वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयुक्त चरण / कार्य-विधि - Steps / Methodology Used Under Individual Study
वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयुक्त चरण / कार्य-विधि - Steps / Methodology Used Under Individual Study
वैयक्तिक अध्ययन की विषय वस्तु सामाजिक इकाइयों की आन्तरिक संरचना तथा उसके बाह्य वातावरण से संबंधित रहती है, जो स्वभावतया इतनी जटिल एवं अव्यवस्थित होती है कि उनका सम्यक् अध्ययन करने के लिए एक व्यवस्थित कार्य-प्रणाली को उपयोग में लाना आवश्यक हो जाता है। वास्तव में वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत सामाजिक इकाइयों का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों का इस प्रकार अध्ययन करना होता है जिससे कि उनकी आन्तरिक संरचना एवं वाप्य परिवेश की मौलिक विशेषताओं को समझा जा सके। इस पृष्ठभूमि में, वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयोग में लाए जाने वाले चरणों एवं सोपानों को समझ लेना आवश्यक प्रतीत होता है जिससे कि इस विधि का व्यवस्थित रूप से उपयोग किया जा सके- वैयक्तिक अध्ययन पद्धति के प्रमुख चरण अथवा उसकी कार्य-विधि के मुख्य पक्ष निम्नलिखित हैं।
(1) समस्या के पक्षों का निर्धारण
सर्वप्रथम वैयक्तिक अध्ययन के लिए अध्ययन की इकाई अथवा समस्या की प्रकृति का समुचित स्पष्टीकरण करना, इकाइयों का निर्धारण करना तथा अध्ययन क्षेत्र से पूर्णतया अवगत होना आवश्यक होता है। वास्तव में, वैयक्तिक अध्ययन की सफलता भी इसी प्रारम्भिक सोपान पर अत्यधिक आधारित होती है। अत: इस परिदृश्य में, अनुसंधानकर्ता को सामाजिक इकाई अथवा समस्या के विभिन्न पक्षों से संबंधित निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान देना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।
1. समस्या का चुनाव : वैयक्तिक अध्ययन हेतु सर्वप्रथम अध्ययन से संबंधित समस्या अथवा विषय का चयन करना अति आवश्यक होता है। वास्तव में, इसी चयनित समस्या के आधार पर ही किसी भी अनुसंधान को व्यवस्थित रूप से सम्पन्न किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यह समस्या बाल अपराध, मद्यपान, अनुशासन हीनता, पारिवारिक विघटन, सामाजिक तनाव, इत्यादि किसी विषय से संबंधित हो सकती है।
2. इकाइयों का निर्धारण : समस्या का चुनाव कर लेने के पश्चात् उससे संबंधित इकाईयों का निर्धारण करना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि अध्ययन मादक द्रव्यों के उपयोग से संबंधित है, तो इस तथ्य का निर्धारण करना आवश्यक होता है कि मादक द्रव्य व्यसन के अध्ययन हेतु उससे संबंधित कौन सी इकाई का चयन किया जाना है। इसके अन्तर्गत ये इकाइयाँ कोई भी व्यक्ति, समूह अथवा विशेष संस्थाएँ, इत्यादि हो सकती हैं।
3. इकाइयों की संख्या का निर्धारण : इसी क्रम में वैयक्तिक अध्ययन के लिए यह निर्धारित करना आवश्यक प्रतीत होता है कि अध्ययन की जाने वाली इकाइयों की संख्या क्या होगी। इस संख्या का निर्धारण अनुसंधानकर्ता के पास उपलब्ध साधनों और समय पर आधारित होता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि, यह संख्या इतनी कम नहीं होनी चाहिए कि अध्ययन से संबंधित सभी प्रकार के तथ्यों का संकलन न किया जा सके और न ही इतनी अधिक होनी चाहिए कि उनका गहन अध्ययन करना सम्भव न हो सके।
(2) अध्ययन के क्षेत्र का निर्धारण
वैयक्तिक अध्ययन के लिए समस्या के विभिन्न पक्षों का निर्धारण (जो उपरोक्त 'क', 'ख' तथा 'ग' के माध्यम से वर्णित किया गया है, के पश्चात् अनुसंधानकर्ता द्वारा उस स्थान अथवा क्षेत्र का निर्धारण करना भी आवश्यक होता है, जहाँ विभिन्न इकाइयों का अध्ययन किया जाना है। उदाहरण के तौर पर, मादक द्रव्य व्यसन संबंधित समस्या के अन्तर्गत इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति, समूह किन संस्थाओं, सुधार गृहों, चिकित्सालयों में रह रहें हैं, उनमें से किस स्थान पर वैयक्तिक अध्ययन करना है. इसका निर्धारण करना आवश्यक होता है।
(3) विश्लेषण क्षेत्र का निर्धारण
वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत समस्या के विशिष्ट क्षेत्र के निर्धारण के पश्चात अध्ययन की इकाई के विश्लेषण-क्षेत्र को पूर्णतया स्पष्ट कर लेना आवश्यक होता है। विश्लेषण क्षेत्र से अभिप्राय है अध्ययन की जाने वाली इकाई से संबंधित वे कौन से पक्ष महत्वपूर्ण हैं तथा कौन से पक्ष उपयोगी नही हैं। इस प्रकार विश्लेषण क्षेत्रों की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता दोनों का निर्धारण करना वैयक्तिक अध्ययन को व्यवस्थित करने से संबंधित हैं।
(4) समय या अवधि के अन्तर्गत घटनाओं के अनुक्रम का वर्णन
अध्ययन की इकाई के विश्लेषण क्षेत्रों के निर्धारण के पश्चात् अध्ययन से संबंधित समस्या अथवा इकाई को एक विशेष समय या अवधि के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करना आवश्यक होता है. अर्थात् इस तथ्य को समझना कि सामाजिक इकाई की कुछ विशेष घटनायें किस अवधि में घटित हुई तथा उन घटनाओं से संबंधित विभिन्न समय अवधि में कौन-कौन सी विशेषताएँ सम्बद्ध रही हैं, तथा भविष्य में इकाई से संबंधित कौन-सी घटनाओं के घटित होने की सम्भावना की जा सकती है, इत्यादि।
(5) निर्धारक अथवा प्रेरक
तत्व वैयक्तिक अध्ययन की यह प्रमुख मान्यता रही है कि, कोई भी घटना शून्य में नहीं घटती, अर्थात् प्रत्येक घटना अथवा समस्या को उत्पन्न करने वाले कुछ-न-कुछ निर्धारक या प्रेरक तत्व विद्यमान रहते हैं। अतः घटनाओं के क्रम को स्पष्ट कर लेने के पश्चात अध्ययन के लिए समस्या अथवा इकाई के अन्तर्गत घटनाओं के निर्धारक तत्वों को ज्ञात कर लेना आवश्यक होता है। उदाहरणार्थ, मादक द्रव्य व्यसन को प्रेरणा देने वाले अनेक कारक हो सकते हैं, जैसे पारिवारिक स्थिति. पड़ोस. मित्र की संगति. इत्यादि। वैयक्तिक अध्ययन के लिए ऐसे सभी प्रेरक तत्वों का ज्ञान वास्तविक अध्ययन को व्यवस्थित विधि से सम्पन्न करने हेतु आवश्यक होता है।
(6) विश्लेषण एवं निष्कर्ष
वैयक्तिक अध्ययन पद्धति के अन्तिम एवं सबसे महत्वपूर्ण चरण सभी संकलित तथ्यों का वर्गीकरण एवं उनका विश्लेषण कर निष्कर्ष प्राप्त करना होता है। इस विश्लेषण एवं निष्कर्ष का प्रमुख अभिप्राय है. एक विशेष अवधि अथवा वास्तविकता के अन्तर्गत होने वाली चयनित इकाई इकाइयों के व्यवहार के स्वभाव से पूर्णतया अवगत होना तथा उन दशाओं अथवा कारकों से परिचय प्राप्त करना जो चयनित समस्या या मानव व्यवहार के लिए उत्तरदायी होते हैं।
सारांश में, यह कहा जा सकता है कि, वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत वैज्ञानिक ढंग को अपनाकर कार्य करते हुए अनुसंधानकर्ता चयनात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान के माध्यम से अध्ययन प्रारम्भ करता है। वह एक सम्पूर्ण विश्लेषक की भूमिका में वैज्ञानिक वस्तुओं, तथ्यों एवं घटनाओं को एक विशिष्ट दृष्टिकोण तथा एक विशिष्ट प्रकार की अभिरुचि की दृष्टि से समझता है तथा उनका संग्रह, संकलन, अभिलेखन एवं निर्वचन करता है। वह यहाँ पर यद्यपि एक जटिल सामाजिक परिस्थिति/ वास्तविकता में पाये जाने वाले तत्वों की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखते हुए, किन्तु फिर भी इन सभी तत्वों का विवरण एक साथ प्रस्तुत न कर एक-एक करके उनका विश्लेषण एवं विवेचन करता है। वह वैयक्तिक अध्ययन प्रक्रिया से संबंधित आवश्यक गुणों जैसे अध्ययन विषय का समुचित ज्ञान, सूक्ष्म अवलोकन की क्षमता, विश्लेषण की क्षमता, तार्किक व्याख्या की कुशलता तथा प्रतिवेदन में वस्तुनिष्ठता इत्यादि के माध्यम से वैयक्तिक अध्ययन के विभिन्न चरणों/सोपानों को पार करता है।
वार्तालाप में शामिल हों