सैद्धांतिक पक्ष - theoretical side

सैद्धांतिक पक्ष - theoretical side


 वर्ष 1792 में लंदन से मेरी वोलस्टोनक्राफ्ट (Mary Wollstonecraft) की पहली पुस्तक विंडेकेशन ऑफ द राइट ऑफ वुमेन प्रकाशित हुई। इसने स्त्रियों के बारे में व्याप्त गलत धारणाओं पर क्रांतिकारी हस्तक्षेप किया और स्त्रियों के अधिकारों की पुरजोर हिमायत की गई। लड़के-लड़कियों के लिए स्थापित रूसो के आदर्श शिक्षा के मापदंडों का प्रतिवाद किया गया, जिसके मुताबिक लड़कों में विचारों का स्वातंत्र्य एवं निर्णय की क्षमता विकसित करना आवश्यक था, चूँकि ये गुण नागरिकत्व के लिए आवश्यक थे, जबकि लड़कियों के लिए इस बात की हिमायत की गई थी कि, उन्हें अपने पति एवं पुरुष संरक्षकों को खुश करने की कला आनी चाहिए और साथ ही उन्हें आज्ञाकारिणी, सद्गुणी और सदाचारी भी होना चाहिए। वोलस्टोनक्राफ्ट का यह तर्क था कि. स्त्रियों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने का कोई तार्किक आधार नहीं है और यदि तार्किकता ही राजनीतिक अधिकारों को प्रयोग करने में व्यक्ति की कुशलता का पैमाना है, तो स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन की हिस्सेदारी से वंचित करने का कोई आधार नहीं है। उनका अधिक जोर स्त्रियों के व्यक्तित्व विकास पर रहा। उनका तो यह भी मानना था कि यदि पुरुषों को भी स्त्रियों की भाँति बंद वातावरण में रखा जाए तो वो भी स्त्रियों की तरह कथित व्यवहार करने लगेंगे।


बाद के समय में हैरियट टेलर और जान स्टुअर्ट मिल ने मिलकर उदारवादी स्त्रीवादी विचारधारा को और व्यापकता प्रदान करने का काम किया। इस कड़ी में उन्होंने स्त्री मुद्दों और उससे जुड़ी समस्याओं की एक निबंध श्रंखला प्रकाशित की। 19वीं सदी के मध्य में द सब्जेक्सन ऑफ वुमेन पुस्तक के माध्यम से उन्होंने काम और परिवार की पारंपरिक संरचनाओं को प्रश्नांकित करते हुए कहा कि ऐसी व्यवस्थाएँ स्त्रियों को न केवल निजी दायरे (घर की चार दीवारी) तक सीमित व प्रतिबंधित करती हैं, बल्कि उन्हें चयन के अधिकार से भी वंचित करती हैं। वोलस्टोनक्राफ्ट और मिल दोनों इस बात का समर्थन करते हैं कि स्त्रियाँ मानव जाति का सदस्य होने के नाते तार्किकता में सक्षम होने के साथ ही पुरुषों की भांति समान प्राकृतिक अधिकारों की भी हकदार होती हैं। उनकी अतार्किकता, भावनात्मकता, निर्णय की अक्षमता आदि का स्पष्ट रूप से खंडन करते हुए कहते हैं कि यह कथित भिन्नता वास्तव में उनकी परवरिश, चयन की आजादी का अभाव, अवसरों की अन-उपलब्धता एवं उनके दोषपूर्ण सामाजिकीकरण की उपज मात्र होती है।

मिल का यह विश्वास था कि परिवार के भीतर क़ानूनी असमानता दूर हो जाने से परिवार एक शैक्षणिक संस्था बन जाएगी। इससे यह भी कहा जा सकता है कि शायद वे परिवार को सामाजिक पुनरुत्पादन की इकाई के रूप में देखेते रहे हों। हालांकि सुजेन मोलर ओकिन, मिल के विचारों की तुलना में टेलर के विचारों को अधिक स्त्रीवादी मानते हुए कुछ तर्क देती हैं, जिनमें से कुछ एक-टेलर का मानना था कि स्त्रियों को समान नागरिक तथा राजनीतिक अधिकार हासिल हो जाने के बाद विवाह संबंधी सारे कानूनों को निरस्त कर दिया जाना चाहिए, जबकि मिल महज तलाक संबंधी क़ानूनों में कुछ नरमी चाहते थे। बावजूद, स्त्रियों के लिए समानता और मताधिकार प्रदान किए जाने की पैरवी से जुड़े मिल के विचारों को बड़े पैमाने पर राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।


बुद्धिवाद और तार्किकता में बढ़ते विश्वास के साथ-साथ प्रबोधनकालीन क्रांति, राजशाही और सामंती प्रथा की समाप्ति के दौर में जो खासकर पुरुष वर्ग के लिए ही था ऐसे में उदारवादी स्त्रीवादी विचार अपने आप में काफी रेडिकल (क्रांतिकारी ) था। इन उदारवादी स्त्रीवादी विचारों के फलस्वरूप स्त्रियों के जीवन में सकारात्मक सुधार लाने वाली कई गतिविधियाँ सामने आने लगीं। स्त्रियों के लिए स्कूलों की स्थापना, महिला ट्रेड यूनियन, स्त्री अधिकारों से जुड़े संगठनों की स्थापना जैसे बहुत सारे सुधारवादी पहल इसी कड़ी का हिस्सा थे। स्त्रियों की सदियों से चली आ रही ऐसी स्थिति में स्थायी सुधार लाने हेतु उदारवादी स्त्रीवादी विचारधारा की कुछ बुनियादी संकल्पनाएं बेहद महत्वपूर्ण थीं।