प्रकृति एवं मानव का अध्ययन - Study of Nature & Men
प्रकृति एवं मानव का अध्ययन - Study of Nature & Men
कार्ल मार्क्स ने सर्वप्रथम जगत की प्रकृति का अध्ययन किया। इसके अनंतर उसने उसी में उन तत्त्वों का अन्वेषण किया, जिनके द्वारा समाज की रचना होती है। इस प्रकार के विचार 'द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह मार्क्स की महान सफलता मानी जाती है। इस दार्शनिक चिंतन के अनुसार प्रकृति की समस्त वस्तुओं में परिवर्तन निरंतर हुआ करता है। पुरानी वस्तुएँ समाप्त होती हैं, नई उनकी स्थान पूर्ति करती हैं। इस प्रकार समाज का रूप भी निरंतर परिवर्तित हुआ करता है। इस प्रकार के चिंतन को मार्क्स, हीगल की रचनाओं से प्राप्त करता है, तथा मार्क्स यह भी प्रतिपादित करता है कि विश्व का मूलाधार भौतिक पदार्थ ही है। पदार्थ और चेतना दो तथ्य हैं जिनमें पदार्थ पहले विकसित हुआ और बाद में चेतना विकसित हुई। इसके आधार पर वह कहता है कि बाहरी जगत ही वास्तविक और मुख्य है। इस प्रकार मार्क्स का दृष्टिकोण विश्व के प्रति भौतिकवादी है, और इस प्रकार के दृष्टिकोण की प्रणाली द्वंद्वात्मक मानी जाती है। यही मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है।
हैरी एलमर वार्न्स ने लिखा है कि “मार्क्सवाद इतिहास का अध्ययन इस दृष्टिकोण से करता है कि उन प्राकृतिक नियमों का पतालग सके जो सारे मानव के इतिहास का संचालन करते हैं।" मार्क्स इतिहास का गहन अध्ययन करता है जिसके परिणामस्वरूप वह देखता है कि आदिम काल से ही समाज दो वर्गों में विभाजित किया हुआ मिलता है। ये दोनों अपने-अपने सुख-समृद्धि के लिए खींचातानी करते हैं। सामंती समाज में भी कृषकों और सामंतों के वर्ग थे तथा पूँजीवादी युग में पूँजीपति और मजदूरों का वर्ग उत्पन्न हुआ। इन दोनों वर्गों के हित एक-दूसरे के विरूद्ध थे। फलस्वपरूप दोनों वर्गों में सदैव संघर्ष चलता था। इस प्रकार इतिहास का अध्ययन कर स्पष्ट रूप से मार्क्स कहता है कि इतिहास प्रमुख रूप से वर्ग-संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। मार्क्स के अनुसार - “यदि किसी भी प्रकार से समाज से ये वर्ग समाप्त होंगे तभी द्वंद्वात्मक विकास भी खत्म होगा।"
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