धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत - theories of the origin of religion

 धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत - theories of the origin of religion


आत्मावाद या जिववाद का सिद्धांत- टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमितिव कल्चर में आत्मावाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसे उन्होंने दो भागों में बांटा है -


आत्मा का सिद्धांत -जीववाद का संबंध मनुष्य के जीव से है जो की मृत्यु के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है।


प्रेतों का सिद्धांत- दूसरा सिद्धांत जिसे आपने प्रेतों का सिद्धांत कहा यह वह आत्माएं है जो मनुष्य की आत्मा से पृथक दैवीय आत्माएं हैं।


टायलर का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य की आत्मा दो प्रकार की होती है स्वतंत्र आत्मा और शरीर आत्मा। स्वतंत्र आत्मा शरीर के बाहर, अंदर आ जा सकती है परंतु शरीर आत्मा एक बार शरीर छोड़ने के बाद वापस नहीं आ सकती और प्रेत बन जाती है। यह आत्मा अमर होती है क्योंकि यदि ऐसा ना होता तो मरे हुए व्यक्ति सपने में दिखाई नहीं देते। अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने टोडा जनजाति में होने वाली दो प्रकार की अंत्येष्टि संस्कार का वर्णन किया -


हरी अंत्येष्ठी- जो मृत्यु के तुरंत बाद की जाती है।


सुखी अंत्येष्टि- जो मृत्यु के कुछ समय बाद की जाती है। इसका उद्देश्य संभवतः आत्मा का कुछ समय तक लौट आने का इंतजार किया जाना है।


टेलर के अनुसार अमूर्त एवं अभौतिक प्रेत आत्माओं के प्रति भय निश्चित आदिम धर्म का मूल है। इस प्रकार पूर्वज पूजा ही पूजा और आराधना का प्रारंभिक रूप तथा समाधि या कब्र कई आरंभिक मंदिर हुआ करते थे।


जीवित सत्तावाद या मानाववाद का सिद्धांत इस सिद्धांत की मान्यता है कि प्रत्येक वस्तु में चाहे वह जड़ हो या चेतन हो एक जीवित अलौकिक सत्ता होती है। इस सत्ता में विश्वास और इसकी पूजा आराधना से ही धर्म की उत्पत्ति हुई। इस सिद्धांत को सर्वप्रथम मैक्स मूलर ने प्रस्तुत किया एवं इसी से मिलती-जुलती अन्य अवधारणा मानाववाद का उल्लेख किया।

इसमें मलेनेशिया की जनजातियों में यह विश्वास किया जाता है कि किसी भी कार्य की सफलता या असफलता माना पर निर्भर है। माना एक अलौकिक शक्ति है।


भारतीय जनजातियों में इसी से मिलती-जुलती अवधारणा को मजूमदार ने सिंहभूमि की 'हो' जनजाति में बोंगावाद में दी। उत्तरी अमेरिका की जनजातियों में और ओरेंडा की अवधारणा मानावाद से मिलती जुलती है।


मेरिट के अनुसार माना एक अव्यक्तिक, अशरीरी और अलौकिक शक्ति है जो अच्छे और बुरे दोनों रूपों में मनुष्य को प्रभावित करती है। मनुष्य इस शक्ति के समक्ष नतमस्तक हुआ और इसकी पूजा एवं आराधना से ही धर्म की उत्पत्ति हुई।


प्रकृतिवाद का सिद्धांत- मैक्स मूलर ने धर्म की उत्पत्ति के लिए प्रकृति पूजा को उत्तरदाई माना। आपके अनुसार मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों के सामने नतमस्तक हुआ। उसने प्रकृति की शक्ति को स्वीकार किया और यहीं से प्रकृति की पूजा शुरू हुई जो धर्म की उत्पत्ति का आधार बनी। यह निष्कर्ष भारत तथा यूरोपीय पौराणिक कथाओं पर आधारित था।


फ्रेजर के धर्म की उत्पत्ति का सिद्धांत- स्कॉटलैंड निवासी फ्रेजर, टेलर से प्रभावित थे और उन्होंने अपनी पुस्तक द गोल्डन बो में लिखा कि जादू टोना की शक्तियों से सुपरनैचुरल पावर्स को नियंत्रित करने का प्रयास किया और जब वह अपने प्रयास में असफल हुआ तो इन सब के आगे मानव ने अपने आप को समर्पित कर दिया। असफल जादू टोना ने मनुष्य को धर्म की ओर अग्रसर किया।


धर्म का सामाजिक सिद्धांत- यह सिद्धांत इमाइल दुर्खीम में अपनी पुस्तक द एलीमेंट्री फॉर्म्स ऑफ रिलीजियस लाइफ 1912 में प्रस्तुत किया। आप के अनुसार धर्म सामाजिक चेतना का प्रतीक है। धर्म का वास्तविक आधार स्वयं समाज है। दुर्खीम कहते हैं स्वर्ग का साम्राज्य एक महिमा मंडित समाज है"। दुर्खीम अपने गुरु फ्स्टेल डी कोलेजस की पुस्तक द एंसियंट सिटी से प्रभावित थे। जिसमें यह लिखा था कि रोमन धर्मों का जन्म सामाजिक संगठनों के विकास के साथ हुआ। दुर्खीम का अध्ययन अरुन्टा ऑस्ट्रेलिया की जनजाति पर आधारित था।

दुर्खीम ने पवित्र और अपवित्र को समझाने के लिए तो टोटमवाद का सहारा लिया। दुर्खीम के अनुसार धर्म एक सामाजिक तथ्य है और उसकी उत्पत्ति में समाज का भी योगदान है। दुर्खीम ने विश्वास तथा टोटम को धर्म के आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार किया है तथा टोटम को धर्म का प्रारंभिक स्तर माना। इस प्रकार दुर्खीम ने टोटम को ही धर्म की उत्पत्ति का आधार माना तथा सामूहिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक माना।


प्रकार्यवादी सिद्धांत - मानवशास्त्री मलिनोव्सकी एवं रेडक्लिफ ब्राउन ने धर्म की प्रकार्यवादी व्याख्या प्रस्तुत की। मलिनोव्सकी के अनुसार मनुष्य ने संस्कृति को जन्म दिया, संस्कृति का कोई तत्व बेकार नहीं है। व्यक्ति तथा समाज की किसी ना किसी आवश्यकता की पूर्ति अवश्य करता है। धर्म भी संस्कृति का एक अंग है और उसका अस्तित्व भी इसी कारण समाज में होता है। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार धर्म का प्रकार मानव मस्तिष्क को भय एवं संवेगो से मुक्ति दिलाना नहीं है। जैसा मलिनोव्सकी ने कहा बल्कि धर्म का प्रमुख प्रकार मनुष्य की समाज पर आश्रितता को प्रकट करना है तथा सामूहिक जीवन के अस्तित्व को बनाए रखना है। मलिनोव्सकी व्यक्ति के महत्व पर बल देते हैं जबकि रेडक्लिफ ब्राउन समाज के। हालाँकि समाज के लिए व्यक्ति उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्यक्ति के लिए समाज । संक्षेप में मलिनोव्सकी ने धर्म के प्रकार्य को व्यक्ति के स्तर पर दर्शाया जबकि रेडक्लिफ ब्राउन ने समाज के स्तर पर लेवी स्ट्रास के अनुसार धर्म की अभिव्यक्ति प्रतीकात्मक तथा पौराणिक विचारों द्वारा होती है।