आनुभविक अनुसंधान अभिकल्प के चरण - Stages of empirical research design

 आनुभविक अनुसंधान अभिकल्प के चरण - Stages of empirical research design


अनुसंधानकर्ता द्वारा आनुभविक अनुसंधान अभिकल्प के तहत निम्न वैज्ञानिक चरणों को अपनाया जाता है-


1) समस्या का चयन


सर्वप्रथम अनुसंधानकर्ता द्वारा शोध हेतु समस्या का चयन किया जाता है तथा इसी समस्या को वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करने हेतु शोधकार्य किया जाता है। वास्तव में शोधकर्ता का शोध विषय क्या है? शोध हेतु उपयुक्त समस्या/घटना क्या है? ज्ञान, तथ्यों तक पहुँच, समय अथवा संसाधन से जुड़े अवरोध क्या है? इस चरण के आधार पर ही शोध की आधारशिला निर्धारित की जाती है। समस्या के निरूपण के आधार पर ही शोधकर्ता द्वारा अनुसंधान हेतु उद्देश्य तैयार किए जाते हैं और उसकी प्रासंगिकता की जांच भी की जाती है।


2) साहित्यों का सर्वेक्षण


समस्या के चयन के पश्चात साहित्यों का सर्वेक्षण किया जाता है तथा इसी आधार पर वैज्ञानिक अनुमान प्रस्तावित किया जाता है। संबंधित समस्या के प्रति प्रासंगिक साहित्य क्या हैं? किस सैद्धान्तिक अथवा अवधारणात्मक फ्रेमवर्क से इसका संबंध स्थापित किया जा सकता है? इस परिप्रेक्ष्य की क्या आलोचनाएँ हैं? अथवा शोध हेतु किस प्रक्रिया को अपनाया जाएगा? शोधकर्ता को संबंधित क्षेत्र के बारे में क्या जानकारी है? संबंधित समस्या का इतिहास क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर की तलाश शोधकर्ता द्वारा इस चरण के तहत किया जाता है।


3) चरों की पहचान तथा उपकल्पना का निरूपण


इसके पश्चात अनुसंधानकर्ता द्वारा चरों की पहचान की जाती है तथा उपकल्पना निरूपित की जाती है।

कौन से आश्रित चर हैं तथा कौन से स्वतंत्र चर हैं? क्या संबंधित अध्ययन में नियंत्रित चर हैं? चरों के बीच क्या संबंध है? संबंध है भी की नहीं? क्या उपकल्पना शोध हेतु उपयुक्त है? क्या उपकल्पना अर्थपूर्ण और प्रासंगिक है? चरों की उपस्थिति और उपकल्पना की व्यावहारिकता के आधार पर ही शोध की अगली दिशा को निर्धारित किया जाता है तथा इससे शोध को एक प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि भी प्राप्त होती है। 


4) प्रविधियों व तकनीकों का चयन


इसके पश्चात कुछ तकनीकों व प्रविधियों की पहचान की जाती हैं। इनकी सहायता से उपकल्पना की जांच की जाती है कि उपकल्पना सत्य है

अथवा असत्य अवलोकन हेतु किस तकनीक का प्रयोग किया जाएगा? वह तकनीक दृश्य होगी अथवा श्रव्य क्या वैध तकनीक विधि उपलब्ध हैं अथवा शोधकर्ता द्वारा स्वयं ही उन्हें विकसित करना होगा? 


5) तथ्यों का संकलन


तकनीकों की पहचान तथा निर्धारण के पश्चात तथ्यों के संकलन का चरण आता है। किसी भी सामाजिक अनुसंधान का प्रयोजन किसी समस्या/घटना विशेष के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर एक वैज्ञानिक निष्कर्ष प्रस्तुत करना होता है। यह निष्कर्ष कोई आधारहीन निष्कर्ष नहीं होता है, अपितु यह वास्तविक तथ्यों पर प्रास्ताविक यथार्थ होता है तथा यह संबंधित समस्या/घटना को समझने हेतु एक वैज्ञानिक मंच को निर्मित करता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि किसी भी सामाजिक अनुसंधान की बुनियादी शर्त अध्ययन विषय से संबंधित वास्तविक तथ्यों का संकलन करना होता है।


6 ) तथ्यों का विश्लेषण


वैज्ञानिक तकनीकों व प्रविधियों द्वारा तथ्यों को संकलित कर लेने के पश्चात उनका विश्लेषण करना आवश्यक होता है। तथ्यों के विश्लेषण हेतु किस आलोचनात्मक अथवा सांख्यिकीय प्रक्रिया का प्रयोग किया जाएगा? तकनीकों की सहायता से किस प्रकार उपकल्पना को स्वीकृत अथवा अस्वीकृत सिद्ध किया जाएगा? चरों के मध्य किस प्रकार के संबंध हैं तथा ये संबंध कितने महत्वपूर्ण हैं? आदि प्रकार के प्रश्नों के उत्तर तथ्यों के विश्लेषण से सरलता से पता लगाए जा सकते हैं।


7 ) तथ्यों की व्याख्या


सबसे अंतिम चरण के रूप में तथ्यों की व्याख्या, निष्कर्ष तथा सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं। क्या उपकल्पना स्वीकृत / अस्वीकृत हुई? क्या प्राप्त निष्कर्ष सकारात्मक / नकारात्मक हैं? निष्कर्ष किसी सिद्धांत अथवा तर्क को स्थापित, संशोधित अथवा अस्वीकृत करते हैं। शोधकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए सुझाव क्या हैं? तथा क्या वे सुझाव किसी पॉलिसी अथवा प्रोग्राम के लिए लाभदायक है? शोधकर्ता द्वारा संबंधित क्षेत्र पर किए जाने वाले भविष्य के शोध हेतु क्या सुझाव दिये गए हैं?