थारू जनजाति - Tharu tribe
थारू जनजाति - Tharu tribe
थारू जनजाति मुख्यतः उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश बिहार एवं नेपाल के तराई वाले क्षेत्रों में निवास करती है। इसका संकेंद्रण मुख्यतः उत्तराखंड के कुमाउ जोन में है यह उत्तराखंड की दूसरी बडी जनजाति एवं कुमाउ जोन की सबसे बड़ी जनजाति है। उत्तराखंड के उधमसिंह नगर, खटीमा, किच्छा, नानकमत्ता एवं सितारगंज जिलो में यह जनजाति निवास करती है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुरखीरी एवं बहराईच में इसका निवास स्थान है। इसी प्रकार नेपाल के तराई वाले क्षेत्र में जैसे दरभंगा जिले में थारू जनजाति निवास करती है। प्रजातिय दृष्टिकोण से यह जनजाति मंगोलॉयड प्रजाति के अंर्तगत आती है। थारू अपनी उत्पत्ति कीरात वंश से मानते हैं। इस समुदाय के लोग अपना मूल निवास स्थान थार के मरूस्थल एवं स्वयं को महाराणा प्रताप के वंशज मानते है।
थारू का शाब्दिक अर्थ होता है “ठहराव” अर्थात प्रवास न करने की प्रवृत्ति इस समुदाय के लोगों का मानना है कि जब सोलहवी शताब्दी में अकबर एवं महाराणा प्रताप के बीच हल्दी घाटी का युद्ध हुआ तब उस युद्ध में बड़ी संख्या में महाराणा प्रताप के सैनिक शहीद हुए।
इन सैनिकों की पत्नियाँ अपने कुछ मातहतों के साथ कुमाउ जोन एवं लखीमपुरखीरी में आकर निवास करने लगी। तबसे इन्होने अपना निवास स्थान नहीं बदला है। थारू मातृसत्तात्मक परिवारों का समुदाय है। यह समुदाय 26 गोत्र समूहों में विभक्त हैं इनके प्रमुख गोत्र दानावारीया, नवालपुरिया, मर्चाहे, कुपालया, धाकेट, बतार, धीमार, कुचिला, परधान एवं बोक्सा है।
समाजिक संस्तरण के आधार पर यह समुदाय तीन समूहों में विभक्त है
1. राणा
2. डगोरा / डगुरा
3. कथेरिया / मलबड़िया
थारू जनजाति की अपनी कोई विशिष्ट भाषा नहीं है। ये बोलचाल में गढवाली कुमाउनी, भोजपुरी, अवधी एवं नेपाली भाषा का प्रयोग करते हैं। लिपि के रूप में देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं इस समुदाय के पारंपरिक पहनावे में घोती कुर्ता एवं लहंगा ओढनी प्रमुख है। इस समुदाय के महिला एवं पुरूष दोनो ही गोदना या टैटू का व्यापक प्रयोग करते हैं।
टैटू इनकी वंशावली का भी प्रतीक है, इनके आवास खेतों के निकट बनाए जाते है। ये कच्चे एवं पक्के दोनो प्रकार के होते हैं। 20 से 30 धरों का एक कुनबा प्रायः एक स्थान पर रहता है। इन आवासों के बीच में अनिवार्यतः एक मंदिर होता है। थारू महिलाएं अपने आवास की दीवारों पर चित्रकारी करती है। दीवारों पर चित्रकारी के लिए भी यह समुदाय जाना जाता है। थारू जनजाति का प्रमुख भोजन चावल व मछली है। चावल से एक विशेष प्रकार की मदिरा जाड़ भी है जो इनके भोजन का अभिन्न हिस्सा है। थारू संयुक्त परिवार में विश्वाश रखते हैं प्रायः तीन पीढीयों के सदस्य एक साथ निवास करते हैं। एतेहासिक रूप से थारू आखेटक एवं खाद्य संग्राहक समुदाय है। कृषि एवं पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का आधार है। इस समुदाय में विवाह में वधु मूल्य का प्रचलन है। जो प्रायः नगद के रूप में दिया जाता है। इस समुदाय में विवाह विच्छेद एवं पुनर्विवाह को स्वीकृति प्राप्त है।
बहुपति विवाह खासतौर पर सहोदर बहुपति विवाह भी इनके बीच प्रचलित है, ये लोग जादू टोना में विश्वाश करते है। लेकिन विकास के परिणामस्वरूप इस विश्वाश में कमी आयी हैं थारू जनजाति के लोग हिंदू धर्म के लगभग सभी त्यौहार मनाते है। परंतु इनका प्रमुख त्यौहार वजहर के नाम से जाना जाता है। इस समुदाय में दीपावली को शोक पर्व के रूप में मनाया जाता है। थारू जनजाति मातृसत्तात्मक परिवार एवं घरों में साफ सफाई के लिए जानी जाती है। बिहार एवं झारखण्ड में संथाल, जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी जनजाति है। यहाँ संथाल मोटे तौर पर दो समूहों में विभक्त हैं- प्रथम देशावली संथाल एवं दूसरा खरवार। देसावली संथाल अपने संथाली विचारधारा को मूलरूप से स्वीकार करता है जबकि खरवार सुधारवादी पंथ के समर्थक है।
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