ईसाई स्त्रियों की स्थिति - status of christian women

ईसाई स्त्रियों की स्थिति - status of christian women


भारत में हिंदुओं तथा मुसलमानों की तुलना में स्त्रियों की स्थिति बेहतर है। धार्मिक दृष्टि से भी ईसाई स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए गए हैं। स्त्रियों की स्थिति को स्पष्ट करने हेतु निम्न बिंदु उल्लेखनीय हैं


a. व्यक्तित्व विकास के समान अवसर


ईसाई समाज में स्त्रियों को व्यक्तित्व विकास के लिए वे सभी अनुकूल अवसर प्रदान किए गए हैं, जो पुरुषों को प्रदान किए गए हैं। ईसाई समाज में स्त्रियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यही कारण है कि भारतीय शिक्षित महिलाओं में ईसाई महिलाओं का शिक्षा का प्रतिशत अधिक रहता है। शिक्षित होने के कारण उन्हें अपने अधिकारों और अवसरों के बारे में पर्याप्त जानकारी रहती है तथा यही कारण है कि वे प्रत्येक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित रखती हैं। अन्य धर्म और समाजों की स्त्रियों को घर से बाहर निकालने और स्वतंत्र रहने का अधिकार प्रायः कम दिया जाता है,

जबकि ईसाई स्त्रियों को इसकी पर्याप्त आजादी रहती है। ईसाई स्त्रियों ने विभिन्न कलाओं में अपना योगदान प्रस्तुत किया है, जैसे संगीत, नाटक, चित्रकला, मूर्तिकला आदि। 


b. वैवाहिक समानता


ईसाई समाज में विवाह की परंपरा तथा पद्धति स्त्रियों का पूरा सम्मान करती है। ईसाई समाज में कम आयु में विवाह नहीं किए जाते। इस प्रकार से स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व का विकास करने हेतु पर्याप्त समय मिल जाता है और साथ ही उनमें जीवन-साथ के चयन की सूझ-बुझ भी विकसित हो जाती है। ईसाई समाजों में संभवत वर का चयन लड़की द्वारा ही किया जाता है। विवाह हेतु स्त्री की सहमति अत्यंत आवश्यक रहती है। ईसाई समाज में स्त्री को विवाह करने हेतु भी कोई बाध्य नहीं करता. यदि कोई महिला आजीवन विवाह किए बिना रहना चाहती है तो उसे किसी को बाध्य करने का अधिकार नहीं प्राप्त है।

जबकि अन्य समाजों में इस भावना का प्रायः अभाव पाया जाता है। समाज सेवा के क्षेत्र में आने अविवाहित ईसाई महिलाओं ने उत्कृष्ट कार्य किए हैं। विधवा पुनर्विवाह को न केवल मान्यता प्रदान की गई है, अपितु विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित भी किया जाता है।


यदि कोई महिला अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं है, तो वह स्वेच्छा से विवाह-विच्छेद के लिए प्रस्ताव दे सकती है। विवाह-विच्छेद हेतु स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसाइयों में यह व्यवस्था स्त्री को सम्मानपूर्ण स्थिति प्रदान करने तथा पुरुष को संतुलित व्यवहार करने की सीख देता है।


c. सम्मानपूर्ण पारिवारिक जीवन


ईसाई समाज में स्त्रियों को न केवल सैद्धांतिक तौर पर अपितु व्यावहारिक जीवन में भी सम्मानपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है तथा साथ ही पुरुषों के तुल्य उन्हें सामाजिक और पारिवारिक अधिकार व स्वतंत्रताएं भी प्रदान की गई हैं।

परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में स्त्रियों की भूमिका प्रभावशाली रहती है। प्रत्येक स्त्री को विवाह पूर्व और विवाह पश्चात अपने जीवन संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता रहती है। परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा अपनी राय प्रस्तुत की जा सकती है, परंतु उन सुझावों पर अमल करने का अधिकार केवल स्त्री का होता है। वह परिवार के अन्य लोगों के साथ भोजन करती है तथा साथ ही पारिवारिक सदस्य उसके कार्यों में साथ देते हैं। इन मामलों में ईसाई समाज अन्य समाजों से पृथक है तथा स्त्री केवल घर के चूल्हे तक ही सीमित नहीं रहती है।


d. संपत्ति में अधिकार


ईसाई महिलाओं का संपत्ति पर उतना ही अधिकार रहता है, जितना कि पुरुष का। प्रत्येक विधवा स्त्री का उसके मृत पति की संपूर्ण संपत्ति पर अधिकार होता है। आर्थिक क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने की अनुकूल दशाएं ईसाई समाज द्वारा प्रदान की जाती है। वे न केवल सैद्धांतिक रूप से आर्थिक क्षेत्रों में सहभागिता करती हैं

अपितु व्यावहारिक तौर पर भी स्त्रियों की आर्थिक उन्नति को अन्य सदस्यों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। चर्च द्वारा भी स्त्रियों द्वारा की जाने वाली आर्थिक गतिविधियों का समर्थन किया जाता है। ईसाई स्त्रियों को विवाह के उपरांत कार्य करने से भी नहीं रोका जाता है। ईसाई स्त्रियाँ बहुतायत मात्रा में नर्स, डॉक्टर, अध्यापिका के तौर पर स्थापित हैं। विभिन्न विभागोंमें नौकरी और व्यवसाय आदि करने की वजह से धन-संपत्ति आदि पर उनका मालिकाना हक होता है। 


e. समान राजनैतिक अधिकार


ईसाई समाज में खियों को स्वेच्छा से वोट देने, उम्मीदवार बनने, किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनने, विचार प्रकट करने, भाषण देने, लेख लिखने आदि का पूर्ण अधिकार है। हालांकि ए सभी अधिकार भारतीय संविधान द्वारा प्रत्येक भारतीय को मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किए गए हैं, परंतु अन्य समाजों (हिंदू अथवा मुस्लिम समाजों में) में इन अधिकारों को प्राप्त कर पाना एक स्त्री के लिए दुष्कर होता है। अन्य समाजों की स्त्रियों को घर के अंदर रहने, कम बोलने, अपने परिवार की सेवा करने आदि के अधिकार ही प्राप्त रहते हैं।


f. धार्मिक सुविधाएं


धार्मिक सुविधाओं की दृष्टि से भी ईसाई स्त्रियों की स्थिति अन्य समाजों की तुलना में काफी बेहतर है। हिंदुओं के ही समान ईसाईयों में भी किसी धार्मिक कार्य में पुरुष के साथ स्त्री का सम्मिलित होना आवश्यक माना गया है। परंतु जहां हिंदू खियों को धार्मिक सुविधाएं सैद्धांतिक रूप से ही मिल पाती हैं, व्यावहारिक जीवन में वे इससे अछूती ही रह जाती हैं, उसके विपरीत ईसाई स्त्रियों को ए धार्मिक अधिकार सैद्धांति तथा व्यावहारिक दोनों जीवन में प्राप्त रहते हैं। वे धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर सकती हैं, प्रत्येक प्रार्थना में सहभागिता कर सकती हैं तथा ऐसा करने की उन्हें न केवल सुविधा है, बल्कि यह ईसाई स्त्रियों के लिए अनिवार्यता है। वे धर्म की शिक्षा ले सकती हैं तथा ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु पुरुषों की ही भांति पादरी भी बन सकती हैं।


g. सामाजिक स्थिति


ईसाई समाज में खियों की स्थितिं पुरुषों के ही समान है तथा उसे प्रायः वे सभी अधिकार प्राप्त हैं, जो पुरुषों को प्राप्त हैं। वे कहीं भी आ जा सकती हैं, किसी से भी वार्तालाप कर सकती हैं, किसी भी कार्यक्रम में भाग ले सकती हैं। प्रायः कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम बिना ईसाई स्त्री की उपस्थिति के संपन्न नहीं होता है। अतः उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों में जाने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। हिंदू स्त्रियों की भांति ईसाई स्त्रियों पर किसी प्रकार के निषेध नहीं लगाए गए हैं और ना ही उन्हें किसी बंधन में रखा जाता है।