जनजातीय समस्याएं : ऋणग्रस्तता - Tribal Problems : Indebtedness
जनजातीय समस्याएं : ऋणग्रस्तता - Tribal Problems : Indebtedness
भारतीय जनजातियों की समस्याओं में संभवतः ऋणग्रस्तता की समस्या सबसे जटिल है, जिसके कारण जनजातीय लोग साहूकारों के शोषण का शिकार होते हैं। ठेकेदारों तथा अन्य लोगों से सीधे संपर्क के कारण उत्तर-पूर्व के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर समस्त भारतीय जनजातीय जनसंख्या ऋणों के बोझ से दबी हुई है।
इस ऋणग्रस्तता का कारण है, निर्धनता, भुखमरी तथा दुर्बल आर्थिक व्यवस्था नृजातीय अध्ययनों तथा प्रमाणों से यह स्पष्ट पता चलता है कि ठेकेदारों तथा अन्य लोगों के द्वारा इनके क्षेत्रों में हस्तक्षेप से पूर्व ये जनजातियां इतनी दुर्बल, निर्धन तथा विवश नहीं थीं। ये लोग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थे। वन सम्पदा पर इनका अधिकार था। दुर्भाग्यवश जब आर्थिक विकास की योजनाओं के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों में विकास का झोंका आया तथा इनके क्षेत्र सभी प्रकार के लोगों के लिए खोल दिए गए, तो विकास का लाभ उठाने के लिए ये जनजातियां तैयार नहीं थीं। अधिकतर जनजातियों में ऋणबंधक होना इनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। सभी जनजातीय समुदायों की ऋणग्रस्तता के कुछ मुख्य कारण हैं -
1. भूमि तथा वनों पर जनजातीय अधिकारों का हनन
2. कृषि के पुराने तरीकों के कारण कम उत्पादन
3. उपेक्षा तथा जहालत
4. विवाह, मृत्यु, मेलों तथा उत्सवों में अपनी क्षमता से अधिक व्यय करने की प्रवृत्ति
5. भाग्यवादी प्रवृत्ति व संकुचित विचारधारा
6. परंपरागत सामुदायिक पंचायत एवं जुर्माना
उपरोक्त स्थितियों के कारण जनजातीय लोगों को सदैव रुपए की आवश्यकता रहती हैं, जिसके कारण यह लोग आसानी से साहूकारों के शोषण का शिकार हो जाते हैं। समय-समय पर लिए गए, ऋण, जिनकी ब्याज दरें बहुत अधिक होती हैं मिलकर ऐसी धनराशी में परिवर्तित हो जाते हैं जिसे वापस करना इनके सामर्थ्य से परे होता है, जिसके फलस्वरूप इनकी भूमि साहूकारों द्वारा ले ली जाती है।
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