जनजातीय समस्याएं - Tribal Problems

जनजातीय समस्याएं - Tribal Problems

आवास एवं स्वच्छता (Housing and Hygiene )

किसी भी समुदाय के आवास एवं स्वच्छता उसके विकास की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। इसके साथ-साथ वातावरण की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न आर्थिक व्यवस्थाओं तथा अलग-अलग जलवायु के साथ-साथ आवासों की बनावट भी एक समस्या है। अधिकतर जनजातीय लोगों को प्रकृति ने काफी सुरक्षा प्रदान कर रखी है। ये लोग अनुकूल स्थितियों में रहते हैं। जनजातियों में आवासों की उपयोगिता के साथ-साथ उनके कलात्मक पक्ष पर भी ध्यान दिया जाता है। बहुत सी जनजातियाँ अच्छे मकानों में रहने को एक गर्व का विषय मानती हैं। दूसरी ओर कुछ छोटी जनजातियां हैं जो आवासों के महत्त्व पर ध्यान नहीं देतीं। ये लोग छोटी-मोटी झोपड़ियों में रहते हैं जो सदैव गन्दगी से घिरी रहती हैं। जनजातियों की आवासीय समस्या को सुलझाने में वन विभाग भी बाधक है। अफसरशाही तथा संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण वन सम्पदा के प्रयोग पर जो रोक लगा दी गई है, उसके कारण सम्पूर्ण वन नीति जनजातीय कल्याण कार्यक्रम में एक बड़ी बाधा के रूप में सामने आई है। आवश्यक वस्तुओं का संकलन करने के लिए किसी वन अधिकारी की स्वीकृति पाना इन जनजातियों के लिए बहुत कठिन हो गया है।

शिक्षा (Education) से संबंधित समस्या


अन्य सामाजिक व आर्थिक पक्षों की भाँति शिक्षा के क्षेत्र में भी जनजातीय लोग अलग-अलग स्तरों पर हैं। जनजातीय समूहों पर औपचारिक शिक्षा का प्रभाव बहुत कम पड़ा है। सरकार द्वारा अधिक से अधिक स्कूल खोलने तथा शिक्षा पर अधिक व्यय करने से भी जनजातीय लोगों की शिक्षा पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा है। इस प्रकार की शैक्षिक नीतियों के निर्धारण में सामाजिक पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। जनजातियों के लिए केवल औपचारिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता नहीं है। इनके लिए ऐसी शिक्षा नीति लाभदायक होगी जिसके अंतर्गत उन्हें शिक्षित करने के साथ-साथ उनके अंधविश्वासों तथा पूर्वाग्रहों को भी दूर किया जा सके।


जनजातियों द्वारा शिक्षा की ओर कम ध्यान देने के आर्थिक कारण भी है। अधिकतर जनजातीय परिवार इतने निर्धन हैं कि वे लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते है। एल्विन (1963) के अनुसार एक जनजातीय परिवार के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना आवश्यक रूप से आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। इससे इनके जीवनयापन के संघर्ष तथा पारंपरिक श्रम विभाजन की योजना गड़बड़ा जाती है। बहुत से माँ-बाप ऐसी स्थिति में नहीं होते कि अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें।"


औपचारिक शिक्षा में रुचि की कमी


एल. आर. एन. श्रीवास्ताव (1968) ने इस समस्या पर व्यावहारिक विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि “आधुनिक सभ्यता से दूर अलग तथा दूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाला जनजातीय बच्चा देश के भूगोल व इतिहास, औद्योगीकरण, तकनीकी विकास, महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रति कम रुचि रखेगा। उसे तो अपने पड़ोसी समुदायों, ग्राम्य जीवन, सामाजिक संगठनों, रीति-रिवाजों, विश्वासों तथा परंपराओं के विषय में जानकारी दी जानी चाहिए। उसके पश्चात उसे उसके देश की विभिन्न स्थितियों से अवगत कराना चाहिए। इस प्रणालीबद्ध तरीके से उसके गांव, राज्य, देश तथा विदेशों से संबंधित जानकारी उसके विकास में सहायक होगी।” एस. एन. रथ (1981) ने निम्न सुझाव देने के साथ-साथ समस्या का स्पष्ट विश्लेषण भी किया है, पारंपरिक रूप से प्रशिक्षित एक जनजातीय बच्चा अपने वातावण से पूर्ण रूप से अवगत होता है। वह अपने घर को बनाना, खेती करना, कपड़ा बुनना आदि ऐसे सभी कार्यों से परिचित होता है। अतः एक ऐसे पाठ्यक्रम तथा प्रणाली की संरचना होनी चाहिए जो जनजातीय परंपराओं, रीतिरिवाजों, स्थानीय आवश्यकताओं तथा राष्ट्रिय शिक्षा योजना में एक संतुलन स्थापित कर सके। ऐसे पाठ्यक्रम में शिल्पकलाओं को महत्त्व देने के साथ-साथ श्रम के सम्मान की भावना, सहकारिता तथा सामाजिक अनुशासन जैसे आवश्यक पक्षों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।


ऐसी योजनाएं बननी चाहिए जिनकी सहायता से माता-पिता तथा स्कूल व शिक्षकों के बीच संबंध स्थापित हो सके। पढ़ने-लिखने की शिक्षा के साथ-साथ स्कूलों में प्रारम्भिक तकनीकी ज्ञान भी दिया जाना चाहिए तथा इन स्कूलों को सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावी केंद्र होना चाहिए। इस प्रकार की आदर्श योजना की सफलता समुचित रूप से प्रशिक्षित व समर्पित शिक्षकों पर ही निर्भर करती है। शिक्षक-जनजातियों की शिक्षा के धीमे विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारण है उपर्युक्त शिक्षकों की कमी। अधिकतर गैर-जनजातीय शिक्षक, जो जनजातीय बच्चों को पढ़ाते हैं, अधिकतर जनजातीय समुदायों से ही शिक्षकों का चयन करना चाहिए या शिक्षकों का एक पृथक समूह बनाना चाहिए जो जनजातीय क्षेत्रों में जाकर उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ती कर सके।


संचार (Communication)


सदियों से जनजातियां दूरवर्ती तथा अलग-अलग क्षेत्रों में रहती आयीं हैं। संचार माध्यमों की कमी इसका मुख्य कारण है। जनजातीय क्षेत्रों के विकास तथा वहां की आर्थिक स्थितियों में सुधार करने के लिए संचार व्यवस्था का होना अत्यन्त आवश्यक है।


जनजातीय क्षेत्रों में संचार व्यवस्था की समस्या को प्रत्येक समुदाय के स्तर पर अलग तरीके से समझे जाने की आवश्यकता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक समुदाय की जो समस्या है वह दूसरे की नही। अर्थात प्रत्येक समुदाय को उसकी आवश्यकतानुसार संचार के साधन प्राप्त हो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। संचार व्यवस्थाओं के विस्तार की कुछ हानियाँ भी है। इन व्यवस्थाओं की सहायता से बहुत से बाहरी तत्वों का इन क्षेत्रों में आकर सीधे-सीधे जनजातीय लोगों को सोषित करने का अवसर मिल जाता है।


भुखमरी एवं शोषण (Starvation & Exploitation)


भुखमरी तथा शोषण विश्वभर की जनजातियों की मूल समस्या है। भारत में यह समस्या गंभीर रूप से व्याप्त है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि हमारी कुछ जनजातियां ऐसे क्षेत्रों में रहती हैं जो अत्याधिक पिछड़े इलाके होते है वे जहां निवास करते हैं वहां वनों तथा खनिजों जैसी प्राकृतिक संपदाओं से भरे पड़े हैं। परंतु स्वतंत्रता के बाद शासन के हस्तक्षेप एवं वन्य संरक्षण हेतु चलाई जाने वाली योजनाओं के कारण जनजातीय जीवन में अनेक परिवर्तन आए। प्राकृतिक संसाधन जो कि जनजातीय समुदाय के सम्पूर्ण जीवन का मुख्य आधार है शासन के हस्तक्षेप के कारण यह इन संसाधनों का उपयोग करने में असमर्थ होने लगे जिससे इनके बीच भुखमरी एवं शोषण की समस्या मुख्य रूप से पाई जाने लगी।


बेजोगारी और अविकास (Unemployment & Underdevelopment)


जनजातीय समुदाय पिछड़े एवं अविकसित क्षेत्रों में निवास करते हैं तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनों पर आश्रित रहते हैं। अशिक्षित होने के कारण इन्हें उचित रोजगार प्राप्त नही होता इस कारण यह अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ती करने में असमर्थ होते हैं। यह अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नही कर पाते हैं और गैर जनजातीय समुदाय के व्यक्तिओं से कर्ज लेते हैं तथा ये कर्ज चुकाने में असमर्थ रहते हैं। जिससे इनकी आर्थिक स्थिति अत्याधिक निम्न होती है। जिससे यह अपना विकास नहीं कर पाते और इसलिए विकास की मुख्य धारा में बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं।


मानव तस्करी (Human Trafficking)


मानव तस्करी आधुनिक समाज में गंभीर समस्या है। शारीरिक शोषण और देह व्यापार से लेकर बधुंआ मजदूरी तक के लिए मानव तस्करी की जाती है। ड्रग्स और हथियारों के बाद दुनिया की तीसरी गंभीर समस्या मानव तस्करी है। 80 प्रतिशत मानव तस्करी यौन शोषण के लिए की जाती है। मानव तस्करी में अधिकांश बच्चे बेहद गरीब इलाकों के होते हैं। ज्यादातर लड़किया भारत के पूर्वी इलाकों के अन्दरूनी गांव से होती हैं। अत्याधिक गरीबी, शिक्षा की कमी और सरकारी नीतियों का ठीक से लागू न होना ही बच्चियों को मानव तस्करी का शिकार बनने की सबसे बड़ी वजह बनता है।


प्रवजन (Migration )


विश्वभर में लगभग सभी समुदायों को विशेष रूप से आदिम समुदायों को अपनी जमीन व मूल निवास स्थान से गहरा भावनात्मक संबंध रहा है। इसलिए हम देखते हैं कि जनजातीय प्रवसन सामान्य परिस्थितियों में नहीं होता। जनजातीय संदर्भ में प्रवसन की अवधारणा बहुत पुरानी नहीं है। संचार साधनों के विकसित होने के बाद प्रवसन की सम्भावनाएं बढ़ी। जनजातीय प्रवसन को दो पहलुओं से समझा जा सकता है। पहला, उन कारकों के माध्यम से जो किसी जनजातीय समूह को बाहर की ओर धकेलते हैं और दूसरा, उन कारकों के माध्यम से जो किसी जनजातीय समूह को अपनी ओर खींचते हैं या उन्हें आकर्षित करके अपना मूलस्थान छोड़ने के लिए उकसाते हैं। बहुत से समाज विज्ञानियों का मत है कि इस प्रकार का प्रवसन एक प्राकृतिक व तर्कसंगत घटना है जिसमें, श्रम के कम क्षेत्रों से बहुतायत व अधिकता वाले क्षेत्रों की ओर प्रवसन आवश्यक है। इस प्रकार जनजातीय प्रवसन स्थायी भी हो सकता है तथा अस्थायी भी।


स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (Health & Hygiene )


जनजातीय समुदाय के व्यक्ति अशिक्षित होने के कारण अपने स्वस्थ्य एवं स्वच्छता पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं। अच्छी स्वच्छता, व्यक्तिगत स्वच्छता न केवल स्वस्थ्य स्व-छवि को बनाए रखने में मदद करती है। बल्कि संक्रमण और बीमारी के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण है। शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक किसी व्यक्ति की क्षमता या अच्छी स्वच्छता के लिए आवश्यक स्व-देखभाल कार्यों को करने की इच्छा को प्रभावित कर सकते हैं। जनजातीय समुदाय के व्यक्ति स्वच्छता से अत्याधिक दूरी बनाकर रखते हैं। उन्हें स्वस्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति कोई भी जानकारी या जागरूकता नही होती है। इनके आवास के आस-पास स्वास्थ्य को हानि पहुचाने वाला वातावरण होता है। जिससे इनके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इस कारण जनजाति समुदाय में स्वास्थ्य एवं स्वच्छता एक गंभीर समस्या है।