नातेदारी के दो रूप एफिनल-संबन्ध तथा समान रक्त-संबंध - Two forms of kinship Affinal relation and Equal blood relation
नातेदारी के दो रूप एफिनल-संबन्ध तथा समान रक्त-संबंध - Two forms of kinship Affinal relation and Equal blood relation
सभी समाजों मं स्वीकृत हैं क्योंकि प्रत्येक समाज में विवाह तथा रक्त संबंधियों की आवश्यकता होती है। ये दोनों संबंध सर्वव्यापी तथा अति साधारण समाज में भी पाए जाते हैं। क्योंकि फर्थ के अनुसार - "यह एक छड़ है जिसके सहारे प्रत्येक व्यक्ति जीवन भर रहता है। संबंधी अपने संबंधी की निःशुक्ल सेवा करता है। आपत्तिजनक स्थितियों में केवल एक वही सहारा होता है। किंतु फिर भी नातेदार की कुछ ऐसी श्रेणियाँ होती हैं जिनमें कि सामीप्य तथा दूरस्थता रहती है। अधिकारों तथा कृतज्ञताओं में भी अंतर होता है।
एफीनल संबंध (विवाह संबंधी) पति तथा पत्नी के बीच होता है। इनमें आपस में कोई रक्त संबंध नहीं होता है। ये संबंध केवल दो व्यक्तियों को ही आपस में बद्ध नहीं करते वरन दो परिवारों को भी संबंधों की श्रृंखलाओं में बद्ध कर देते हैं। इन दोनों परिवारों के संबंधी अर्थात् पति के संबंधी भाई बहिन, माता पिता इत्यादि एवं पत्नी के संबंधी माता-पिता, बहिन, भाई आदि एफीनल संबंधी है। उन परिवारों में चूँकि ये रक्त द्वारा संबंधित नहीं हैं. विवाह द्वारा संबंधित हैं।
परिवार में समान रक्त संबंध दो व्यक्तियों में होता है माता-पिता एवं बच्चों के बीच दूसरा भाई बहनों के बीच। इन रक्त संबंधियों में समान रुधिर रहता है। इस संबंध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि समान-रक्त-संबंध केवल प्राणीशास्त्रीय संबंध द्वारा ही स्थापित नहीं होता। यह भी आवश्यक नहीं कि समान-रक्त-संबंधियों में प्राणीशास्त्रीय संबंध भी है। समान-रक्त-संबंध के शाब्दिक अर्थ को हमें यहाँ विस्तृत रूप में प्रयोग करना होगा। समान-रक्त-संबंध में प्राणीशास्त्रीय तत्वा तो होता ही है किंतु इसके अतिरिक्त संबंधियों को जब तक सामाजिक मान्यता प्राप्त न हो, वे समान-रक्त-संबंधी नहीं कहला सकते। लावी का मह है कि समाज किसी भी रक्त संबंध को अस्वीकार करता है एवं किसी भी व्यक्ति को रक्त संबंधी ठहरा सकता है। इस प्रकार प्राणीशास्त्रीय संबंध गौण तथा सामाजिक स्वीकृति मुख्य है। बच्चे को गोद लेने की प्रथा सामाजिक स्वीकृति का सर्वव्यापी उदाहरण है।
नातेदारी व्यवस्था का प्रकार्यात्मक महत्व बहुत अधिक है। नातेदारी व्यवस्था सामाजिक क्षेत्र में स्थिति एवं काय का निर्धारण करती है। सामाजीकरण की प्रक्रिया का उत्तरदायित्व इसी व्यवस्था पर है।
परिवार इसी व्यवस्था की एक इकाई है। नातेदारी व्यवस्था यौन संबंधों को भी परिभाषित एवं नियंत्रित करता है। विवाह आदि व्यवस्थाओं को परिभाषित एवं नियंत्रित करती है। इस प्रकार नातेदारी व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख तत्व है।
सामाजिक स्तरीयकरण की व्यवस्था
सामाजिक स्तरीकरण किसी न किसी रूप में हर समाज में पाया जाता है। अति प्राचीन एवं सरल समाजों में सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता था। आदिम वन्य जातीय समाजों में भी यह पाया जाता है। आधुनिक समाज में भी सामाजिक स्तरीकरण पाया जाता है। इस प्रकार, सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया हर समाज में पाई जाती है। यहाँ तक कि वर्ग विहीन समाज होने के दावा करने वालो साम्यवादी समाजों में भी सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया पाई जाती है। सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया सार्वभौमिक है। सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया का अर्थ है समाज में स्तरों का निर्माण। समाज को विभिन्न स्तरों में विभाजित करके कुछ स्तर उच्च समझे जाते हैं और कुछ निम्न। इस प्रकार के स्थाई समूहों का निर्माण हो जाता है। मुरे ने सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा करते हुए लिखा है “स्तरीकरण समाज को (उच्च( और (निम्न सामाजिक स्तरीकरण, समाज का वह विभाजन है, जिसमें उसे स्थाई समूहों अथवा श्रेणियों में विभाजित कर दिया जाता है
और वे एक-दूसरे से उच्चता एवं आधीनता के संबंध के आधार पर श्रृंखलाबद्ध रहती है। सदरलैंड एवं बुडवर्ड ने इसकी परिभाषा देते हुए लिखा हैं - “स्तरीकरण साधारणता अंतःक्रिया अथवा विभेदीकरण की एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कुछ व्यक्तियों को दूसरों की तुलना में उच्च स्थिति प्राप्त हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि स्तरीकरण समाज को कुछ समूहों में विभक्त करके उन्हें उच्च एवं निम्न स्तरों में स्थापित करने की प्रक्रिया को कहते हैं।
सामाजिक स्तरीकरण के अनेक आधार है। इन आधार अथवा आधारों पर सामाजिक स्तरीकरण किया जाता है:
(1) आयु- आयु प्रायः व्यक्ति की मानसिक परिपक्वता को प्रकट करती है। आयु के साथ ही साथ सांसारिक अनुभव भी बढ़ता जाता है। अतः आयु के आधार पर कुछ समाजों में स्तरीकरण किया जाता है। प्रायः अधिक आयु के व्यक्तियों को उच्च स्थान दिया जाता है।
(2) लिंग- लिंग के आधार पर भी स्तरीकरण होता है। प्रायः पुरुषों को स्त्रियों से उच्च माना जाता है।
(3) प्रजातीय आधार - प्रजातीय आधार पर भी स्तरीकरण किया जाता है। श्वेत प्रजाति को उच्चतम माना जाता है और श्याम प्रजातियों को निम्नतम
(4) आर्थिक स्तरीकरण का आर्थिक आधार बहुत महत्वपूर्ण है। आधुनिक समाजों में इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है।
(5) व्यवसाय व्यवसाय भी स्तरीकरण का महत्व पूर्ण आधार है। इसी प्रकार के अन्य आधार भी विभिन्न समाजों में पाए जाते हैं।
सामाजिक स्तरीकरण समाज की एक कार्यात्मक आवश्यकता है। इसका समाज में अत्यधिक महत्व है। निम्न कारणों से इसकी आवश्यकता समाज में अनुभव होती है।
(1) श्रम विभाजन की व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण श्रम विभाजन की एक व्यवस्था है। हर स्तर के कुछ निश्चित कार्य होते हैं जिन्हें उस स्तर के सदस्य को पूरा करना पड़ता है। भारत की जाति व्यवस्था इसका एक उदाहरण है। हर जाति का एक विशिष्ट कार्य है। इसके कारण हर प्रकार के कार्य लोग करते हैं और समाज में व्यवस्था बनी रहती है।
(2) कुशलता एवं योग्यता में वृद्धि के लिए प्रोत्साहन सामाजिक संस्तरण के कारण व्यक्तियों में कुशलता एवं योग्यता में वृद्धि करने के लिए होड़ सी लग जाती है।
हर व्यक्ति उच्च स्थिति को प्राप्त करने के लिए लालायित रहता हैं। इसे वह अपनी कुशलता एवं योग्यता में वृद्धि करके प्राप्त कर सकता है। अतः वह अधिक से अधिक परिश्रम करता है।
(3) मनोवैज्ञानिक संतोष प्रदान करना - सामाजिक संस्तरण के कारण लोगों को जो कुछ उनके स्तर के अनुसार प्राप्त होता है उससे वे संतुष्ट रहते हैं।
सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था पुरस्कारों के वितरण की भी व्यवस्था है। ये कई प्रकार की प्रेरणाएँ प्रदान करती हैं जैसे-
(1) आर्थिक प्रेरणाएँ
(2) आत्म-प्रेरणाएँ या सौंदर्यात्मक प्रेरणाएँ और
(3) प्रतीकात्मक प्रेरणाएँ।
शक्ति व्यवस्था
सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण तत्व शक्ति व्यवस्था है। शक्ति व्यवस्था की महत्ता बहुत अधिक है। क्योंकि व्यक्तियों और समूहों के व्यवहारों को नियंत्रित एवं नियमित करना अत्यंत आवश्यक है। शक्ति व्यवस्था के अंतर्गत सभी प्रकार की शक्तियाँ आती हैं. इसमें शारीरिक शक्ति भी सम्मिलित है। सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के हाथ में शक्ति की मात्रा कम या ज्यादा होती है। शक्ति व्यवस्था जहाँ संघर्षों को दबाती है एवं रोकती है, वहीं इसके कारण संघर्ष भी उत्पन्न होते हैं क्योंकि लोग शक्ति के लिए संघर्ष करते हैं। फिर भी सामाजिक व्यवस्था में विघटनकारी तत्वों को रोकने एवं बड़ाने के लिए तथा व्यवहारों को नियंत्रित करने के लिए शक्ति व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। मैक्स वेबर ने तो शक्ति के विवरण की व्यवस्था को ही सामाजिक व्यवस्था कहा है।
धर्म तथा मूल्य व्यवस्था
सामाजिक व्यवस्था कए तत्व धर्म मूल्य व्यवस्था भी है।
मूल्य सामाजिक व्यवस्था के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। मूल्यों का प्रत्येक समाज में बड़ा महत्व होता है। मूल्य किसी भी समाज को स्थायित्व प्रदान करते हैं। मूल्य ही वास्तव में मानव समाज का आधार बनते हैं। इनमें परिवर्तन ही समाज में भी परिवर्तन लाता है। वास्तव में मानव समाज और पशु समाज में क्या अंतर है? यह अंतर मूल्यों पर ही आधारित है। भीड़ एक ऐसा समूह है जो मनमानी करती है और कोई मूल्य नहीं रखती। उसकी प्रवृत्ति पशुओं सरीखी है। यह मनुष्य का वह क्षेत्र है जबकि वे पशु ही रहते हैं और मानवता की ओर बिलकुल भी नहीं बढ़ते। जब मूल्यों का विकास होता है, तो मानतस के गुण बढ़ते जाते हैं। समाज की एकता मूल्यों पर आधारित होती है। हम कई बार कहते हैं कि भारत में विभिन्नता में एकता पाई जाती है। इसका क्या अर्थ होता है? वास्तव में हमारी भाषा, रहन-सहन इत्यादि विभिन्न हैं, पर हमारे मूल्य समान हैं। भारत के लिए कुछ निश्चित मूल्य हैं जो परंपरागत चले आ रहे हैं और हम उकना पालन करते हैं। यह हमें एकता के सूत्र में बाँधता है। आध्यात्मिक प्रवृत्ति भारत में एक महत्त्वपूर्ण मूल्य है। इसका प्रभाव हम सब पर पड़ता है।
धर्म भी सामाजिक व्यवस्था के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। धर्म समाज में एकीकरण उत्पन्न करता है। धर्म सामाजिक नियंत्रण का एक प्रभावशाली यंत्र है। धर्म सामाजीकरण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इससे स्पष्ट है कि धर्म सामाजिक व्यवस्था के लिए किता महत्वपूर्ण है।
वार्तालाप में शामिल हों