मनोवृत्ति परिवर्तन की सैध्दान्तिक व्याख्या- Theoretical explanation of attitude change

मनोवृत्ति परिवर्तन की सैध्दान्तिक व्याख्या- Theoretical explanation of attitude change


पिछले अनुच्छेदों में मनोवृत्ति-परिवर्तन के सम्प्रत्यय, मनोवृत्ति परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारकों और मनोवृत्ति परिवर्तन का प्रतिरोध करने वाले कारकों की चर्चा की गयी। मनोवृत्ति परिवर्तन क्यों होता है? कैसे होता है? जैसे प्रष्नों के उत्तर इस अनुच्छेद में प्राप्त किये जा रहे हैं। इसकी सैध्दान्तिक व्याख्या कई तरह से अर्थात कई सिद्धान्तों से अपने-अपने ढंग से की गयी है। उन सभी सिद्धान्तों का वर्णन यहाँ कर पाना संभव नहीं है इसलिये, मुख्य सिधान्तों की ही चर्चा यहाँ की जा रही है। मनोवृत्ति परिवर्तन की सैद्धान्तिक व्याख्या में जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ उनमें मुख्य इस प्रकार से हैं। 


संज्ञानात्मक संगति सिद्धान्त: संज्ञानात्मक संगति सिद्धान्त की श्रेणी में कई सिद्धान्तों को रखा गया है। ये सिद्धान्त असंगति को मनोवृत्ति परिवर्तन का कारण मानते हैं। क्योंकि असंगति एक विषेष मानसिक अवस्था उत्पन्न करती है जिसे व्यक्ति बदलना चाहता है। असंगति व्यक्ति को बदलाव के लिये प्रोत्साहित करती है और यह बदलाव मनोवृत्ति परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है। इस श्रेणी के मुख्य सिद्धान्त इस प्रकार है:


(क) हाईडर का संतुलन का सिद्धान्तः यह एक ऐसा प्राचीन सिद्धान्त है जिसे इस श्रेणी के अन्य सिद्धान्तों का उदगम या जनक कहा जा सकता है। इसका प्रतिपादन हाईडर ने 1946 में किया था। 1958 तक इसने पूर्ण रूप से एक स्थापित सिद्धान्त का रूप ले लिया था। हाईडर ने अपने इस सिद्धान्त में तीन


तत्वों के माध्यम से व्याख्या की है। ये तीन तत्व इस प्रकार हैं:


1. व्यक्ति या प्रत्यक्षीकरण करने वाला (च्)


2. दूसरा (अन्य) व्यक्ति (व्)


3. कोई वस्तु अथवा व्यक्ति (ग) 


4. हाईडर ने इनमें दो प्रकार के संबंध बताये हैं, जिसमें एक इकाई संबंध है तथा दूसरा भावात्मक संबंध इकाई संबंध यह बताता है

कि तीनों तत्वों के बीच समानता, स्वामित्व संबंधन या समान सदस्यता किस मात्रा तक है। जबकि भावात्मक संबंध इन तीनों तत्वों के बीच की पसंद या नापसंद को बताता है। या तो पसंद होगी या नापसंद। इन्हें धनात्मक और ऋणात्मक चिन्ह के रूप में दिखाया गया है।


इन तीनों तत्वों अर्थात पी, ओ और एक्स के बीच संबंधों के चिन्ह अर्थात धन और ऋण का गुणा करने पर गुणनफल धनात्मक होता है तो अवस्था संतुलन की होगी और यदि यह गुफ ऋणात्मक प्राप्त होता है तो इसका मतलब है कि इसमें संतुलन नहीं है। इनका गुणनफल बीजगणितीय नियम से होता है जैसे - धन का गुणा ऋण से करने पर गुणनफल हमेषा ऋणात्मक ही होगा। तथा ऋण


तथा ऋण और धन तथा धन का आपस में गुणा करने पर गुणनफल सदैव धनात्मक ही होगा। इस सिद्धान्त के अनुसार संतुलन या संगति की स्थिति सुख प्रदान करती है। इसके विपरीत असंतुलन या असंगति की स्थिति तनाव या अषांति या बेचैनी उत्पन्न करती है। फलस्वरूप् व्यक्ति संतुलन की स्थिति बनाये रखना चाहता है तथा असंतुलन की स्थिति को दूर करना चाहता है। 

भावात्मक संज्ञानात्मक संगति सिद्धन्तः


यह सिद्धान्त भी मनोवृत्ति-परिवर्तन तथा मनोवृत्ति दृढ़ता की व्याख्या करता है। इसका प्रतिपादन रोजेनबर्ग ने 1960 में किया था। जैसा कि पिछली इकाइयों में बताया गया है कि मनोवृत्ति के तीन संघटक होते हैं अर्थात संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा व्यवहारात्मक। यह सिद्धान्त इत तीनों संघटकों को स्वीकार करता है। रोजेनबर्ग का सिद्धान्त केवल दो घटकों अर्थात संज्ञानात्मक एवं भावात्मक संघटक को ही मुख्य मानता है। अर्थात यह सिद्धान्त मनोवृत्ति के केवल भावात्मक और संज्ञानात्मक घटक के संबंधों पर ही बल देता हैं। रोजेनवर्ग का मानना है कि मनोवृत्ति के भावात्मक घटक में यदि परिवर्तन होता है तो उसके संज्ञानात्मक घटक में भी परिवर्तन होगा। इसका कारण यह है कि भावात्मक घटक में परिवर्तन होने पर संज्ञानात्मक घटक के साथ असंगति होती है। ऐसी स्थिति होने पर व्यक्ति में तनाव होने लगता है अर्थात उसकी साम्यावस्था में उतार-चढ़ाव होने लगता है जिससे वह तनाव को दूर करना चाहता है ताकि साम्यावस्था प्राप्त की जा सके। इसके लिये वह संज्ञानात्मक घटक में परिवर्तन लाना चाहता है। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप मनोवृत्ति में भी परिवर्तन हो जाता है।


रोजेनबर्ग के सिद्धान्त में बताये गये गोचर को हम अपने जीवन की घटनाओं में देख सकते हैं।

उदाहरण के लिये जब हमें किसी व्यक्ति से भावात्मक लगाव हो जाता है अर्थात भावात्मक संघटक में परिवर्तन हो जाता है तो हमारी मनोवृत्ति भी उसके प्रति परिवर्तित हो जाती है। रोजनेवर्ग ने एक विषेष प्रविधि को भी अपनाया है, जिसके द्वारा संज्ञानात्मक तत्वों का मापन किया जाता है। इसमें एक संज्ञानात्मक सूचकांक ज्ञात किया जाता है। संज्ञानात्मक सूचकांक से इस बात का पता चलता है कि व्यक्ति की मनोवृत्ति उसके मूल्यों से किस सीमा तक संगत अथवा किस सीमा तक असंगत है। यदि तीव्र धनात्मक भाव है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति में संज्ञानात्मक सूचकांक भी अधिक होगा। इसी प्रकार यदि मनोवृत्ति वस्तु के प्रति व्यक्ति में तीव्र ऋणात्मक भाव है तो संज्ञानात्मक सूचकांक भी कम होगा।


फेस्टिंगर का संज्ञानात्मक असंवादिता सिद्धान्तः


संज्ञानात्मक असंवादिता मनोविज्ञान का एक महत्वपूर्ण सम्प्रत्यय है और संज्ञानात्मक असंवादिता सिद्धान्त मनोवृत्ति परिवर्तन का एक बहुत ही प्रभावी सिद्धान्त है

जिसका प्रतिपादन लियोन फेस्टिंगर ने 1957 में किया था। इसे संज्ञानात्मक विसंवादिता या विसंगति भी कहते हैं। जिसकी अंग्रेजी कोगनीटिव डिसोनेस हैं। यह सिद्धान्त मनोवृत्ति के तीन घटको अर्थात भावात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक में से संज्ञानात्मक घटक पर ही बल देता है। इस सिद्धान्त का आधारभूत तत्व या विष्वास यह है कि मनोवृत्ति के संज्ञानात्मक घटक आपस में संवादी होने चाहिये। अर्थात उन्हें आपस में समान होना चाहिये। जब व्यक्ति के संज्ञान समान नहीं होते हैं अर्थात वे विरोधी होते हैं तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति संज्ञानात्मक-विसंवादिता का अनुभव करता है। संज्ञानात्मक तत्व का तात्पर्य किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना, व्यक्ति के प्रति व्यक्ति का मत या विष्वास से है। इसी प्रकार विसंवादिता से तात्पर्य दो संज्ञानों के बीच विसंगति से है। विसंवादिता का एक उदाहरण: 


संज्ञान 1: परिश्रम सफलता की कुंजी है। 


संज्ञान 2: मैं बहुत आलसी हूँ।


इन दोनों ही संज्ञानों में आपस में विसंवादिता है।

और इनमें संतुलन करने का यही श्रेष्ठ उपाय है कि संज्ञान 2 में परिवर्तन कर लिया जाय अर्थात आलस्य को छोड़कर परिश्रम किया जाय। उपरोक्त उदाहरण संज्ञानात्मक विसंवादिता का अच्छा उदाहरण है और यह स्थिति एक मानसिक तनाव उत्पन्न करती है जिसे दूर करना आवष्यक होता है। संज्ञानात्मक तत्वों के बीच दो प्रकार के संबंध हो सकते हैं


1. संगत संबंध और


2. असंगत संबंध।


असंवादिता को दूर करना, असंवादिता की मात्रा पर निर्भर करता है। असंवादिता की मात्राः 1. यदि संवादी तत्वों की संख्या की तुलना में असवादी तत्वों की संख्या बढ़ती है तो, असंवादिता की मात्रा भी बढ़ती है। अर्थात असंवादी संज्ञानों के बीच भिन्नता ज्यादा होने पर, असंवादिता भी ज्यादा होगी।


2. असंवादी संज्ञानों की संख्या बढ़ने से असंवादिता की मात्रा बढ़ती है।


3. सवादी संज्ञानों की मात्रा अधिक होने पर असंवादिता की मात्रा कम होती है।


4. यह भिन्न-भिन्न संज्ञानात्मक तत्वों से प्रभावित होती है।


जैसा कि पहले बताया गया है कि व्यक्ति असंवादिता को दूर करना चाहता है। मनोवैज्ञानिकों ने इसको दूर करने अर्थात संवादिता लाने के लिये प्रमुख तीन उपायों का सुझाव दिया है।


1. किसी भी एक संज्ञान या संज्ञानात्मक तत्व में यदि परिवर्तन लाया जाये तो दूसरे संज्ञानात्मक


तत्व के संगत बनाया जा सकता है।


2. एक या अधिक संवादी संज्ञानात्मक तत्वों को जोड़कर असंवादिता कि मात्रा को कम किया जा सकता है।


3. संवादी संज्ञानों के महत्व को बढ़ाकर असंवादिता को दूर किया जा सकता है। मनोवृत्ति विकास एवं मनोवृत्ति परिवर्तन की व्याख्या अधिगम के एक अन्य सिद्धान्त या नियम के द्वारा भी होती है। यहनियम क्रिया प्रसूत अनुबंधन का नियम है। इस नियम के अनुसार प्राणी वह अनुक्रियायें करता है जिनसे उसे अच्छा परिणाम मिलता है। यदि परिणाम स्वरूप उसे दण्ड मिलता है तो वह उस अनुक्रिया को नहीं करता है। इस सिद्धान्त या नियम की शुरूआत थार्नडाइक ने की थी जिसको बाद में स्कीनर ने परिमार्जित कर विस्तृत रूप दिया। 


त्रिप्रक्रिया सिद्धान्तः


मनोवृत्ति निर्माण एवं परिवर्तन के त्रि प्रक्रिया सिद्धान्त का प्रतिपादन केलमैन ने 1961 में किया था। जैसा कि इस सिद्धान्त के नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसमें तीन प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण माना गया है जिनके आधार पर मनोवृत्ति-निर्माण एवं मनोवृत्ति-परिवर्तन की व्याख्या की गयी है। ये तीन प्रक्रियायेंइस प्रकार हैं- अनुपालन, आत्मीकरण और आन्तरीकरण


(1) अनुपालन केलमैन के अनुसार जब व्यक्ति किसी समूह या व्यक्ति के भाव या विचार से असहमत होने के बावजूद भी पुरस्कार अथवा लालच या दंड के भय से उसे स्वीकार कर लेता है तो इसे अनुपालन कहा जाता है।" अनुपालन में व्यक्ति का व्यवहार दूसरे व्यक्ति के सामने उसके प्रभाव में होता है लेकिन उसकी अनुपस्थिति में उसका व्यवहार बदल जाता है। अर्थात मनोवृत्ति में परिवर्तन यहाँ अस्थायी होता है।


(2) आत्मीकरणः आत्मीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति किसी के विचारों या व्यवहारों को अपनी स्वयं की इच्छा से स्वीकार लेता है। अर्थात इनको अपने व्यवहार में लाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के ऊपर कोई दबाव नहीं होता है। अर्थात न पुरस्कार पाने की लालसा और न ही दण्ड से बचने का भय। यहाँ व्यक्ति आत्म संतुष्टि के लिये कोई व्यवहार या विचार का अपनाता है। यहाँ व्यक्ति की मनोवृत्ति में मात्रात्मक एवं दिषात्मक परिवर्तन होता है।

जैसे जब कोई व्यक्ति किसी अच्छे पद पर आसीन हो जाता है तो लोगों की मनोवृत्ति उसके प्रति अनुकूल हो जाती है। इसमें अनुपालन की तरह कोई बाह्य दबाव व्यक्ति पर नही होता। लेकिन. मनोवृत्ति में परिवर्तन अस्थायी ही होता है।


(3) आन्तरीकरण: यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति, विचारों, व्यवहारों इत्यादि को अपनी इच्छा से स्वीकार कर लेता है। वह इन्हें इसलिये स्वीकार लेता है क्योंकि यह उसके व्यक्तिगत मूल्य तंत्रों के अनुरूप होते हैं। कैलमैन के अनुसार जब व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मूल्यों के समान दूसरे व्यक्ति या समूह के विचारों, प्रभावों एवं व्यवहारों को स्वीकार लेता है तो इसे आन्तरीकरण की संज्ञा दी जाती है।" आन्तरीकरण द्वारा मनोवृत्ति में हुआ परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होता है। आन्तरीकरण को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है। यदि मां-बाप चाहते हैं कि बच्चों में अच्छे संस्कार के लिये धार्मिक ग्रंथों = जैसे कि भागवत गीता का स्कूल में एक विषय के रूप में अध्ययन कराया जाये और यदि स्कूल प्रषासन या सरकार इसको एक विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल करता है तो उन लोगों की मनोवृत्ति सरकार या स्कूल प्रषासन के लिये सकारात्मक बन जायेगी क्योंकि यहाँ मूल्य-तंत्र के अनुरूप कार्य हो रहा है, इसलिये व्यक्ति इसे गर्व से स्वीकार करता है।