शिक्षण-अधिगम के औद्योगिकृत रूप में मानवीय तत्व का सिद्धान्त - Theory of the human element in the industrialized form of teaching-learning

शिक्षण-अधिगम के औद्योगिकृत रूप में मानवीय तत्व का सिद्धान्त - Theory of the human element in the industrialized form of teaching-learning


डेविड स्वार्ट ने 1973 ई. में ब्रिटेन के मुक्त विश्वविद्यालय में दूर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करना प्रारम्भ किया। वह मुख्य रूप से इस विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय केन्द्रों एवं अध्ययन केन्द्रो पर प्रदान की जाने वाली ट्यूटोरियल सेवाओं से जुड़ा था। इस कार्य से उसने अनुभव किया कि दूर शिक्षा में ट्यूटोरियल सेवाओं का बहुत अधिक महत्व है। उसमें इन सेवाओं को महत्व प्रदान करते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि दूर शिक्षण का सबसे कठिन भाग (समस्या) “दूरस्थ छात्र के अधिगम के लिए समबन्ध की निरंतरता" है। “समाबंध की निरंतरटा दूरवर्ती शिक्षा के औद्योगिकृत रूप में मानवीय तत्वों का समावेश पर बल देती है। इस प्रकार के विश्वास की प्रबलता की अभिव्यक्ति स्वार्ट के प्रयोजनवादी विचारों में मिलती है जिसको निम्न उपशीर्षक से समझ सकते हैं -


I. मानवीय सहायता की नितांत आवश्यकता


II. प्रमुख मुद्दे एवं समझौते


दूर शिक्षा सिद्धांतों का वर्गीकरण ऊपर छह सिद्धांतों के बारे में बताया गया है। उनमे दूर शिक्षा की प्रमुख विचारधाराओं का पता चलता है। इन विचारधाराओं को व्यापक रूप से दो वर्गों में रखा जा सकता है


प्रथम वर्ग- इस वर्ग में ऐसे विचारक आते हैं जो शिक्षण अधिगम की सामाग्री के उत्पादन को सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हैं। पीटर्स इस वर्ग से समबन्धित प्रमुख विचारक है।


द्वितीय वर्ग इस वर्ग में वे विचारक आते हैं जो शिक्षार्थी से संबन्धित पक्षों पर अधिक बल प्रदान करते हैं। शिक्षार्थी से सम्बन्धित पक्षों पर आधारित सिद्धांतों को उनकी कुछ विशेषताओं के आधार पर दो उप वर्गों में विभक्त किया जा सकता है


1. पहले वर्ग में वे विचारक एवं उनके सिद्धान्त आते हैं जो शिक्षार्थी की अभिप्रेरणा तथा शिक्षार्थी द्वारा निश्चित किए गए अधिगम उद्देश्यों को महत्व प्रदान करते हैं। वेदेमियर एवं मूरे इसी उपवर्ग में आते हैं।


II. दूसरे वर्ग के विचारकों द्वारा शिक्षण अधिगम कार्यक्रमों के शैक्षणिक पक्षों (शिक्षण विधियाँ एवं प्रविधियाँ) को महत्व दिया जाता है अर्थात इस विचारधारा के अंतर्गत इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि शिक्षार्थियों की उपलब्धियों की दृष्टि से किसी शैक्षिक कार्यक्रमों को किस प्रकार प्रभावशाली बनाया जा सकता है। होमबर्ग, बाथ एवं स्वार्ट इसी उप वर्ग में आते हैं।


यहाँ पर विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यूरोपीय विचारक (होमवर्ग, बाथ एवं स्वार्ट) दूर शिक्षा के शैक्षणिक पक्ष पर बल देते हैं जबकि अमेरिकन विचारक ( वेडेनियर एवं मूरे ) अभिप्रेरणात्मक पक्ष पर बल देते हैं। अतः विचारधाराओं के प्रतिपादन में सामाजिक सांस्कृतिक अंतर पर प्रभाव प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ता है। अतः भारतीय संदर्भ में हमें इन सिद्धांतों को अपनी उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त करना होगा।