उद्दीपक प्रमुखता - stimulus prominence

उद्दीपक प्रमुखता - stimulus prominence


छवि निर्माण में व्यक्ति से अथवा उससे संबंधित सभी सूचना संकेतों का उपयोग छवि निर्माण में नहीं होता है। प्रेषक कुछ सूचना-संकेतों पर ध्यान केंद्रित करता है और शेष की उपेक्षा कर देता है। जिन सूचना संकेतों पर ध्यान केंद्रित होता है, वह आकृतिक हो जाती हैं, तथा अवधान की परिधि में आने वाले सूचना संकेत पृष्ठभूमि बन जाती हैं। यह पूर्वाग्रह आधान अवस्था में उद्दीपक कारकों से उत्पन्न होती है। व्यक्ति के छवि निर्माण के प्रसंग में जो भी व्यक्ति अपनी दैहिक बनावट, चाल-ढाल, परिधान या वाणी में असामान्य होते हैं, उन पर प्रेक्षक का ध्यान स्वतः केंद्रित हो जाता है। व्यक्ति से प्राप्त होने वाले सूचना संकेतों की असामान्यता छवि-निर्माण को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है। किसी भी परिवेश में व्यक्ति की असामान्यता अथवा उससे प्राप्त होने वाली सूचना प्रमुखता इस अर्थ में कार्य कारण को प्रभावित करती है कि प्रमुख लक्षणों वाले व्यक्ति सामाजिक स्तर पर अधिक प्रभावशाली लगते हैं। उदाहरण जो छात्र कक्षा की अगली पंक्ति में बैठता है और अध्यापन की अवधि में बार-बार प्रश्न करता है, तो ऐसा माना जाता है कि वह विद्यार्थी मेधावी है। दूसरा प्रभाव यह है कि असामान्य या प्रमुख लक्षणों वाले व्यक्तियों का मूल्यांकन होता है।

टेलर एवं अन्य (1977) ने श्वेत एवं अश्वेत लोगों का समूह बनाया। ने एक समूह में आधे श्वेत और आधे अश्वेत थे। दूसरा समूह श्वेत लोगों का था, जिसमें मात्र एक अश्वेत व्यक्ति सम्मिलित था। प्रथम समूह में अश्वेत आनंददायक थे और दूसरे समूह में दुखदायक। ऐसे में अश्वेतों का मूल्यांकन कराया गया। सुखद दशा में एकाकी अश्वेत को अधिक धनात्मक और दुखद दशा में अधिक ऋणात्मक मूल्य दिया गया।


टेलर (1981) ने यह प्रदर्शित किया है कि व्यक्ति की उद्दीपन प्रमुखता उसकी छवि को अधिक संगठित बना देती है। उदाहरण यदि कोई व्यक्ति आतंकवादी होने के कारण पकड़ा गया है, और पुलिस संरक्षण में न्यायालय की ओर ले जाया जा रहा है. तो उसे देखते ही निर्दयी हत्यारा और षड्यंत्रकारी होने के शीलगुण उसकी छवि में समाहित हो जाते हैं।