मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति तथा समस्याएं - Status and problems of Muslim women

मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति तथा समस्याएं - Status and problems of Muslim women


हिंदू सामाजिक व्यवस्था की तरह ही मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था भी काफी उतार-चढ़ाव से गुजरी है। एक ओर उसमें हम अरबी सभ्यता की छाप स्पष्ट तौर पर देख सकते हैं, तो वहीं दूसरी ओर मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था में हिंदू सभ्यता के तत्व भी कमोबेश रूप में दिखाई देते हैं। इस इकाई में मुस्लिम समाज पर प्रस्तुत की गई व्याख्या से यह तो स्पष्ट है कि मुस्लिम स्त्रियों को स्वतंत्रता तथा अधिकारों से प्रायः वंचित ही रखा गया है।


समान्यतः सैद्धांति और व्यावहारिक धरातल में काफी अंतर देखने को मिलता है, तो मुस्लिम महिलाओं की व्यावहारिक स्थिति जानने के लिए उनके समक्ष उत्पन्न होने वाली गंभीर समस्याओं को जानना आवश्यक है। इस प्रकार से उनकी समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए हम मुस्लिम खियों की दशा के बारे में और भी संज्ञान प्राप्त कर सकेंगे


1. तलाक संबंधी अधिकार


तलाक और उससे संबंधी अधिकार मुस्लिम खियों के लिए एक गंभीर समस्या बना हुआ है। इस मामले में स्त्रियों को ना ही समान अधिकार प्राप्त है और ना ही स्वतंत्रता। मुस्लिम पुरुष जब चाहे तब स्त्री से तलाक ले सकता है. भले ही इस बारे में स्त्री को पता हो अथवा न हो। इन मामलों में स्त्री अपने आपको परिवार में असहाय के रूप में पाती है।


2. धार्मिक कट्टरता


मुस्लिम समाज की धार्मिक कट्टरता भी स्त्रियों की स्थिति को बेहतर बनाने के मार्ग में अवरोधक सिद्ध होती है। आज भी मुस्लिम क़ानूनों का आधार इस्लाम धर्म है और उन क़ानूनों में संशोधन करना धर्म के विरुद्ध जाना माना जाता है। इसके विपरीत हिंदुओं में समय-समय पर कानूनी तौर पर अनेक परिवर्तन किए गए और ए परिवर्तन स्त्रियों की स्थित को समाज में ऊंचा उठाने में सहायक भी साबित हुए हैं। जबकि मुसलमानों में इस प्रकार के परिवर्तनों का पुरजोर विरोध किया जाता है और इस प्रकार से स्त्रियों को मिलने वाले अधिकारों और स्वतंत्रता से उन्हें वंचित कर दिया जा रहा है। 


3. बहु-पत्नी विवाह


मुस्लिम समाजों में उनका धर्म एक पुरुष को चार पत्नियाँ रखने का अधिकार देता है और साथ ही इस बात पर भी जोर देता है कि सभी पत्नियों को समतापूर्ण अधिकार होने चाहिए। परंतु व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप स्त्रियों को पूर्ण रूप से पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वयं और अपने बच्चों को उचित अधिकार दिलाने के लिए मुस्लिम स्त्रियों को कठिन संघर्ष करना पड़ता है। 


4. पर्दा प्रथा


मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा का पालन आजीवन करना पड़ता है। मुसलमानों में पर्दा प्रथा का स्वरूप इतना जटिल है कि वयोवृद्ध महिला को भी बाहर जाने के लिए पर्दे में रहना अनिवार्य है। मुस्लिम समाज की स्त्रियों की स्थिति शिक्षा राजनीति और धार्मिक क्रियाओं आदि में निम्न है। वर्तमान समय में शिक्षा को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है तथा कुछ प्रगतिशील मुसलमानों ने महिला शिक्षा को लेकर प्रयास जरूर किए हैं। परंतु आज भी कुल जनसंख्या में उनका प्रतिशत नगण्य समान ही है। 


5. सामाजिक अधिकारों की अव्यवहारिकता


ज्ञातव्य है कि मुस्लिम स्त्रियों को सामाजिक जीवन में अनेक अधिकार प्राप्त हैं, परंतु ए अधिकार सैद्धांतिक धरातल से व्यावहारिक जीवन में नहीं आ पाए। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अधिकांश मुस्लिम स्त्रियों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी ही नहीं हो पाती है। मुस्लिम धर्म के अनुसार विधवा स्त्री को भी निम्न स्थिति पर रखा गया है तथा समान्यतः उन्हें पुनर्विवाह के अवसर नहबीन प्राप्त हो पाते हैं। आर्थिक क्षेत्रों में स्त्रियाँ पूरी तरह से पुरुषों पर निर्भर रहती हैं तथा यही कारण है कि वे स्वयं के शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाती। वर्तमान समय में निकाह के पूर्व स्वीकृति की रस्म निभाई जाती है तथा प्रायः यह स्वीकृति भी स्त्री के परिवारजनों/संरक्षकों द्वारा दे दी जाती है। अर्थात् उनके निकाह की स्वीकृति-अस्वीकृति संबंधी अधिकार भी उन्हें प्राप्त नहीं हैं। स्त्रियों को प्रदान की जाने वाली राशि मेहर' भी शायद ही कभी स्त्रियों को प्राप्त हो पति है। मुस्लिम स्त्रियाँ आज भी उन सभी प्रकार की अभावग्रस्तता से गुजराती हैं, जिनसे कभी हिंदू स्त्रियाँ मुखातिब हुआ करती थीं।