जनजातीय विकास नीतियाँ एवं कार्यक्रम - Tribal Development Policies and Programs

जनजातीय विकास नीतियाँ एवं कार्यक्रम - Tribal Development Policies and Programs

शासन के स्तर पर संविधान में उल्लिखित विविध प्रावधानों की पूर्ति हेतु विभिन्न समितियों/आयोगों/अध्ययन दलों का गठन किया गया प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) में आधारभूत रूप से यह बात कही गई कि सामान्य विकास कार्यक्रमों की रचना पिछड़े वर्गों के घनीभूत विकास की पृष्ठभूमि में तैयार किया जाने चाहिए। 


द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) में यह वादा किया गया कि कमजोर वर्गों को आर्थिक विकास का लाभ अधिक से अधिक मिले जिससे समाज की विषमता को कम किया जा सके।


तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) में इस बात की वकालत की गई कि अवसर की समानता स्थापित की जाए तथा आर्थिक शक्तियों का इस तरह से वितरण हो, जिससे आय एवं पूँजी की असमानता को कम किया जा सके।


चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74) ने यह उद्देश्य निर्धारित किया कि ऐसे त्वरित उपाय किए जाए, जिससे लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठ सके तथा ऐसे उपाय किए जाए जिससे समानता एवं सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित किया जा सकें।

जनजातीय विकास नीतियाँ एवं कार्यक्रम - Tribal Development Policies and Programs

पाँचवी पंचवर्षीय योजना (1974-78) आदिम जाति विकास की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रही। इसमें आदिवासी उप-योजना का सूत्रपात हुआ, जो आदिम जातियों को विकास के लाभ सीधे पहुचाने की दृष्टि से बनाई गई।


छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85) ने वित्त के अधिकतम हस्तांतरण की बात कही, जिससे कम से कम 50 प्रतिशत आदिवासी परिवारों को सहायता प्रदान कर गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। 


सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) में आदिवासी विकास हेतु आवंटित किए जाने वाले वित्त में नियामक वृद्धि की गई। इसमें अधो-संरचनात्मक विकास एवं क्षेत्र विस्तार पर जोर दिया था।


आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) में आदिवासी विकास एवं सामान्य जन विकास के स्तर के मध्य की दूरी के बीच सेतु बनाने का प्रयास किया गया, शताब्दी की समाप्ति तक ये पिछड़े वर्ग समाज की मुख्य धारा के स्तर को प्राप्त कर सके।


नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में इस बात पर बल दिया गया कि आदिवासी लोगों का विकास सशक्तीकरण के माध्यम से होना चाहिए, जिसमें उन्हें अपने अधिकारों के प्रयोग हेतु उचित वातावरण मिले एवं समाज के अन्य लोगों की तरह वे अपने आत्म सम्मान एवं प्रतिष्ठा का उपयोग कर सकें। 


दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007) में यह कहा गया कि आदिवासी समाज न केवल गरीब, साधन हीन एवं अशिक्षित है, वरन् सामान्य समाज के मुकाबले उनकी अक्षमता इस बात में भी उजागर होती है कि यह अपनी बात को पूर्ण क्षमता से रखने एवं एकीकरण की प्रक्रिया से सामंजस्य बनाने में भी असमर्थ पाते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में भू-अलगाव, कर्ज आदिवासियों के वन अधिकार, वन ग्रामों का विकास, पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार अधिनियम 1996 के परिपालन में उपर्युक्त विधि एवं कानूनों का निर्माण, अप्राकृतिक विस्थापन एवं अपर्याप्त पुनर्स्थापन, आदिम जनजातीय समूहों का संरक्षण एवं विकास, आदिवासी उपयोजना का प्रभावी एवं उद्देश्यपूर्ण क्रियान्वयन ऐसे मुद्दे हैं।


देशों में बहुतों के लिए "विकास" एक दुःस्वप्न सा हो गया है क्योंकि वह ऐसे तरीके से हो रहा है कि तथाकथित “लक्ष्य-समुदाय” अथवा जिनके हित के लिए विकास कार्य किए जाते हैं, वही प्रगति और विकास का शिकार हो जाता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि इतिहास में सदैव मानवीय आबादी की पुनः व्यवस्था विकास की साथी रही है, हालांकि उसकी प्रक्रिया को न्याय संगत, मानवीय और जहां तक सम्भव हो स्वयंसेवी होना चाहिए।

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विकास के कार्य में भूमि और पानी के इस्तेमाल के प्रकार में परिवर्तन करने की जरूरत पड़ती है और इन परिवर्तनों के कारण अक्सर बस्तियों को विस्थापित करना भी जरूरी हो जाता है। लेकिन जैसा कि माइकेल करनिया का कथन है आबादी की इच्छा के विना उसे उसके स्थान से विस्थापित करने का काम नहीं करना चाहिए या जहां तक हो सके उसे टालना चाहिए यदि परिस्थिति ऐसी हो कि विस्थापित करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प सामने न हो तो विस्थापित करने के कार्य को इस तरीके से करना चाहिए जिससे विस्थापित होने वालों की जीविका के साधन का पूरा संरक्षण प्राप्त हो सके।


आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं में कार्यान्वयन से प्रति वर्ष लाखो व्यक्ति विस्थापित हुए हैं। विषेश रूप से प्रशासकीय भूमि अधिग्रहण के परिणामस्वरूप इन योजनाओं से भिन्न परियोजनाओं, भूमि के इस्तेमाल में परिवर्तनों, शहरों के विकास में विस्तार के कारण जो भूमि अधिग्रहण हुआ है वह इसमें शामिल नहीं है। इन सबके अलावा परिवेश संबंधी गिरावट और जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्य के जीवनयापन में जो विशगंतियां आई हैं, वह अलग है। विस्थापन और बस्तियां के विनाश का सबसे बड़ा कारण जल, विद्युत, और सिंचाई योजनाय है। अन्य कारण हैं खदानें, उश्मा और आणविक शक्ति के बड़े-बड़े कारखाने, औद्योगिक बस्तियां, सैनिक संस्थानों की संस्थापना, अस्त्र-शस्त्र परिक्षण के मैदान, नए रेलपथ तथा नई सड़के, आरक्षित वनों का विस्तार, वन्य पशुओं के शरण स्थल एवं पार्क तथा मानवहितार्थ तकनीकी हस्क्षेप जिससे बड़े पैमाने पर मछुआरों, दस्तकारों और हथकरघा बुनकरों को अपने स्थान बदलने पड़े हैं। हस्तकारों व कारीगरों के समुदायों पर भी इस बदलाव का बुरा प्रभाव पड़ा है।

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जीवन का अधिकार


इस मानवीय अधिकारों में सबसे पवित्र और अहम है जीने का अधिकार। परंतु जीने के अधिकार का मतलब सिर्फ प्राणी के रूप में जीते रहने का ही नहीं है वरन मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जिन्दगी बसर करने का है और प्रतिष्ठित जिन्दगी के लिए जरूरी है इन्सान की निजी आजादी और जीविका के उपयुक्त साधन। इन दोनों ही तत्वों का व्यवहार रूप आर्थिक और सामाजिक स्थिति के अनुसार बिल्कुल अलग-अलग हो जाता है। आधुनिक क्षेत्र में इनका जाना माना औपचारिक रूप है जिन्हें बुनयादी अधिकारों की संज्ञा दी गई है। परंतु परंपरागत व्यवस्था के दूसरे सिरे पर आदिवासी समाज के लिए आज भी हालत में ये औपचारिक व्यवस्थाएं बेमानी है। उनकी स्थिति में उनकी अपनी समझ और परंपरा के मुताबिक स्वशासी व्यवस्था इन अधिकारों को व्यवहार रूप देने के लिए अनिवार्य है।


सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव


आदमी की इज्जत और प्रतिष्ठा बनती है उसके काम से, उसके काम की मान्यता से, उत्पादन के साधनों पर अधिकार से और अपनी व्यवस्था खुद चलाने के अधिकार से। इन सभी मामलों में अनुसूचित जातियों की हालत पहले से ही बहुत खराब थी। मेहनत उनके हिस्से में आई थी और संसाधन दूसरों के परंतु आजादी के बाद की स्थिति में व्यवस्था और ताकतवर लोगों के गठजोड़ के सामने वे लोग और भी ज्यादा मजबूत हो गए हैं। एक तो उनके पास बचे-खुचे उत्पादन के साधन उनके हाथ से निकलते जा रहे हैं। दूसरे आज गांवों में लगभग अराजकता की हालत है।


उत्पादन के साधनों का अधिकार

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अधिकतर आदिवासी और अनुसूचित जातियों के सदस्य किसी न किसी रूप में वनों एवं कृषि पर निर्भर हैं। परंतु जमीन पर अधिकार के मामले में हालत अभी बहुत दूर तक चिंताजनक है। इस मामले में सबसे ज्यादा गड़बड़ी आदिवासी इलाकों में हुई है, हो रही है। पहले तो कई इलाकों में अभी तक कोई कागजात ही नहीं है, इसलिए गांव में किसकी जमीन कहां पर है, यह कागज पर नहीं है। दूसरे कानून के ऐसे बहुत से दांव पेंच हैं जो लोगों की समझ के बाहर है। आज के कानून में जिस जमीन पर किसी का नाम दर्ज नहीं है वह सरकारी मान ली जाती है। इसलिए सरकार जो चाहे कर सकती है। उधर कागज पर नाम चढ़वाने से ही जमीन पर मिल्कियत हो जाती है। इस बात का बाहरी लोगों ने बुरी तरह से फायदा उठाया। आज, कागज ही लोगों ने के खिलाफ नहीं है, पूरी व्यवस्था ही उनके खिलाफ है। जमीन की जोत और मिल्कियत की जानकारी तो गांव में ही मिल सकती है, परंतु जमीन के झगड़ों का फैसला अदालत में होता है। वहीं उस नासमझ को इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद नहीं रहती। वह कुछ कर भी तो नहीं सकता इसलिए लाचार है।


बंधुआ मजदूरी


जिंदगी के अधिकार की सबसे बड़ी अवमानना तो बंधुआ मजदूरों के मामले में ही है। सरकारी आँकड़ों और व्यापक योजनाओं के बावजूद कई इलाकों में स्थिति बड़ी सोचनीय है। तमिलनाडु में कॉफी बागान मालिकों के लिए सोने की खानें हैं, परंतु उन्हें खून पसीने से सींचने वाला आदिवासी उनमें “कैद” हैं। डाल्टेनगंज और चंपारन में बड़े-बड़े फर्मों में पांच कट्ठा जमीन से बांध दिए जाते हैं मजदूरों के हाथ-पैर।

 

संसाधनों पर अधिकार


खेती की जमीन के अलावा परंपरागत व्यवस्था में प्रमुख संसाधन वन, चरागाह (पड़ती भूमि) और पानी है। जिन पर आम लोग अपनी जिंदगी के लिए निर्भर हैं। सभी तरह के संसाधनों पर गलत हकदारी अंग्रेजों के जमाने में ही शुरू हुई थी। उसी जमाने में समाज और व्यक्ति का उन संसाधनों से मां-बेटे का रिश्ता खत्म कर दिया गया और राज्य का उन पर एकाधिकार हो गया।


लघु वनोपज

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लोगों की भागीदारी के संबंध में लघु वनोपज का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अगर हम भारतीय वन अधिनियम की औपचारिक व्यवस्था के अनुसार भी देखे तो लघु वनोपज पर सरकारी अधिकार गैर कानूनी है, उस पर रॉयल्टी लगाना अनैतिक है। वनोपज के मामले में पिछले साल मध्य प्रदेश और बिहार में भी आदिवासीयों को मजदूर की जगह मालिक" का दर्जा देने की घोषणा से उनके प्रांत में घोर आईतिहासिक अन्याय को समाप्त करने का पहला महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया था।


वन्य प्राणी


वन्य प्राणीयों के प्रबंधन के मामले में भी ये तथ्य की आदिवासी और वन्य प्राणीयों का सदा से सहअस्तित्व रहा है। धनुष और बाण से वन्य प्राणीयों का विनाष नहीं हो सकता है, उनके संहार का असली अपराधी बाहर का आदमी है। इस बात को नजर अंदाज करने से बड़ी विसंगत स्थिति पैदा हो गई है। 


स्थायी समाधान की अनिवार्यता


दुर्भाग्य से वनों के प्रबंध में लोगों से सहभागिता की बजाय पूरी-पूरी औपचारिकता निभाई जा रही है। नई वन नीति में सहभागिता का जिक्र जरूर है, परंतु उसके अमल के लिए बाजारू और औपचारिक संबंधों को ही आधार माना गया है, इस कारण उस निर्णय का व्यवहार में कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। इस हालात में सरकार और लोगों के बीच तनाव बढ़ गया है, बढ़ता जा रहा है। मध्य क्षेत्र में लगभग सब दूर सरकार और लोगों के बीच टकराव की स्थिति है, और कई इलाके वन विभाग की अधिकार-सीमा के बाहर हो गए हैं।


पड़ती भूमि और बिगड़े वन


संसाधनों पर अधिकार के संदर्भ में पड़ती भूमि और बिगड़े वनों की ओर खास तौर से ध्यान देना जरूरी है। अभी तक ये संसाधन या तो अनुपजाऊ थे या दूर-दराज के इलाकों में थे। इसलिए अगर गरीब उनसे जुड़ा हुआ था, अपनी जिंदगी वसर कर रहा था तो किसी को कोई एतराज नही था, परंतु अब उनसे भारी मुनाफे की संभावना से सभी की आखें उन पर लग गई है। ये संसाधन गरीबों के लिए जिंदगी गुजारने का सहारा है।


पानी

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पानी के संसाधन के रूप में उपयोग में भी पूंजी का निवेष और केंन्द्रकीकरण से लोगों की जिंदगी के अधिकार की अनदेखी हो रही है। साधारण आदमी, जो अब तक अपनी मेहनत और अपनी तकनीक का उपयोग करके, पानी का उपयोग कर लेता था, वह उसकी पहुंच के बाहर हो गया है। पानी पर पूंजी और तकनीक के सहारे एकाधिकार करके ताकतवर लोग उसका निजी फायदे के लिए मनमाना उपयोग कर रहे हैं।