तत्कालीन बौद्धिक पृष्ठभूमि - then intellectual background

तत्कालीन बौद्धिक पृष्ठभूमि - then intellectual background


पैरेटो के काल में हुए (भौतिक तथा सामाजिक प्रकृति), (मानवीय पूर्णता) और (वैज्ञानिकता) की विचारधारा की प्रधानता थी। लापोज तथा अमोन (Lapouge and Ammon) इस बात पर जोर दे रहे थे कि गुण तथा क्षमता समाज में असमान रूप से वितरित हैं। इसी से यह तर्क निकाला गया कि इन गुणों तथा क्षमताओं से युक्त अल्पसंख्यक लोगों को ही शेष समाज पर शासन करना चाहिए। दोनों ही दशाओं में भीम का ( मात्स्य न्याय) तथा डार्विन का (जीवन के लिए संघर्ष) का सिद्धांत शक्तिशाली का कमजोर पर शासन के पक्ष में एक तर्क के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता था। यद्यपि हीगलवाद का योग राष्ट्रवाद के साथ तथा मार्क्सवाद का योग सामाजिक युद्ध के साथ मिलकर स्वतंत्र प्रजातांत्रिक राज्य के लिए हानिकारक थे परंतु फिर भी तत्कालीन वातावरण में इन्होंने भी मानव प्रगति में विश्वास तथा विवेक को ओर दृढ़ विचार प्रदान किए। हीगल के अनुसार निरंतर विवेक को और दृढ़ विचार प्रदान किए। हीगल के के. अनुसार निरंतर विवेक में वृद्धि के कारण मानवता अपने निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। मार्क्स के अनुसार भी मानवता प्रगति के पथ पर है। केवल वर्ग स्वार्थों के द्वंद्ववाय का सिद्धांत इसे हीगल के सिद्धांत से पृथक करता है।


शताब्दी के अंत में प्रगतिवादी कही जाने वाली सभी विचारधाराओं की कटु आलोचना प्रारंभ हुई। स्वतंत्र प्रजातांत्रिक गठबंधन टूटने लगे। स्वतंत्रता के नाम पर धनी तथा सुसंस्कृत लोग राजकीय हस्तक्षेप के विरोधी हो गए। परंतु समाजवादी प्रजातंत्र के नाम पर इसकी माँग करने लगे। अतः समूहवाद का रास्ता अपनाया गया। एक ओर उत्पादनकर्ता को सुरक्षा मिली, दूसरी ओर श्रमिक को कल्याणकारी सेवाएँ प्राप्त हुई।


स्वतंत्र प्रजातांत्रिक राज्य की राजनीतिक संस्थाएँ भी टुट रही थी। संसदीय प्रणाली को पश्चिमी देशों की भौतिक समृद्धि की सूचक के उपकरण के रूप में स्वीकार किया जा रहा था. परंतु रिपब्लिकन फ्रांस तथा राजतंत्र शासित इटली जो स्वतंत्रवाद की विजय के प्रतीक रूप में था, संसदीय व्यवस्था से विरत हो रहा था। फ्रांस का शासन असुरक्षित था। आए दिन वित्तीय उलट-फेर हो रहे थे। राजनीतिक तथा व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रेरित थोड़े से लोगों ने अपनी चतुराई, प्रचलित गरीबी तथा अशिक्षा का लाभ उठाकर देश के एकीकरण तथा सुधार के नाम पर देश के अंदर कृषि को सुरक्षा दी। उन लोगों ने जीवन यापन महँगा बना दिया तथा देश के बाहर मुद्दों में उलझ गए।

इसकी वजह से प्रमुख बुद्धिवादी पूर्णतया विरसित हो गए। यह जब स्वतंत्र प्रजातंत्रीय शासन प्रणाली, प्रचलित उद्विकासीय विचारधारा तथा प्रगति संबंधी सिद्धांतों क्रियान्वयन का ही परिणाम था।


19वीं शताब्दी में विवेक तथा प्रगति के सिद्धांतों पर प्रहार होना प्रारंभ हुआ। यह विरक्ति उन सभी क्षेत्रों में लक्षित हुई जिनमें पहले वैज्ञानिकता तथा विवेक का बोलबाला था। भिन्न-भिन्न प्रकार के तर्क तथा विचार करने के सभी प्रयासों में एक मूलभूत प्रश्न पर समानता थी। इसे बहुत से नाम दिए गए है जैसे- अविवेकवाद (Irrationalism) या विवेकवाद विरोध (Anti- Rationalism) या विवेक के विरुद्ध क्रांति या अवैज्ञानिकवाद (Anti-Positivism) इन सबको व्यक्तिवाद या आत्मावाद (Subjectivism ) का नाम भी दिया जा सकता है। प्रगति के सभी नियमों के बारे में वैषयिकता की वस्तुनिष्ठवाद को अब स्वीकार किया गया है। इन सभी के क्रियान्वयन की क्रिया में व्यक्ति की मनोवैज्ञानिकता प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार के प्रश्नों ने प्रकृति के नियमों की तार्किकता के संबंध में नवीन जिज्ञासाओं को जन्म दिया।


फ्रायड के अनुसार- (अधिकांश प्रकट व्यवहार, हमारे अचेतन मन में दबी हुई इच्छाओं के विभिन्न परिणाम है।) सामाजिक विज्ञानों में फ्रायड का उक्त सिद्धांत बहुत ही व्यावहारिक सिद्ध हुआ है।

इसी प्रकार वर्गसाँ ने प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए (अंतर्ज्ञान) या (अंर्तदृष्टि) पर बल दिया। दुर्खीम ने (सामूहिक प्रतिनिधित्व) अथवा समाज एवं संस्कृति की व्यापकता के प्रसंग में विचारों एवं मूल्यों की उत्पत्ति पर बल दिया है। बेबर ने वर्स्टहीन (Verstehen) अर्थात समझ पर अत्यधिक बल दिया है। विलियम जेम्स का कथन था कि कुछ सत्य नहीं है। व्यक्तिगत उपयोगिता के अनुसार तथ्य सत्य अथवा असत्य होते हैं। पैरेटो फ्रायड, दुर्खीम, वर्गसाँ तथा बेबर से लगभग 15 वर्ष बड़े थे, परंतु इनका झुकाव सामाजिक विज्ञानों की तरफ देर से हुआ। अतः अवस्था में बड़े होने पर भी वे सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में इन सभी को समकालीन अर्थात 1890 में ही गिने जाते हैं।


प्रारंभ से ही पैरेटो के विचार प्रजातंत्र तथा रिपब्लिकनवाद एवं स्वतंत्र व्यापार के पक्ष में गहरे थे। इन्हें इटली के श्रेष्ठ वर्ग से नफरत थी तथा मिरफिन के शब्दों में उसे इटली के गरीबों का खून चूसने वाला समझा जाता था। 1876 में (स्वतंत्र व्यापार अधिकार) सत्ता से गिर गया तथा दक्षिण पंथी पार्टी के सुधारवाद के नाम पर राजकीय हस्तक्षेप की नीति को जन्म मिला। पैरेटो इसके घोर विरोधी थे।

इसी समय से पैरेटो इटली के प्रशासक वर्ग को राजनीतिक सत्ता से आर्थिक लाभ उठाने वाला तथा आर्थिक लाभों को राजनीतिक सत्ता के लिए प्रयोग करने वाला वर्ग मानने लगा, जो ये सारे काम चुनाव तथा सांविधान की आड़ में चला रहे थे। 1889 तथा 1893 के मध्य, उसने लगभग 167 लेख लिखें, उनमें से अधिकांश सरकार विरोधी थे। पुलिस ने उनके कर्मचारी संस्थानों में भाषणों पर प्रतिबंध लगा दिया। जब 1898 में सिलान में दंगे प्रारंभ हुए तो पैरेटो ने उनका दायित्व सरकार की सुरक्षात्मक नीति पर डाला।


सन् 1900 में पैरेटो प्रजातंत्र विरोधी विचारों के हो गए। पैरेटो अत्यंत अहंवादी थे। वे स्वयं बहुत अधिक सामाजिक नहीं थे हस्तक्षेप कैसा भी हो, सहनशीलता से बाहर था। ट्रेड यूनियनों द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग होते देखकर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि धनिक वर्ग के शोषण का स्थान श्रमिक वर्ग की यूनियनों ने अपनी हठवादिता के कारण ले लिया है। अतः दोनों ही बुराइयों से मुख मोड़कर पैरेटो ने इनकी कटु आलोचना की सौभाग्यवश 1898 में पैरेटो को असीम पैतृक संपत्ति मिली जिसके कारण इन्हें संसार व नियमों की मुक्त आलोचना करने में किसी प्रकार की संसारिक कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। इटली में युवकों में मार्क्सवाद के प्रति बढ़ती आस्था ने 1897 में इस विचार को जन्म दिया। कि अधिकांश मानव क्रियाएँ विवेक की नहीं भावनाओं की उत्पत्ति है।