संस्कृति का संरचनावादी सिद्धांत - structuralist theory of culture

 संस्कृति का संरचनावादी सिद्धांत - structuralist theory of culture


क्लाउड लेवी स्ट्रॉस ने भाषा को माध्यम बनाकर संस्कृति को संरचना के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया। इनके अनुसार


1. भाषा एवं संस्कृति सदृश्य है।


2. भाषा एवं संस्कृति औपचारिक रूप से समान है।


3. भाषा एवं संस्कृति अनुरूप है।


4. भाषा एवं संस्कृति सह-संबंधित हैं।


इस विचार के मुख्य आधार यह है कि दोनों सांस्कृतिक व्यवहार को स्वीकार करते हैं तथा दोनों क्रियाओं की देन हैं। अतः दोनों मूल रूप से समान हैं। इस संबंध में निष्कर्ष मुख्यतः दो प्रकार के हैं, प्रथम उनके कार्य करने के सिद्धांत को अचेतन स्तर पर दर्शाना चाहिए। द्वितीय प्रत्येक का नियंत्रण सार्वभौमिक नियम द्वारा होता है। संपूर्ण तर्क का सामान्य कारण यह है कि भाषा के समान नातेदारी, कला तथा संस्कृति के अनेक तत्व संचारण व्यवस्था है। इस संबंध में लेवी स्ट्रास का कहना है कि समाज व संस्कृति को भाषा तक घटाएं बिना हम समान्य संस्कृति को संचारण सिद्धांत के अंतर्गत प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं। यह तीन स्तर पर संभव है, प्रथम- नातेदारी तथा विवाह नियम समूहों के बीच नारी का वितरण दर्शाता है। द्वितीय- ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नियम सेवा तथा वस्तु वितरण दर्शाता है। तृतीय भाषा विषयक नियम सूचनाओं का विवरण दर्शाता है।

अतः कला, धर्म, पौराणिक कथा, धार्मिक कृत्य आदि भाषा के उदाहरण हैं। लेवी स्ट्रास अचेतन मस्तिष्क के स्वभाव के अध्ययन के संदर्भ में पौराणिक कथा के अध्ययन की ओर विशेष ध्यान दिया। लेवी स्ट्रॉस ने आदिम मस्तिष्क के अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया, इससे संबंधित उन्होंने अपनी पुस्तक सेवेज माइंड' (1962) प्रकाशित की। उनका दृष्टिकोण भाषा विज्ञान के आधार पर आदिमानव के अचेतन मस्तिष्क को समझने का प्रयास था। उन्होंने आदिमानव की पौराणिक कथाओं, गीतों, व्यवहारों, मिथकों इत्यादि को भाषा का एक माध्यम मानकर अध्ययन किया। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि क्लाउड लेवी स्ट्रास ने भाषा के विभिन्न नियमों को सामाजिक संरचना के आधार पर व्याख्यायित किया है। उनका मानना था कि समाज में प्रचलित पौराणिक कथाएं, गीत, मिथक, प्रथाएं, धर्म, धार्मिक कृत्य, नृत्य, भाषण, संभाषण इत्यादि भाषा के माध्यम हैं, जो उस समाज के सामाजिक संरचना को व्यक्त करते हैं। स्ट्रास ने ज़ोर दे कर कहा कि भाषा संस्कृति का ही एक हिस्सा है, जिसके माध्यम से मानव ने अपने अचेतन मस्तिष्क के मनोभावों को प्रत्यक्ष रूप में व्यक्त किया। भाषा ही एक ऐसा माध्यम था, जिसके द्वारा आदिमानव ने अपने सुख-दुख, जीवन संघर्ष, हास-परिहास इत्यादि को पौराणिक कथाओं, परंपराओं, मूल्यों, गीतों, मिथकों, व्यवहारों इत्यादि के माध्यम से अपने समाज में अपनी पहचान, सांस्कृतिक विशेषता एवं निरंतरता के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित किया।