उतार-चढ़ाव का सिद्धान्त - theory of ups and downs

उतार-चढ़ाव का सिद्धान्त - theory of ups and downs


चक्रीय सिद्धान्त से मिलता-जुलता सोरोकिन का सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता का सिद्धान्त (Theory of Socio-cultural Dynamics) या उतार-चढ़ाव का सिद्धान्त है। कतिपय विद्वानों ने इसे चक्रीय सिद्धान्त की श्रेणी में ही रखा है। हैस स्पीयर के शब्दों में, सोरोकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट पता चलता है कि कोई प्रगति नहीं हुई है, न कोई चक्रीय परिवर्तन हुआ है। सोरोकिन के अनुसार जो कुछ भी है वह केवल मात्र उतार-चढ़ाव (Fluctuation) है| संस्कृति के बुनियादी स्वरूपों का उतार-चढ़ाव, सामाजिक संबंधों का उतार-चढ़ाव, शक्ति के केन्द्रीकरण का उतार-चढ़ाव यहाँ तक कि आर्थिक अवस्थाओं में सर्वत्र ही उतार-चढ़ाव है।" इसी उतार-चढ़ाव में समस्त सामाजिक घटनाओं और परिवर्तनों का रहस्य छिपा हुआ है। सोरोकिन के अनुसार सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के उतार-चढ़ाव में व्यक्त होता है। उतार-चढ़ाव की धारणा सोरोकिन के सिद्धान्त का प्रथम आधार है। यह उतार-चढ़ाव दो सांस्कृतिक व्यवस्थाओं चेतनात्मक संस्कृति तथा भावनात्मक संस्कृति के बीच होता है।

दूसरे शब्दों में, जब समाज चेतनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था से भावनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था में या भावनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था से चेतनात्मक सांस्कृतिक व्यवस्था में बदलता है, तभी सामाजिक परिवर्तन होता है। अर्थात् तभी विज्ञान, दर्शन, धर्म, कानून, नैतिकता, आर्थिक व्यवस्था, राजनीति, कला, साहित्य, सामाजिक संबंध सब-कुछ बदल जाता है। इस प्रकार सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का दूसरा आधार चेतनात्मक संस्कृति और भावनात्मक संस्कृति के बीच भेद है।


सोरोकिन के अनुसार जब एक सांस्कृतिक व्यवस्था, उदाहरणार्थ चेतनात्मक संस्कृति व्यवस्था अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है तो उसे अपनी गति को विपरीत दिशा, अर्थात् भावनात्मक संस्कृति व्यवस्था की ओर मोड़ना ही पड़ता है। अर्थात् पहले की व्यवस्था के स्थान पर दूसरी व्यवस्था का जन्म होता है क्योंकि प्रत्येक व्यवस्था की चाहे वह कितनी ही अच्छी हो या बुरी पनपने. आगे बढ़ने अथवा विकसित होने की एक सीमा है।

यही सोरोकिन का 'सीमाओं का सिद्धान्त' है जो कि सामाजिक परिवर्तन का तीसरा आधार है। इन सीमाओं के सिद्धान्त को बीरस्टीड द्वारा प्रस्तुत एक उदाहरण की सहायता से अति सरलता से समझा जा सकता है। यदि आप प्यानों की एक कुंजी को उँगली मारेंगे तो उससे कुछ ध्वनि उत्पन्न होगी। यदि आप जरा जोर से उँगली मारेंगे तो अवश्य ही ध्वनि भी अधिक जोर की होगी। परन्तु इस प्रकार जोर से उँगली मारने और अधिक जोर से ध्वनि निकालने की एक सीमा है। एक सीमा से अधिक जोर से यदि आप प्यानों पर आघात करेंगे तो अधिक जोर से ध्वनि निकलने की अपेक्षा स्वयं प्यानों ही टूट जाएगा। यही बात सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर भी लागू होती है। एक सांस्कृतिक व्यवस्था एक सीमा तक पहुँच जाने के बाद फिर आगे नहीं बढ़ सकती और तब तक विपरीत प्रभाव उत्पन्न हो जाता है और टूटे हुए प्यानों की भाँति उस व्यवस्था के स्थान पर एक नवीन सांस्कृतिक व्यवस्था स्वतः उदय होती है। सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन का यह है कि सांस्कृतिक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन होता तो अवश्य है. परन्तु होता है अनियमित रूप में।

दूसरे शब्दों में, सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के उतार-चढ़ाव को किन्हीं निश्चित बन्धनों में बाँधा नहीं जा सकता है। यद्यपि यह सच है कि संस्कृति एक गतिशील व्यवस्था है फिर भी हम यह आशा नहीं कर सकते कि एक सांस्कृतिक व्यवस्था किसी एक निश्चित दिशा की ओर स्थायी रूप में गतिशील रहेगी। अब प्रश्न यह उठता है कि चेतनात्मक अवस्था से भावनात्मक अवस्था में या भावनात्मक अवस्था से चेतनात्मक अवस्था में जो परिवर्तन होता है उस परिवर्तन को लाने वाली कौन-सी शक्ति हैं? सोरोकिन ने इस प्रश्न का उत्तर स्वाभाविक परिवर्तन का सिद्धान्त' (Principle of Immanent Change) के आधारपर दिया है और यही आपके सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का आधार है। स्वाभाविक परिवर्तन का सिद्धान्त' है कि परिवर्तन होने का कारण या परिवर्तन लाने वाली शक्ति स्वयं संस्कृति की अपनी प्रकृति में ही अन्तर्निहित है। परिवर्तन लाने वाली कोई बाहरी शक्ति नहीं बल्कि संस्कृति की प्रकृति में ही क्रियाशील आन्तरिक शक्ति या शक्तियाँ हैं। संक्षेप में, सोरोकिन के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जोकि संस्कृति के अन्दर ही क्रियाशील कुछ शक्तियों का परिणाम होती है। सामाजिक परिवर्तन एक कृत्रिम प्रक्रिया है या किसी बाह्य शक्ति द्वारा प्रेरित होती है ऐसा सोचना गलत है। चेतनात्मक अवस्था से भावनात्मक अवस्था का या भावनात्मक अवस्था से चेतनात्मक अवस्था का परिवर्तन एक स्वाभाविक तथा आन्तरिक प्रक्रिया है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसा होना ही स्वाभाविक है। उदाहरणार्थ, गुलाब का एक बीज केवल गुलाब के ही पौधे में, न कि अन्य प्रकार के पौधे में, इसलिए विकसित होता है क्योंकि यही स्वाभाविक है या वह उस बीज के स्वभाव में अन्तर्निहित है।