आत्म-प्रत्यक्षीकरण का सैद्धान्तिक पक्ष - the theoretical side of self-actualization
आत्म-प्रत्यक्षीकरण का सैद्धान्तिक पक्ष - the theoretical side of self-actualization
किस प्रकार व्यक्ति अपने स्व का प्रत्यक्षीकरण करता है? किन आधारों पर अपने प्रति कोई धारणा बनाता है? कौन से संकेत स्वयं का मूल्यांकन करने में सहायक होते हैं? क्या व्यक्ति जिस प्रकार की सूचना संकेतों का उपयोग जिस तरह दूसरों के छवि निर्माण में करता है. उन्हीं प्रकार की सूचनाओं का उपयोग उसी रीति से क्या स्वयं के प्रत्यक्षीकरण में भी करता है? इन समस्याओं के समाधान के लिए आत्म प्रत्यक्षीकरण के निम्नलिखित सिद्धांत प्रस्तुत हैं:-
आत्म-आरोपण सिद्धान्त आत्म- प्रत्यक्षीकरण करने के आधार को स्पष्ट करने के लिए डेरिल बेम (1967-1972) ने इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। बेम ने आत्म प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम का वर्णन करते हुए कहा कि व्यक्ति स्वयं की अभिवृत्तियों, संवेगों तथा अन्य आंतरिक दशाओं की जानकारी अपने ही प्रकट व्यवहारओं अथवा व्यवहार के घटित होने वाली परिस्थितियों के प्रेक्षण के आधार पर आंशिक रूप से प्राप्त करता है। इनके इस कथन का तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति अपनी आंतरिक विशेषताओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं कर पाता। वह अपने व्यवहारओं का प्रेक्षण कर अनुमान लगाता है कि उसकी भावनाएं क्या है?
उसके व्यक्तित्व के शीलगुण क्या है और वह किन विचारों से प्रेरित होकर कोई कार्य करता है? बेम के अनुसार आत्म - प्रत्यक्षीकरण के लिए अपने व्यवहारओं के निरीक्षण की आवश्यकता तब होती है, जबकि हम स्वेच्छा से व्यवहार करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जहां हमें किसी व्यवहार को बाध्य होकर करना पड़ता है, वहां हमारे व्यवहार हमारी मनोवृत्तियों या भावों का संकेत नहीं होते है। बेम के सिद्धांत को एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए कि आपके विद्यालय का कोई छात्र अध्ययन में अथक प्रयत्न करता है। नियमित रूप से लाइब्रेरी जाता है। विभिन्न प्रकार की पत्रिकाओं का अध्ययन करता है। उसका हमेशा यही प्रयत्न होता है कि परीक्षा में अधिक से अधिक अंक लाकर प्रथम स्थान को प्राप्त करें। अब प्रश्न यह उठता है कि वह इतना परिश्रम क्यों करता है? इससे उसे अपने स्वयं के बारे में क्या जानकारी प्राप्त होती है? उससे यह प्रश्न करने पर कि वह परिश्रम क्यों करता है, तो उसे याद आता है कि उसके विद्यालय में एक स्थानीय व्यक्ति का अभिनंदन किया गया था। सभी लोगों ने उसकी सराहना भी की थी।
उस के अथक परिश्रम को सभी लोगों के साथ चर्चा भी की गयी थी। वह व्यक्ति भारतीय प्रशासनिक सेवा में उच्च स्थान प्राप्त किए हुए था। वह छात्र भी उस अभिनंदन समारोह में उपस्थित था। तभी उसने यह निश्चय किया कि वह भी ऐसा पद एवं सम्मान अपने परिश्रम के माध्यम से एक ना एक दिन प्राप्त करेगा। इस प्रकार का पद एवं सम्मान उसके लिए प्रलोभन का कार्य करता है। ऐसा परिश्रम करने वाले दूसरे विद्यार्थी के लिए प्रलोभन कुछ और हो सकता है। अपने ही व्यवहारओं को प्रेक्षण करने पर यदि व्यक्ति को किसी बाहरी अभिप्रेरणा का आभास नहीं होता है. तो वह अपने व्यवहार को आंतरिक दशाओं का द्योतक मानता है। इस प्रकार व्यक्ति अपने व्यवहारओं एवं व्यवहार के उद्दीपक संदर्भों का प्रेक्षण कर अपने स्व का प्रत्यक्षीकरण या छवि निर्माण करता है। बेम के सिद्धांत की फेजियो, शेरमन एवं हेर्र (1982) ने अपने अध्ययनों से भी पुष्टि की। एंडरसन एवं अन्य (1986) ने प्रदर्शित किया है कि लोग सोचने एवं अनुभव करने जैसे संज्ञानात्मक एवं संवेगात्मक पक्षों से स्वयं के संबंध में अत्यंत प्रभावित होते हैं। एक अध्ययन में इन लोगों ने दो प्रकार के कथनों का निर्माण किया। एक प्रकार के कथनों में धार्मिक व्यवहारओं से संबंधित तथा दूसरे प्रकार के कथनों में धार्मिकता के बारे में विचारों एवं भावनाओं से संबंधित वाक्य लिए गए। इन दोनों प्रकार के वाक्यों को अस्तिवाचक कथा नास्तिवाचक रूपों में लिया गया। कथन प्रकार धार्मिक व्यवहार धार्मिक विचार एवं भावना अस्तिवाचक मैंने धार्मिक एवं आध्यात्मिक कृत्यों में अपना समय व्यतीत किया है।
मेरे मन में धार्मिक एवं आध्यात्मिक कृत करने के विचार उठते हैं। नास्तिवाचक मैं धार्मिक एवं आध्यात्मिक कृत्यों में अपना समय व्यतीत हीं कर पाता। मेरे मन में धार्मिक एवं आध्यात्मिक कृत करने के विचार नहीं उठते हैं। सामाजिक तुलना सिद्धान्त लियान फेस्टिंगर (1954) ने लोगों की भौतिक एवं सामाजिक यथार्थ के बारे में उनकी आवश्यकता की व्याख्या करने के लिए इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। हम अपनी अनिश्चितता को दूर करने के लिए दूसरों को सूचना स्रोत के रूप में तथा अपनी अभिवृत्तियों एवं योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए दूसरों की अभिवृत्तिओं एवं योग्यताओं को मानदंड के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसी प्रकार की प्रवृत्ति के लिए सामाजिक तुलना सिद्धांत को विकसित किया। इन्होने दो प्रकार के यथार्थों का उल्लेख किया है: भौतिक यथार्थ तथा सामाजिक यथार्थ। उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि लोग इस जगत के भौतिक पक्षों सामाजिक संरचनाओं एवं कार्य-कलापों तथा अपने बारे में अनेक प्रकार के अभिमत विश्वास और भावनाएं रखते हैं। उदाहरण अनेक लोग मानते हैं कि सूर्योदय से पहले उठकर स्वाध्याय करना, सबसे अधिक लाभकारी होता है। क्योंकि उस समय स्मरणशक्ति ताजी रहती है।
प्रातः काल दौड़ने से तथा शारीरिक श्रम करने से स्वास्थ्य श्रेष्ठ होता है। फेस्टिंगर का मत है कि लोग अपने अभिमतों, अभिवृत्तियों एवं विश्वासों को सही मानते हैं। जब कभी भी उनको अपने विश्वासों आदि पर संदेह होता है. तो उस संदेह को दूर करने के लिए प्रयत्न करते हैं। यही प्रयत्न सामाजिक प्रभाव की आधारशिला है। इस सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादन निम्न है:-
1. लोगों में यह जानने की अभिप्रेरणा होती है कि उनका मत एवं विचार सही है या नहीं।
2. ऐसी अभिप्रेरणा उनको यह करने के लिए बाध्य करती है कि वह अपने योग्यताओं का सही मूल्यांकन करें।
3. जब लोगों को अपने विश्वासों, मतों, अभिवृत्तियों एवं योग्यताओं के बारे में मूल्यांकन करने के लिए साधन नहीं प्राप्त होते हैं। तब लोग अभिवृतियों एवं मतों की तुलना दूसरों से करते हैं।
4. लोग अपने मतों की वैधता स्थापित करने के लिए वस्तुनिष्ठ साधनों को अधिक वरीयता देते हैं। फेस्टिंगर ने अपने सिद्धांत में लक्षित व्यक्ति के व्यवहारयों एवं विचारों में परिवर्तन की व्याख्या करने के लिए निम्न दो यथार्थ का उल्लेख किया है
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