है कि नाभिक परिवार संयुक्त परिवार के परिवर्तन चक्र में एक अवस्था है। संयुक्त परिवार से पृथक होने वाले निर्मायक भाग प्रारंभ में नाभिक परिवारों के रूप में होते हैं और कालांतर में वे संयुक्त परिवार के रूप में विकसित हो जाते हैं। इस प्रकार विकास का नवीन चक्र पुनः प्रारंभ हो जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि नाभिक परिवार को एक नवीन प्रकार की परिवारिक संरचना मानने के बजाय संयुक्त परिवार व्यवस्था का एक भाग माना जाना चाहिए।