जनजातीय समस्याएँ एवं योजनाएँ - Tribal Problems and Schemes
जनजातीय समस्याएँ एवं योजनाएँ - Tribal Problems and Schemes
किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु यह आवश्यक है कि उस राष्ट्र के सभी वर्ग, समुदाय आदि समस्या पर पूर्ण योगदान दे सकें। भारत के संदर्भ में जब हम विकास की बात करते हैं तो यह आवश्यक हो जाता है कि देश के सभी वर्गों एवं समुदायों के परिप्रेक्ष्य में विकास को समेकित रूप से समझने का प्रयास करें।
विभिन्न काल खण्डों में किए गए विकास कार्यों को हम कुछ काल खण्डों में विभाजित कर सकते हैं जैसे- ब्रिटिश काल में विकास कार्य, स्वतंत्रता के पश्चात् विकास कार्य एवं 1990 के दशक में वैश्वीकरण जैसी प्रक्रियाओं के आने के बाद विकास कार्य भारत में जनजातीय विकास की दृष्टि से यदि हम इन प्रयासों को देखें तो हम यह पाते हैं कि यह समुदाय गैर जनजातीय समुदायों से दूर दराज के क्षेत्रों में निवास करते रहे हैं। इसलिए ब्रिटिश काल में ये समुदाय एकांकी समुदाय के रूप में देखे गए। परंतु आगे चलकर ब्रिटिश शासन द्वारा इन जनजातीय क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष रूप से दखल देना आरंभ किया। वास्तव में यह दो सर्वथा भिन्न संस्कृतियों के बीच टकराव की स्थिति थी जहाँ एक तरफ जनजातीय संस्कृति प्राकृतिक संसाधनों, खास तौरपर वनों के संरक्षण एवं सर्वधन करने वाली थी एवं उनकी सम्पूर्ण सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक गतिविधियां इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों के आस-पास केंद्रित थीं वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश अर्थात पश्चिमी संस्कृति उपभोगतावादी संस्कृति थी।
प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम दोहन एवं उपयोग इस संस्कृति के लिए विकास के मायने थे अर्थात यह संस्कृति भौतिक उपभोगवाद की समवाहन एवं संरक्षक थी ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों (मुख्यतः वनों) का अधिकतम दोहन एवं उपयोग ब्रिटिश शासन का मुख्य उद्देश्य बन गया। जिसके परिणाम स्वरूप पहली बार प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित अनेक नियम कानून एवं नीतियों का निर्धारण किया गया। इसी क्रम में भारतीय वन नीति (1872) एवं वन से संबंधित नियम एवं कानून बनाए एवं लागू किए गए। इतना ही नहीं वनों का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन भी किया गया। जैसे आरक्षित वन, संरक्षित वन, राजस्व वन एवं सामुदायिक वन इन नियमों, नीतियों एवं वर्गीकरण के परिणाम स्वरूप अभी जो जनजातीय भारत में जनजातीय विकास हेतु समाज वैज्ञानिकों द्वारा अलग-अलग उपागम सुझाए गए हैं। जैसे वैरियर एल्विन ने अलगाववादी उपागम (Isolation approach) का सुझाव दिया एवं यह कहा कि जनजातीय संस्कृति सर्वथा भिन्न एवं विशिष्ट संस्कृति है जिसको विकास के नाम पर नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर उन्होंने जनजाति विकास हेतु जनजाति उपवन का सिद्धांत (National Public Park Theory) हेतु जनजाति उपवन का सिद्धांत दिया। जी.एस.घुरिए इससे अलग एकीकरण (Interrogation approach) उपागम को महत्वपूर्ण मानते हैं एवं जनजातियों को गैर जनजातीय समुदायों के साथ विकास की प्रक्रिया में शामिल करने पर बल देते हैं। इसी प्रकार डी.एन. मजूमदार चयनित एकीकार (selected interrogation) के उपागम के पक्षधर हैं, आपके अनुसार जनजातीय समुदायों के नृजातीय पहचान (Ethnic Identity) को क्षतिग्रस्त नहीं होने देना चाहिए। विकास की मुख्यधारा में इनकी सभ्यता एवं संस्कृति के सभी तत्वों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए बल्कि कुछ जनजातीय जीवन के उन्हीं पक्षों को विकास की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए जो अति आवश्यक हो।
समाज वैज्ञानिकों का एक समूह ऐसा भी है जो जनजातीय विकास हेतु समावेशीकरण के उपागम (Assimilation Approach) को आवश्यक मानता है इनके अनुसार जनजाति संस्कृति भी भारत के गैर जनजातीय समुदाय संस्कृति की ही भाँति है और वे भी अन्य समुदायों के भाँति भारतीय समाज का हिस्सा हैं।
अर्थात जनजातियों के लिए विशेषीकृत विकास कार्यक्रमों के वजह उन्हें अन्य समुदायों के साथ शामिल कर विकास कार्य किए जाने चाहिए। उपर्युक्त सभी उपागम जनजातीय जीवन में किए गए गहन अध्ययनों का परिणाम है अर्थात जनजातीय जीवन में समस्याओं एवं उनके समाधान हेतु समुचित एवं सटीक प्रयास किए जाएं इसके लिए आवश्यक है कि एक से अधिक उपागमों को ध्यान में रखकर जनजातीय विकास सुनिश्चित किया जाए।
विकास की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे अन्य देशों की भाँति हमारे देश में भी समग्र विकास राष्ट्रीय विकास का लक्ष्य है। अर्थात देश के सभी समुदायों का विकास समान रूप एवं समान गति से हो इस हेतु प्रयास किए जा रहे हैं। एंतिहासिक रूप से जनजातीय समुदाय विकास की मुख्य धारा से दूर होते गए एवं इन समुदायों में कुछ विशेष प्रकार की समस्याएं भी उत्पन्न हुई जिनमें अशिक्षा, स्वास्थ्य की समस्या, ऋणग्रस्तता, निर्धनता, बेरोजगारी इत्यादि प्रमुख समस्याएं हैं।
स्वतंत्रता के पश्चात जनजातीय विकास हेतु व्यापक स्तर पर प्रयास किए गए एवं बड़ी संख्या में जनजातीय विकास योजनाएं संचालित की गई जिनके सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त हो रहे हैं, परंतु अभी भी जनजातीय विकास हेतु अनवरत प्रयासो की आवश्यकता है।
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